रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने टीवी BRICS को दिए एक इंटरव्यू में अमेरिका पर निशाना साधा और कहा कि भारत और दूसरे पार्टनर्स को रूस से तेल खरीदने से रोकने की कोशिशें हो रही हैं। इस बात की जानकारी स्पुतनिक ने सोमवार को दी।
रूस के विदेश मंत्री ने पिछले साल अलास्का में हुई शांति वार्ता जैसे कई मामलों पर भी बात की। उन्होंने बताया कि कैसे वॉशिंगटन ने टैरिफ, बैन और सीधे रोक जैसे जबरदस्ती वाले तरीकों का इस्तेमाल करते हुए आर्थिक दबदबा बनाने का लक्ष्य रखा है।
क्या बोले लावरोव?
लावरोव ने कहा, “वे (अमेरिका) हमसे कहते हैं कि यूक्रेन की समस्या का हल होना चाहिए। एंकरेज में हमने अमेरिका का प्रपोजल मान लिया। यूएस की स्थिति हमारे लिए जरूरी थी। उनका प्रपोजल मानकर, ऐसा लगता है कि हमने यूक्रेनी मुद्दे को सुलझाने का काम पूरा कर लिया है और एक बड़े पैमाने पर और आपसी फायदे वाले सहयोग की ओर बढ़ रहे हैं। अभी तक, असलियत बिल्कुल उलटी है।”
उन्होंने आगे कहा, “नए बैन लगाए गए हैं, यूएन कन्वेंशन ऑन लॉ ऑफ द सी का उल्लंघन करते हुए खुले समुद्र में टैंकरों के खिलाफ ‘जंग’ छेड़ी जा रही है। वे भारत और हमारे दूसरे साझीदारों को सस्ते, किफायती रूसी एनर्जी रिसोर्स (यूरोप पर लंबे समय से बैन है) खरीदने से बैन करने की कोशिश कर रहे हैं और उन्हें बहुत ज्यादा कीमतों पर यूएस LNG खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं।”
‘आर्थिक दबदबा बनाने का टारगेट’
उन्होंने कहा कि अमेरिका ने अपने लिए ‘आर्थिक दबदबा बनाने’ का लक्ष्य रखा है। बड़े देशों तक अपने एनर्जी सोर्स पहुंचाने के लिए अमेरिका उनके रास्तों पर कंट्रोल करना चाहता है। लावरोव ने कहा कि टैरिफ, सेंक्शन, सीधे रोक लगाना और कुछ लोगों को दूसरों से जुड़ने से रोकना, ये कदम अपने मकसद को पूरा करने के लिए उठाए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा, “हमें इन सब बातों का ध्यान रखना होगा और भारत, चीन, इंडोनेशिया और ब्राजील की तरह अमेरिका जैसी बड़ी ताकतों सहित सभी देशों के साथ सहयोग के लिए खुले रहना होगा। हम ऐसी स्थिति में हैं जहां अमेरिकी खुद ही रास्ते में बनावटी रुकावटें खड़ी कर रहे हैं।”
उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने सोमवार को कहा कि भारत के एनर्जी से जुड़े फैसले देश के हित से ही तय होते रहेंगे। मिसरी ने कहा कि भारत तेल और गैस सेक्टर में इंपोर्टर है और एक डेवलपिंग इकॉनमी होने के नाते, उसे अपने रिसोर्स की उपलब्धता और महंगाई पर आयात निर्भरता के असर के बारे में पता होना चाहिए।














