नई दिल्ली: ईरान पर इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमले के शुरुआती शिकारों में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई और उनका परिवार शामिल है। भारत में कश्मीर से लेकर लखनऊ तक इसके विरोध में आक्रामक प्रदर्शन हो रहे हैं। एनडीए-विरोधी विपक्षी पार्टियां बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप के लिए हाय-हाय कह रही हैं। लेकिन, आधिकारिक रूप से भारत ने अबतक खामेनेई के खात्मे की निंदा नहीं की है। भारत बार-बार सिर्फ पश्चिम एशिया में बातचीत, शांति और स्थिरता की अपील कर रहा है।
प्रश्न उठ रहा है कि भारत का आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत पर चुप्पी के स्टैंड के पीछे का राज क्या है? अगर कूटनीतिक तौर पर देखें तो भारत इस मसले पर यूं ही शांत नहीं है, बल्कि इसके पीछे की वजहों की एक पूरी श्रृंखला है, जिसे देखते हुए भारत इस तरह का राजनयिक स्टैंड ले रहा है।
खामेनेई की मौत की निंदा क्यों नहीं
ईरान को भारत का ऐतिहासिक मित्र माना जाता है और कई बार अंतरराष्ट्रीय मसलों पर उसने भारत के स्टैंड का समर्थन भी किया है। लेकिन, ऐसा भी नहीं है कि ईरान या खामेनेई ने भारत के साथ मित्रता का अटूट रिश्ता निभाया है। कई ऐसे मौके आए हैं, जब उसने अपनी दोस्ती को संदेहजनक बना दिया है।
ईरान ने पाकिस्तान का कब दिया साथ
केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी के सांसद निशिकांत दुबे, जो अहम मुद्दों पर सत्तापक्ष की ओर से दलीलें देते रहते हैं,उन्होंने दो दस्तावेजों के आधार पर दावा किया है कि 1965 और 1971 दोनों युद्ध में ईरान ने पाकिस्तान को भारत के खिलाफ लड़ने के लिए पैसे हथियार और विमान दिए थे।
खामेनेई का भारत-विरोधी चार स्टैंड
यही नहीं, सरकारी सूत्रों का कहना है कि खुद आयतुल्लाह अली खामेनेई का भारत के प्रति रिकॉर्ड पूरी तरह से पाक-साफ नहीं रहा है। 2017 से 2024 तक ही कम से कम चार ऐसे मौके आए हैं, जब उन्होंने हमारे अंदरूनी मामलों में इस्लाम के नाम पर दखल देने की कोशिश करके अपनी सीमाएं लांघीं। 2017 में उन्होंने कश्मीरी मुसलमानों पर पाकिस्तानी जुबान में बात की थी।
2019 में कश्मीर से 370 हटाए जाने पर भी उन्होंने तिलमिलाहट में इसके खिलाफ बयान दिया। ईरानी संसद तक ने भी सीएए के खिलाफ मत जाहिर किया। 2020 के दिल्ली दंगों में भी खामेनेई ने ट्वीट करके इसे चरपंथी हिंदुओं द्वारा ‘मुसलमानों का नरसंहार’ बताया। 2024 में उन्होंने भारत की तुलना गाजा और म्यांमार से करने की गुस्ताखी की।
खामेनेई की मौत पर चुप रहने वाले देश
अगर हम ईरान-इजरायल युद्ध और खामेनेई की मौत पर वैश्विक प्रतिक्रियाओं पर नजर डालें तो भारत का रूख ग्लोबल पैटर्न से अलग नहीं है। किसी भी जी7 देश ने उनकी मौत पर श्रद्धांजलि जारी नहीं की।
इरजायल-अमेरिका के समर्थन में खड़े देश
अर्जेंटीना, यूक्रेन, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूरोपियन यूनियन ने इस मुद्दे पर खुलकर अमेरिका- इजरायल के स्टैंड का समर्थन किया है।
यहां तक कि खाड़ी के देश भी या तो इससे नाराज हैं या फिर चुप्पी साध चुके हैं। सऊदी अरब भी चुप्पी बनाए है और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) तो ईरानी मिसाइलों के हमले झेल रहा है। गौर करने वाली बात ये है कि ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) में भी 10 से कम सदस्यों ने ही इसकी निंदा की है या खामेनेई को श्रद्धांजलि दी है।
भारत की तरह और किस देश के स्टैंड
जापान और जर्मनी का स्टैंड लगभग भारत की ही तरह है, जिन्होंने स्थिरता की तो बात की है, लेकिन श्रद्धांजलि देने वाले बयान जारी नहीं किए हैं।
खामेनेई की मौत की निंदा करने वाले देश
जिन देशों ने खामेनेई की मौते की खुलकर निंदा की है, उनमें रूस, चीन, उत्तर कोरिया, इराक, तुर्की, पाकिस्तान और मलेशिया शामिल हैं।
भारत की प्रतिक्रिया में राष्ट्रहित प्रथम
कुल मिलाकर ज्यादातर देशों ने राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी है। इसी कड़ी में भारत की सोची-समझी रणनीतिक चुप्पी में हमले झेल रहे खाड़ी के सहयोगियों के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी गई है और वैश्विक लोकतांत्रिक देशों के अपनाए गए स्टैंड के अनुसार है।














