नीतीश कुमार के पास भाजपा से महज 4 विधायक ही कम हैं. भाजपा के बिहार में 89 विधायक हैं तो जेडीयू के 85 हैं. वे न चाहें तो भाजपा का सीएम नहीं बन सकता. यह भी कि वे चाहें तो सत्ता सुख के लिए तिलमिला रहे तेजस्वी के नेतृत्व वाले महागठबंधन और दूसरे विपक्षी दलों के साथ सरकार बना सकते हैं. पर, उन्हें महागठबंधन के साथ काम करने का कटु अनुभव है. वे कहते भी रहे हैं कि 2 बार इधर-उधर जाकर उनसे गलती हुई. इसलिए उनके राज्यसबा जाने के फैसले में साजिश की गंध तलाशना उचित नहीं लगता.
बिहार में नीतीश कुमार ने सर्वाधिक समय सीएम रहने का पिछला रिकॉर्ड तोड दिया. 10वीं बार सीएम पद की शपथ लेने का राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी उनके ही नाम है. हालांकि उनकी पहले की समता पार्टी हो या बाद का जेडीयू, अपने बूते नीतीश कभी सीएम बनने का बहुमत नहीं जुटा पाए. पर, भाजपा के सहयोग से वे 2005 से ही बिहार का सीएम बनते रहे हैं. 2014 के कुछ महीनों को छोड़ दें तो वे लगातार 20 साल से सीएम रहे हैं. उन्हें कभी किसी ने सीएम बनने में बांधा नहीं पहुंचाई. अब वे अपनी इच्छा से राज्यसभा जा रहे हैं तो जेडीयू समर्थकों के साथ विपक्षी दलों के नेताओं को यह भाजपा की सुनियोजित साजिश लग रही है. भाजपा पर ऐसा आरोप लगाने वाले यह भूल जाते हैं कि केंद्र में उन्हें मंत्री बनने के अलावा बिहार का सीएम बनने तक भाजपा ने उन्हें उदार मन से मदद पहुंचाई है.
भाजपा ने ही सीएम बनाया
पहली बार 2005 में नीतीश कुमार को सीएम बनने का प्रस्ताव अटल बिहारी वाजपेयी ने दिया था. नीतीश कुमार बड़ी ईमानदारी से यह बात स्वीकार भी करते हैं. उससे पहले नीतीश उनके मंत्रिमंडल में रेल मंत्री की भूमिका निभा चुके थे. भले नीतीश ने 2 मौकों पर भाजपा से मुंह मोड़ा, लेकिन लौटे तो भाजपा ने उन्हें खुले मन से गले लगाया. 2020 में चुनाव नतीजे जब नीतीश के अनुकूल नहीं आए और उनसे अधिक सीटें भाजपा की झोली में गईं, तब भी भाजपा ने उन्हें मान दिया. उनके ना-नुकुर के बावजूद उन्हें भाजपा ने सीएम बनाया. भाजपा अगर उन्हें इतना सम्मान देती रही है तो कैसे माना जाए कि ववह उनके खिलाफ साजिश रचेगी!
तेजस्वी को नाहक तकलीफ
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले में विरोधियों को साजिश नजर आ रही है. राजद नेता तेजस्वी यादव इसे नीतीश कुमार के साथ भाजपा का विश्वासघात बता रहे हैं. तेजस्वी यह भूल जाते हैं कि उन्होंने 3-4 महीने पहले नीतीश कुमार को नीचा दिखाने के लिए उनके बारे में क्या-क्या टिप्पणी नहीं की. राज्यसभा जाने के नीतीश के फैसले से पहले भी तेजस्वी और उनकी पार्टी नीतीश पर उसी अंदाज में हमलावर रही है. उन्हें बूढ़ा, बीमार और लाचार बताया गया. हाल तक वे उनके खिलाफ हल्ला बोल अभियान में लगे हुए थे. अब उन्हें इस काम में भाजपा की साजिश दिख रही है.
नीतीश कुमार बेचारा नहीं
नीतीश कुमार को बेचारा समझने वाले भूल जाते हैं कि अब तक स्वाभिमान से समझौता नहीं करने वाले नीतीश ने राज्यसभा जाने का फैसला किसी के दबाव या प्रभाव में आकर नहीं लिया है. उन्होंने तो साफ-साफ बता दिया है कि सभी विधायी सदन देखने की उनकी इच्छा रही है. विधानसभा, विधान परिषद और लोकसभा के वे सदस्य रह चुके हैं. राज्यसभा बाकी था. इस बार वे यह इच्छा भी पूरी कर लेना चाहते हैं. इसके लिए उन्होंने न सिर्फ सोशल मीडिया पर बयान जारी किया, बल्कि वीडियो जारी कर भी स्थिति स्ष्ट की.
नीतीश अब भी ताकतवर
यह भी सच है कि नीतीश कुमार किसी के सहयोग या समर्थन से राज्यसभा नहीं जा रहे. उनके अपने ही विधायक इसके लिए पर्याप्त हैं. जेडीयू के विधायकों की जितनी संख्या है, उसमें 2 सदस्यों का जीतना पक्का है. लोकसभा में वे भाजपा के बराबर यानी 12 सदस्यों के दलीय प्रमुख हैं. राज्यसभा में भी उनके हिस्से की 4 सीटें हैं. ऐसे में इस तोहमत में दम नहीं दिखता कि वे कमजोर पड़ रहे हैं या भाजपा जबरन उन्हें राज्यसभा भेज रही है, ताकि वह अपना सीएम बना सके.
भाजपा पर भारी हैं नीतीश
नीतीश के पास भाजपा से महज 4 विधायक ही कम हैं. भाजपा के बिहार में 89 विधायक हैं तो जेडीयू के 85 हैं. वे न चाहें तो भाजपा का सीएम नहीं बन सकता. यह भी कि वे चाहें तो सत्ता सुख के लिए तिलमिला रहे तेजस्वी के नेतृत्व वाले महागठबंधन और दूसरे विपक्षी दलों के साथ सरकार बना सकते हैं. पर, उन्हें महागठबंधन के साथ काम करने का कटु अनुभव है. वे कहते भी रहे हैं कि 2 बार इधर-उधर जाकर उनसे गलती हुई. वे कई मौकों पर यह बात कह चुके हैं कि अब वे वैसी गलती नहीं करेंगे. इसलिए राज्यसभा जाने के उनके फैसले को साजिश कहना कहीं से भी उचित नहीं लगता. नीतीश को राजनीति का चाणक्य कहने वाले यह भी जानते हैं कि वे किसी के दबाव में नहीं आते. जब उनके पास सिर्फ 43 विधायक थे, जब भी उन्होंने किसी के दबाव में काम नहीं किया. दबाव महसूस हुआ तो उन्होंने भाजपा का साथ छोड़ा और उधर नाराजगी हुई तो भाजपा के साथ लौट आए. अब तो उनके 85 विधायक हैं. ऐसे में भाजपा पर वे अब ी भारी हैं. वे न चाहते तो कोई जबरन उन्हें राज्यसभा नहीं बेज पाता.














