भारत और अमरीका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौते पर फिलहाल हस्ताक्षर टल गए हैं। भारत सरकार का कहना है कि जब तक अमरीका अपनी नई वैश्विक टैरिफ व्यवस्था तय नहीं कर लेता, तब तक समझौते को अंतिम रूप नहीं दिया जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों देशों की टीमें तकनीकी पहलुओं पर काम कर रही हैं। लेकिन भारत चाहता है कि नई टैरिफ संरचना स्पष्ट होने के बाद ही समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएं, ताकि भारतीय निर्यातकों को नुकसान न हो । भारत ने ट्रंप को साफ संदेश दे दिया है कि भारत-अमरीका ट्रेड डील पुरानी शर्तों पर नहीं होगी।

इस व्यापार समझौते पर साइन तभी किए जाएंगे, जब टैरिफ का नया स्ट्रक्चर पूरी तरह से तैयार हो जाएगा। इस व्यापार समझौते पर पहले मार्च 2026 में हस्ताक्षर होने की उम्मीद थी। लेकिन अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद स्थिति बदल गई। अदालत के निर्णय के चलते पहले लगाए गए टैरिफ प्रभावहीन हो गए। फिलहाल अमरीका 15% टैरिफ वसूल रहा है।

क्या हुई थी डील

भारत-अमरीका ने फरवरी में शुरुआती ट्रेड डील होने का ऐलान किया था। समझौते के तहत भारत पर 25% एक्स्ट्रा टैरिफ (रूसी तेल खरीदने के कारण) हटाने पर सहमति बनी थी। साथ ही रेसिप्रोकल टैरिफ 25% से घटाकर 18% किया जाना था। साथ ही कई उत्पादों पर टैरिफ काफी कम किए गए थे। भारत और अमरीका के बीच बातचीत केवल टैरिफ तक सीमित नहीं है। कई गैर टैरिफ बाधाओं और विशेष क्षेत्रों पर लगाए गए शुल्क जैसे मुद्दों पर भी चर्चा जारी है।

मलेशिया भी पीछे हटा

मलेशिया ने अमरीका के साथ हुई ट्रेड डील से निकलने का फैसला किया है। उसने ऐलान किया कि ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीतियों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अमरीका संग उसकी ट्रेड डील ‘मान्य’ नहीं रह गई है। मलेशिया के इस फैसले के बाद ही जानकारों ने यह अंदाजा लगाना शुरू कर दिया था कि कई और ऐसे देश अपने समझौते रद्द करेंगे।

किसी न किसी रूप में फिर से टैरिफ : ट्रंप

इस बीच ट्रंप ने दुनियाभर के देशों पर फिर से टैरिफ लगाने की धमकी दी है। ट्रंप ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले की भी आलोचना करते हुए कहा कि मुझे टैरिफ लगाने का अधिकार है और अब टैरिफ नए तरीके से लगाएंगे। ट्रंप ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भले ही उनके पुराने टैरिफ मॉडल को रोका हो, लेकिन उनके पास दूसरे रूप में टैरिफ लगाने का पूरा अधिकार है।
उन्होंने कहा कि वह इस दिशा में काम शुरू भी कर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ट्रंप प्रशासन ने ट्रेड एक्ट के सेक्शन 122 और सेक्शन 301 जैसे वैकल्पिक कानूनी प्रावधानों के तहत नए शुल्क लगाने की प्रक्रिया तेज कर दी है। ट्रंप प्रशासन अब लगभग 1.6 ट्रिलियन डॉलर के अनुमानित टैरिफ रेवेन्यू के नुकसान की भरपाई के लिए नए रास्ते तलाश रहा है।

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