हाल में केरल का नाम बदलकर केरलम किए जाने के बाद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का नाम इंद्रप्रस्थ करने की मांग ने नया उत्साह पैदा किया है। यह विचार पहले मुख्यतः राष्ट्रवादी विमर्श तक सीमित था। यह 2016 में पुराने पांडव किला में आयोजित प्रथम इंद्रप्रस्थ महोत्सव के दौरान व्यापक रूप से सार्वजनिक मंच पर सामने आया। इस कार्यक्रम का आयोजन द्रौपदी ड्रीम ट्रस्ट द्वारा किया गया था और इसे भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय का समर्थन प्राप्त था। इसके बाद से यह विषय सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनता रहा। राजधानी का प्राचीन नाम इंद्रप्रस्थ सनातन परंपरा में गहराई से निहित है और दिल्ली को राजा ढेलू की एक छोटी बस्ती से संबंधित माना जाता है।
संस्कृत में प्रस्थ का अर्थ समतल भूभाग (पठार) भी होता है। इस प्रकार इंद्रप्रस्थ केवल एक प्रशासनिक केंद्र नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परिदृश्य के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। यह नाम उस कालखंड का प्रतीक है जब सत्ता और न्याय का आधार धर्म हुआ करता था। भगवान श्रीकृष्ण ने इस क्षेत्र की प्राचीन पवित्रता को देखते हुए इसे पांडव राज्य की स्थापना के लिए चुना। महाभारत के अनुसार, युधिष्ठिर ने यमुना में स्नान कर राजसूय यज्ञ संपन्न किया और इंद्रप्रस्थ के चक्रवर्ती सम्राट बने। स्वामी दयानंद के शोध और राजस्थान के नाथद्वारा मंदिर के अभिलेखों के अनुसार सम्राट युधिष्ठिर से लेकर सम्राट यशपाल तक लगभग 124 आर्य शासकों ने यहां 4,157 वर्षों तक निरंतर शासन किया, जिसमें प्रत्येक का औसत शासनकाल लगभग 39 वर्ष रहा।
इतिहासकार हेनरी हार्डी कोल और एलेक्जेंडर कनिंघम ने भी इसे भारत की प्रारंभिक शहरी बसावटों में से एक माना है। महाभारत के सभा पर्व में वर्णित है कि इंद्रप्रस्थ एक सुयोजित नगर था, जहां समाज के सभी वर्गों की आवश्यकताओं का ध्यान रखा गया था। यह नगर काशी जैसे अन्य धार्मिक केंद्रों से व्यवस्थित सड़कों द्वारा जुड़ा था। बौद्ध परंपराओं में उल्लेख है कि बुद्ध का उस्तरा और सुई भी इंद्रपत्त (इंद्रप्रस्थ) में स्थापित किए गए थे, जो इसके व्यापक प्रभाव को दर्शाता है। इसके विपरीत दिल्ली नाम की उत्पत्ति लोककथाओं में राजा ढेलू से जोड़ी जाती है। कहा जाता है कि उन्होंने महरौली स्थित पवित्र विष्णुगिरि लौह स्तंभ (जो शासन की स्थिरता का प्रतीक था) की स्थिति को परखने का प्रयास किया।
इस प्रक्रिया में वास्तु के प्रतीक नागदेव को चोट पहुंची और स्तंभ की कील ढीली हो गई। इसी ढीली किल्ली से ढिल्लिका और कालांतर में दिल्ली शब्द निकला। विडंबना यह रही कि स्थिरता के प्रतीक से जुड़ी इस घटना ने एक ऐसे नाम को जन्म दिया, जो इतिहास में अस्थिरता और अशांति की गाथा बन गया।
जो भूमि पहले आध्यात्मिक, पूजनीय थी, वह धीरे-धीरे केवल धन-संपन्न प्रदेश के रूप में देखी जाने लगी, जिससे विदेशी आक्रमणकारियों की गिद्ध दृष्टि इस पर पड़ी। मुहम्मद गोरी से लेकर नादिर शाह और अंग्रेजों तक दिल्ली बार-बार आक्रमणों, लूट और विनाश का केंद्र बनी। इन आक्रमणों का मुख्य उद्देश्य संपदा का दोहन और भारत की वैदिक ज्ञान परंपरा को खंडित करना था। यह स्थिति उस स्वर्णकाल से भिन्न थी, जब विदेशी यात्री यहां केवल ज्ञान प्राप्त करने और संवाद करने आते थे।
ब्रिटिश काल में जब राजधानी कलकत्ता से दिल्ली लाई गई, तब लुटियंस की दिल्ली के निर्माण में प्राचीन इंद्रप्रस्थ की नगर-योजना का अध्ययन तो किया गया, लेकिन इसी दौरान कई प्राचीन संरचनाओं को मलबे में दबा दिया गया। 1913 की अधिसूचना द्वारा इंद्रप्रस्थ की ऐतिहासिक सीमा को अत्यंत सीमित कर केवल पुराना किला तक समेट दिया गया। 1925-26 की पुरातत्व रिपोर्टों में यहां राजा भोज और राजा सोहनलाल के मंदिर-लेखों का मिलना इस क्षेत्र पर भारतीय शासकों के लंबे नियंत्रण की पुष्टि करता है। आज पुराना किला स्थित कुंती मंदिर, निगमबोध घाट का क्षेत्र (जहां युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया था), नीली छतरी मंदिर और महरौली का योगमाया मंदिर इस प्राचीन गौरव के अंतिम जीवित प्रमाण हैं।
सनातन संस्कृति में नामकरण केवल पहचान नहीं, बल्कि एक संस्कार है। नाम ब्रह्मांडीय ऊर्जा, ध्वन्यात्मक कंपन और मूल्यों को प्रतिबिंबित करता है। जहां पश्चिमी दृष्टिकोण कहता है कि ‘नाम में क्या रखा है’, वहीं भारतीय मनीषा मानती है कि नाम अस्मिता और नियति को आकार देता है। इंद्रप्रस्थ जैसा नाम संरक्षण और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है, जो न्यायपूर्ण शासन की याद दिलाता है। इसके उलट किल्ली-ढिल्ली या दिल्ली जैसा नाम अपनी उत्पत्ति में ही शिथिलता का संकेत देता है।
आर्यावर्त की इस पवित्र भूमि का इंद्रप्रस्थ से दिल्ली में रूपांतरण एक गहरा सभ्यतागत क्षरण है, जिसे हिंसा और आंदोलनों की पृष्ठभूमि में भी देखा जा सकता है। इतिहास से सीख लेकर ही उस प्राचीन संतुलन को पुनः स्थापित किया जा सकता है। इंद्रप्रस्थ जैसे पवित्र तीर्थों का सार्वजनिक स्मृति में पुनर्जीवित होना आवश्यक है। इंद्रप्रस्थ की पुनर्स्थापना केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि भारत के विश्वगुरु काल की ओर बढ़ने का एक निर्णायक कदम होगा। इंद्रप्रस्थ की छत्रछाया में ही राष्ट्र अपनी वास्तविक समृद्धि और शांति को पुनः प्राप्त कर सकता है।



















