विश्व की सर्वोच्च एवं श्रेष्ठ संसद संयुक्त राष्ट्र का उद्देश्य राष्ट्रों के आपसी तनाव व विवादों का समाधान करना, युद्धों को रोकना, मानव विकास का पथ प्रदर्शक बनना तथा शांति स्थापित करना है। परंतु इसके प्रयासों के बावजूद कई राष्ट्राध्यक्ष वार्तालाप और कूटनीति की बजाय युद्धों से अपने स्वार्थ हल करने में लगे हुए हैं। युद्धों की सोच हैरतअंगेज, अफसोसनाक, ङ्क्षचताजनक और मानव समाज को घोर अंधेरे की तरफ बढ़ा रही है। 

शक्तिशाली देश रूस और यूक्रेन  पिछले 4 वर्षों से युद्ध की आग में धधक रहे हैं। अढ़ाई वर्षों से इसराईल और हमास में घमासान है तथा अब अमरीका एवं इसराईल ने ईरान पर आक्रमण करके मध्य एशिया में एक नई मुसीबत खड़ी कर दी है, जिसके परिणामस्वरूप ईरान के धर्मगुरु के अलावा मासूम और निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं। यही हाल इसराईल में भी हो रहा है। ईरान ने सऊदी अरब, यू.ए.ई., कुवैत, कतर, बहरीन, ओमान पर आक्रमण करके युद्ध का एक नया अध्याय शुरू कर दिया है। इससे विश्व में  खाद्य पदार्थों, तेल, गैस और अन्य चीजों की भारी किल्लत से महंगाई बढऩे लगी है। इससे कई छोटे देशों में अराजकता फैलने का खतरा पैदा हो रहा है। यद्यपि यू.एन. एक मजबूत संगठन है, परंतु यह केवल प्रस्ताव पारित करने वाली संस्था बनकर रह गया है। जबकि इसे प्रभावशाली भूमिका निभा कर युद्ध बंद करवाने चाहिएं।

ईरान और इसराईल भी कभी मित्र देश थे। ईरान तेल देता था और इसराईल हथियार। परंतु 1979 में इस्लामिक क्रांति से रजा पहलवी के प्रगतिशील और उदारवादी समाज के स्थान पर रूढ़ीवादी और अनुदारवादी समाज की स्थापना कर दी गई तथा इसराईल का नामोनिशान मिटाने के नारे लगने लगे। ईरान ने लेबनान में  हिजबुल्ला, गाजा में हमास और यमन में हूथी आतंकवादी संगठनों की खुलकर हथियारों और धन से मदद करनी शुरू कर दी, जो इसराईल के अस्तित्व के लिए खतरा बन रहे थे।  दूसरा, ईरान एटमी शक्ति बनने की तैयारी कर रहा था, जिससे इसराईल ही नहीं, बल्कि सऊदी अरब और आसपास के छोटे देशों के लिए भी एक नया खतरा पैदा हो रहा था। तीसरा, सऊदी अरब को यह डर था कि शक्तिशाली ईरान कहीं इस्लाम के धार्मिक पवित्र स्थान मक्का और मदीना पर ही कब्जा न कर ले। चौथा, राष्ट्रपति ट्रम्प वेनेजुएला की तरह ईरान के तेल पर भी कब्जा करना चाहते हैं। यह लड़ाई सऊदी अरब और ईरान की है। सुन्नी बहुल और शिया मुस्लिम के वर्चस्व की है। इसराईल अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखना और अमरीका अपनी शक्ति का फायदा उठाना चाहता है। ट्रम्प ने ईरान पर हमले से पहले उसकी शक्ति को कमतर आंका था। ट्रम्प ने नाटो देशों और चीन से जंगी जहाजों की मदद मांगी है ताकि  होर्मुज से तेल, गैस और अन्य वस्तुओं से भरे जहाजों को निकाला जा सके। परंतु सबने सहयोग देने से साफ इंकार कर दिया है। ट्रम्प ईरान को घुटनों पर लाना चाहता है, परंतु उसके विरोधी उसे ही घुटनों पर लाने की कोशिश कर रहे हैं।

युद्ध के दौरान भारत ने ईरान के साथ-साथ खाड़ी देशों के साथ भी वार्तालाप जारी रखा और ईरान को भारी मात्रा में युद्ध में हुए जख्मी लोगों के लिए जहाज भरकर दवाइयां भेजीं, जबकि 56 मुस्लिम देशों में से किसी ने भी किसी तरह की कोई सहायता नहीं की। मुश्किल की घड़ी में भारत ने तुर्की और अन्य देशों की भी मदद की है। युद्ध किसी मसले का हल नहीं है। ये तबाही और बर्बादी के कारण बनते हैं। प्रथम विश्व युद्ध में (1914-1918) अढ़ाई करोड़ और दूसरे विश्व युद्ध में (1939-1945) 5 करोड़ तथा इनसे पहले बर्बर चंगेज खां और तैमूर लंग ने 7 करोड़ से अधिक लोगों को कत्ल करवा दिया था। हकीकत में युद्ध सभ्य मानव समाज पर एक बदनुमा धब्बा है। इससे सदा के लिए छुटकारा पाने के लिए विश्व में एक नई सोच विकसित की जानी चाहिए। इस संबंध में एक शे’र नजर करता हूं-

आदमी खुद को कभी यूं भी सजा देता है, 
अपने दामन से खुद शोलों को हवा देता है
मुझे उस सियासतदान की सियासत पर तरस आता है,
शांति की बजाय जो युद्ध को तरजीह देता है।-प्रो. दरबारी लाल

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