बस्तर को नक्सल मुक्त घोषित करने की ऐतिहासिक डेडलाइन से महज 7 दिन पहले, लाल गलियारे में दहशत का साम्राज्य पूरी तरह ढहता नजर आ रहा है। बस्तर मूल का अंतिम सबसे बड़ा लड़ाका और पश्चिम बस्तर डिवीजन का इंचार्ज पापाराव उर्फ मंगू (56) मंगलवार को अपने 17 साथियों के साथ बीजापुर जिले के कुटरू थाने पहुंचा।

वहां उसने अपने हथियार पुलिस को सौंपे। इसके बाद भारी सुरक्षा घेरे में सभी को बस के जरिए जगदलपुर लाया गया। इसके पहले वह अपने 17 साथियों के साथ सरेंडर के लिए जंगल से बाहर निकला। एके-47 और आधुनिक हथियारों से लैस पापाराव की तस्वीरें सामने आने के बाद यह साफ हो गया है कि 31 मार्च की समय-सीमा से पहले ही बस्तर में नक्सलवाद की ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी गई है।

बता दें कि नक्सल संगठन के शीर्ष नेतृत्व में अब केवल मिशिर बेसरा और गणपति ही शेष बचे हैं। प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री विजय शर्मा ने इस बड़ी सफलता की औपचारिक पुष्टि की। उन्होंने बताया कि कुल 18 नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया है। आत्मसमर्पण करने वालों में 10 पुरुष और 8 महिला नक्सली शामिल हैं। यह सरेंडर केवल संख्या के लिहाज से नहीं, बल्कि हथियारों की बरामदगी के मामले में भी ऐतिहासिक है। नक्सलियों ने पुलिस को आधुनिक हथियारों का जखीरा सौंपा है। उपमुख्यमंत्री ने कहा कि पापाराव का सरेंडर बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे की औपचारिक घोषणा जैसा है। अब संगठन के पास न तो जमीन बची है और न ही लड़ने वाले लड़ाके।

सौंपे गए हथियार

08 एके-47 राइफल्स
01 एसएलआर
01 इंसास राइफल और भारी मात्रा में कारतूस।

फोर्स के दबाव के आगे टेके घुटने

पापाराव मूल रूप से सुकमा जिले का रहने वाला है और वर्तमान में दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी का सदस्य होने के साथ-साथ पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी का इंचार्ज और दक्षिण सब जोनल ब्यूरो का सदस्य भी है। जल-जंगल-जमीन का गहरा जानकार होने के कारण वह कई बार पुलिस मुठभेड़ों में बचकर भागने में सफल रहा था, लेकिन सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव ने उसे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।

पश्चिम बस्तर डिवीजन का सफाया

पापाराव के सरेंडर के साथ ही नक्सलियों की पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो गया है। बटालियन नंबर-1 के कमांडर देवा के सरेंडर के बाद पापाराव ही एकमात्र ऐसा नक्सली बचा था, जिसे एक सक्रिय ‘फाइटर’ के रूप में जाना जाता था। उसने कई बड़े हमलों में मोर्चे पर रहकर सुरक्षा बलों को भारी नुकसान पहुंचाया था। विशेषज्ञों का मानना है कि अब जो शीर्ष कैडर बचे हैं, वे या तो बीमार हैं या उम्रदराज हो चुके हैं, जिससे संगठन की लड़ाकू क्षमता खत्म हो गई है।

2025: पतन की ओर नक्सलवाद

साल 2025 की शुरुआत से अब तक सुरक्षा बलों के ‘ऑपरेशन क्लीन’ ने नक्सल संगठन की कमर तोड़ दी है। इस एक साल में वह सब हुआ जिसने संगठन को अस्तित्व के संकट में डाल दिया। खूंखार माड़वी हिड़मा, महासचिव बसवाराजू, जयराम और गणेश उइके समेत 17 बड़े कैडर एनकाउंटर में मारे गए। वहीं भूपति, रूपेश, रामधेर और देवा जैसे दिग्गजों ने अपने सैकड़ों साथियों के साथ हथियार डाल दिए।

अंतिम दो चेहरों पर नजर: अब बस घोषणा बाकी

नक्सल संगठन के शीर्ष नेतृत्व में अब केवल मिशिर बेसरा और गणपति ही शेष बचे हैं। सूत्रों के अनुसार, 31 मार्च से पहले इनके सरेंडर को लेकर भी बड़ी खबर आ सकती है। झारखंड और तेलंगाना की सीमाओं पर सक्रिय इन दोनों नेताओं से सरकार के मध्यस्थ लगातार संपर्क में हैं। यदि ये दोनों भी हथियार डाल देते हैं, तो 31 मार्च को बस्तर को पूर्णतः ‘नक्सल मुक्त’ घोषित करने का रास्ता साफ हो जाएगा।

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