कोलकाता : ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष बैरिस्टर असदुद्दीन ओवैसी बिहार विधानसभा के तर्ज पर अब बंगाल विधानसभा में कुछ नया गुल खिलाने जा रहे हैं। सूत्रों की माने तो मुस्लिम मतों पर अपनी दावेदारी करने वाले राष्ट्रीय जनता दल के बाद बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस पर असदुद्दीन ओवैसी ने निशाना साध लिया है। बीते नवंबर में बिहार विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी ने मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में कर कई सीटें जीत लीं और कई सीटों पर राजद को हारने के लिए मजबूर किया था। अब पश्चिम बंगाल में टीएमसी की बारी है।

बिहार में ओवैसी ने दी लालू को पटखनी

नवंबर 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव परिणामों के अनुसार, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) ने बिहार में 5 सीटें जीती जबकि राजद के सिर्फ तीन मुस्लिम चुनाव में जीते। ढाका से फैसल रहमान और बिस्फी से आरिफ अहमद तो रघुनाथपुर सेओसामा शहाब जीतने वाले आरजेडी के मुस्लिम कैंडिडेट रहे। ओवैसी की पार्टी के पांच कैंडिडेट अमौर से अख्तरुल ईमान , बहादुरगंज से तौसीफ आलम , जोकीहाट से मोहम्मद मुर्शीद आलम, बैसी विधानसभा सीट से गुलाम सरवर और मोहम्मद सरवर आलम ने जीत दर्ज की।

पश्चिम बंगाल में भी उठाया उप जातियों का मुद्दा

पश्चिम बंगाल में अधिकतर मुस्लिम मतदाता तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में एकजुट दिख रहे हैं, लेकिन यह ध्रुवीकरण अब पहले जैसा एकतरफा नहीं रहा।अब मुस्लिमों मतों में सेंधमारी को एआईएमआईएम भी तैयार बैठी है। असदुद्दीन ओवैसी में पश्चिम बंगाल में बैकवर्ड कार्ड चल दिया है। वह बंगाल में उस मुद्दे को उठाया है, जिसमें ममता बनर्जी की सरकार ने मुस्लिम उप-जातियों दर्जे को रद्द करने के निर्णय लिया था। उन्होंने मुस्लिमों को यह बताया कि टीएमसी ने केवल वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया। संदेशखाली जैसी घटनाओं और चुनावी हिंसा ने भी मुस्लिम समुदाय के बीच असुरक्षा का भाव पैदा किया है।

हुमायूं कबीर पहले ही बने टीएमसी की टेंशन

टीएमसी के पूर्व नेता हुमायूं कबीर ने पहले ही टीएमसी की परेशानी पहले ही बढ़ा रखी है। उन्होंने अपनी जनता उन्नयन पार्टी के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की है कि टीएमसी मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं की रक्षा नहीं कर पा रही है। कबीर का प्रभाव मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे बेल्ट में है। यदि वे वहां 5-10 प्रतिशत वोट भी काटते हैं, तो यह सीधे तौर पर टीएमसी को नुकसान पहुंचाएगा।

टीएमसी को ज्यादा परेशानी नहीं क्योंकि …

वरिष्ट पत्रकार ओम प्रकाश अश्क मानते हैं कि एआईएमआईएम के चुनावी जंग में उतरने से नुकसान टीएमसी को होगा, मगर इतना भी बड़ा नहीं कि सत्ता से टी एम सी को बाहर कर दे। दरअसल मुस्लिम मतदाता के पास कोई विकल्प नहीं है । कांग्रेस और वाम दल सरकार बनाने की क़ुव्वत खो चुके है। ऐसे में वोटों का बिखराव कर भाजपा को सरकार में आने का मौका मुस्लिम समाज नहीं देना चाहता। तृणमूल को वोट देना मुस्लिमों की मजबूरी भी है। वैसे ममता बनर्जी का इमाम भत्ता और कन्या श्री योजना का बड़ा प्रभाव तो है ही । साथ ही बीजेपी का डट कर विरोध करने के कारण मुस्लिम इन्हें अपना रक्षक भी मानते है।

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