अहमदाबाद: गुजरात में प्रैक्टिस कर रहे आयुर्वेदिक डॉक्टरों ने राज्य के उच्च न्यायालय (गुजरात हाईकोर्ट) का दरवाजा खटखटाया है। इन चिकित्सकों की मुख्य मांग है कि नियामक प्राधिकरण उन्हें एलोपैथिक दवाएं लिखने की अनुमति दें, क्योंकि उन्होंने अपने प्रशिक्षण के दौरान विधिवत एलोपैथी की पढ़ाई भी की है।

यह याचिका ‘ऑल गुजरात आयुर्वेद मेडिकल एसोसिएशन’ की ओर से दायर की गई है। एसोसिएशन का तर्क है कि राज्य और केंद्र दोनों ही स्तरों के अधिकारियों द्वारा उन्हें सालों से इस अधिकार से वंचित रखा जा रहा है।

याचिकाकर्ताओं का स्पष्ट कहना है कि जब उनके पाठ्यक्रम में एलोपैथिक चिकित्सा को शामिल किया गया था और उन्होंने इसका गहन अध्ययन किया है, तो उन्हें मरीजों के लिए ये दवाएं प्रिस्क्राइब करने की छूट मिलनी चाहिए।

अपनी इस मांग के समर्थन में एसोसिएशन ने साल 2018 के सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का प्रमुखता से हवाला दिया है। इस आदेश में एकीकृत चिकित्सा प्रणाली (इंटीग्रेटेड सिस्टम ऑफ मेडिसिन) का प्रशिक्षण लेने वाले चिकित्सकों को संरक्षण प्रदान किया गया था।

इन डॉक्टरों ने ऐसे संस्थानों से मान्यता प्राप्त डिग्री और डिप्लोमा हासिल किए थे, जहां आयुर्वेदिक और एलोपैथिक दोनों विधाएं पढ़ाई जाती थीं। इसके बावजूद सरकारी महकमों ने उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी थी। इस मामले से जुड़े एक वकील के अनुसार, उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने इन चिकित्सकों को अंतरिम राहत देते हुए उनके खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी थी।

अब इस मौजूदा मामले में न्यायमूर्ति एच एम प्राच्छक ने याचिका को स्वीकार कर लिया है। उन्होंने राज्य सरकार, ‘गुजरात बोर्ड ऑफ आयुर्वेद एंड यूनानी सिस्टम ऑफ मेडिसिन’, ‘गुजरात आयुर्वेद यूनिवर्सिटी’ और ‘नेशनल कमीशन ऑफ इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन’ सहित सभी संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किया है।

हाईकोर्ट ने फैसला किया है कि इस नई याचिका पर सुनवाई करीब दो दशक पुराने एक लंबित मामले के साथ ही की जाएगी।

यह पुराना मामला साल 2006 में ‘एसोसिएशन ऑफ इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन्स’ द्वारा दायर किया गया था। उस याचिका में राज्य सरकार के उस सर्कुलर को चुनौती दी गई थी, जिसमें एमबीबीएस (MBBS) योग्य डॉक्टरों के अलावा किसी भी अन्य चिकित्सक को गुजरात में एलोपैथी की प्रैक्टिस करने से रोक दिया गया था।

इस नई याचिका के अदालत में स्वीकार होने के बाद ‘गुजरात मेडिकल काउंसिल’ भी इसका कड़ा विरोध करने के लिए हाईकोर्ट पहुंच गई है। बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति प्राच्छक ने सभी पक्षों को एक सप्ताह के भीतर अपना-अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है और मामले की आगे की सुनवाई तय कर दी है।

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