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Akshaya Tritiya 2026: अक्षय तृतीया तिथि को हिंदू धर्म में बेहद शुभ और पवित्र माना जाता है. कहा जाता है कि यह दिन इतना अधिक मांगलिक होता है कि किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए इस दिन पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती. वर्ष 2026 में यह पर्व 20 अप्रैल को मनाया जाएगा. हर साल यह दिन वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को पड़ता है. ‘अक्षय’ का अर्थ है, जिसका कभी क्षय (नाश) न हो. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी शुभ तिथि पर भगवान परशुराम का जन्म हुआ था, इसलिए इसे परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है.

भगवान परशुराम की जन्मकथा

शास्त्रों के अनुसार, भृगुवंश के तेजस्वी ऋषि जमदग्नि का विवाह चंद्रवंशी राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका से हुआ था. ऋषि जमदग्नि ने पुत्र प्राप्ति के लिए एक बड़ा यज्ञ किया, जिससे प्रसन्न होकर देवराज इंद्र ने उन्हें एक अत्यंत तेजस्वी पुत्र का वरदान दिया. इसके बाद वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया, यानी अक्षय तृतीया को माता रेणुका के गर्भ से एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम ‘राम’ रखा गया.

‘परशुराम’ नाम की प्राप्ति

राम बचपन से ही आध्यात्मिक, बुद्धिमान और साहसी थे. उन्होंने अपनी शिक्षा पूर्ण करने के लिए भगवान शिव की कठोर आराधना की. उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान प्रदान किया. शिक्षा पूर्ण होने पर शिवजी ने उन्हें अपना सबसे शक्तिशाली अस्त्र ‘परशु’ (फरसा) भेंट किया. ‘परशु’ धारण करने के कारण ही उनका नाम ‘परशुराम’ पड़ा.

भगवान परशुराम का संकल्प

परशुराम के काल में हैहय वंश का राजा कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन) अपनी शक्तियों के अहंकार में ऋषियों को परेशान करने लगा था. उसने ऋषि जमदग्नि की प्रिय कामधेनु गाय का अपमान किया और उनके आश्रम को नष्ट कर दिया. जब परशुराम को यह पता चला, तो उन्होंने सहस्रार्जुन की हजार भुजाएँ काट दीं और उसका वध कर दिया.

इसके प्रतिशोध में सहस्रार्जुन के पुत्रों ने निहत्थे ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी. पिता की मृत्यु और माता रेणुका के दुख को देखकर परशुराम ने पृथ्वी को अधर्मियों और अत्याचारियों से मुक्त करने की शपथ ली. माना जाता है कि उन्होंने अत्याचारी क्षत्रिय कुल के हैहय वंश का 21 बार नाश किया.

कलियुग और परशुराम

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान परशुराम चिरंजीवी हैं. वे कलियुग के अंत तक जीवित रहेंगे. जब भगवान विष्णु अपना दसवां ‘कल्कि अवतार’ लेंगे, तब भगवान परशुराम ही उन्हें अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा देंगे और अधर्म के विरुद्ध युद्ध में उनका मार्गदर्शन करेंगे.

अस्वीकरण : इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहां दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सटीकता या सफलता की गारंटी नहीं देते हैं। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें

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