भारत के लिए यह दुखद और बहुत बड़ी खबर है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की अप्रैल, 2026 की रपट के मुताबिक, अब भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं है, बल्कि वह लुढक़ कर छठे स्थान पर आ गई है। जापान 4.38 ट्रिलियन डॉलर के साथ चौथी और ब्रिटेन 4.26 ट्रिलियन डॉलर के साथ 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हो गई हैं। भारत की जीडीपी 4.15-4.17 ट्रिलियन डॉलर आंकी गई है। यह गिरावट डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा ‘रुपए’ के अवमूल्यन के कारण है। करीब 95 रुपए की कीमत एक डॉलर के बराबर तक पहुंच गई है। अलबत्ता हमारी अर्थव्यवस्था आज भी विश्व में सबसे तेजी से बढऩे वाली अर्थव्यवस्था है और जीडीपी की विकास-दर भी 6.5-7 फीसदी के बीच है। विकास-दर विश्व की तमाम बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सर्वाधिक है। ईरान युद्ध और उसके बाद तमाम अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास-दर बरकरार रही है। यदि ‘रुपए’ की स्थिति में सुधार होता है, तो हम 2027 में 5वें स्थान पर लौट सकते हैं, लेकिन 2030 से पहले हम चौथा स्थान दोबारा हासिल नहीं कर सकेंगे। हालांकि कुछ वैश्विक रेटिंग एजेंसियों और विशेषज्ञों के आकलन हैं कि यदि डॉलर के मुकाबले ‘रुपए’ की कीमत मजबूत होती है, तो भारत 2031 तक विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बन सकता है। यही प्रधानमंत्री मोदी का ‘स्वप्निल दावा’ रहा है कि भारत बहुत जल्द तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने वाला है, लेकिन भारत आज भी दो स्तरों पर पिछड़ा हुआ है। एक, भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने में अब भी काफी पीछे है, लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश में शेष 1 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी बढ़ाना कोई ‘टेढ़ी खीर’ नहीं है। दूसरे, भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बजाय छठे स्थान तक खिसक गया है। हमारे पीछे फ्रांस भी चुनौती पेश कर रहा है।

बहरहाल भारतीय रिजर्व बैंक का भी मानना है चूंकि अब आयातित वस्तुएं-कच्चा तेल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, पेट्रो केमिकल उत्पाद आदि-महंगी पड़ेंगी, नतीजतन देश में महंगाई बढ़ सकती है। हालांकि मुद्रास्फीति 4.6 फीसदी, राजकोषीय घाटा 4-5 फीसदी का अनुमान लगाया जा रहा है। भारत पर कर्ज जीडीपी का करीब 55.6 फीसदी है। बहरहाल अर्थव्यवस्था में गिरावट के प्रभाव कई किस्म के होंगे। विदेशी और बड़े निवेशकों की धारणा पर अल्पकालिक असर जरूर होगा, लिहाजा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में अस्थिरता आ सकती है। अर्थव्यवस्था के 5 ट्रिलियन डॉलर के दावों पर सवाल उठ सकते हैं और घरेलू स्तर पर धारणा में नकारात्मक बदलाव देखा जा सकता है। भारत ईरान के होर्मुज के रास्ते करीब 90 फीसदी एलपीजी, 40 फीसदी कच्चा तेल और 50 फीसदी एलएनजी आयात करता है। इनके दाम पहले ही बढ़े हुए हैं, लेकिन अब हमारी अर्थव्यवस्था में गिरावट से भारत का आयात बिल काफी बढ़ जाएगा। उसका देश पर असर स्पष्ट दिखाई देगा। एक और चर्चा सामने आई है कि रूस, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुछ अन्य खाड़ी देश अब डॉलर के बजाय चीन की मुद्रा-युआन-में तेल और गैस के कारोबार करना चाहते हैं। उन्होंने अमरीका के वर्चस्व को नकारना शुरू कर दिया है। 1974 में जो समझौता किसिंजर ने कराया था, उसके बाद सभी अरब देश डॉलर में तेल-गैस का व्यापार कर रहे थे, लेकिन ईरान युद्ध ने अमरीका के प्रति उनका मोहभंग कर दिया है। बेशक खाड़ी देश ‘युआन’ में कारोबार करें, लेकिन भारत के लिए यह संभव नहीं है। भारतीय मुद्रा ‘रुपया’ ही कई देशों में स्वीकार्य है और भारत उनसे ‘रुपए’ में ही कारोबार करता है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की 2025 की रपट, जो 2026 में भी चर्चा में रही है, के मुताबिक भारत 193 देशों में 130वें स्थान पर है। हम ‘मध्यम मानव विकास’ श्रेणी में हैं। भारत का मानव विकास सूचकांक जो भी है, उससे साफ है कि 1990 के बाद स्वास्थ्य, शिक्षा, प्रति व्यक्ति आय में सुधार आया है। साफ है कि भारत की मुद्रा और नीतियां कारगर भी हैं। भारत जापान, ब्रिटेन को पछाड़ कर चौथे स्थान पर पहुंचा था।

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