कई बार किसी मुद्दे पर उठने वाले सवाल विवाद की शक्ल अख्तियार कर लेते हैं। मगर काफी जद्दोजहद के बाद जब उस पर सहमति के बिंदु बनने लगते हैं, तब आखिरकार अपने परिणाम में वही सवाल भविष्य के लिए सकारात्मक दिशा का संकेत बन सकते हैं।
नीट 2026 के प्रश्नपत्र लीक होने की घटना निश्चित तौर पर सरकारी तंत्र की विफलता और लापरवाही का सबूत थी, लेकिन उससे ज्यादा चिंता की बात यह थी कि लाखों विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर सरकार बहुत ज्यादा फिक्रमंद नहीं दिखाई दे रही थी। इससे स्वाभाविक तौर पर विद्यार्थियों के बीच असंतोष और क्षोभ की भावना पैदा हुई और उसी को कॉकरोच जनता पार्टी नाम के एक नए बने समूह ने संगठित स्वर दिया।
हालांकि इस मुद्दे पर दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन और खासतौर पर ‘संसद मार्च’ के आह्वान के दौरान विद्यार्थियों के खिलाफ पुलिस ने जिस स्तर का बल प्रयोग किया, उससे सरकार के रवैये पर तमाम सवाल उठे। विद्यार्थियों के शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन के दमन की कोशिश को संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों पर चोट की तरह देखा गया।
अब विद्यार्थियों के उस आंदोलन के एक निष्कर्ष पर पहुंचने के बाद सरकार ने प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं को पूरी तरह रोकने के लिए ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ लाने की प्रक्रिया शुरू की है।
मगर जरूरत इस बात की है कि देश भर में इस मुद्दे पर जिस तरह का विरोध और सरकार के रुख के प्रति असंतोष देखा गया, अगर उसके हल की कोई सूरत बन रही है, तो उसमें सभी पक्षों का सकारात्मक सहयोग सुनिश्चित हो। संशोधन विधेयक में प्रश्नपत्र लीक होने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ने के लिए कई सख्त प्रावधानों की बात की गई है। इससे यह साफ है कि सरकार इस समस्या की गंभीरता को अब स्वीकार कर रही है।
मगर यहीं इस बात की जरूरत है कि इससे संबंधित सभी पक्षों पर विपक्षी दलों की भी विस्तृत राय ली जाए और इस पर संसद में पर्याप्त बहस हो। दूसरी ओर, आंदोलन के बाद जिस तरह तत्कालीन शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हुआ और सरकार ने अपने कदम पीछे खींचे, तो अब विपक्षी दलों की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं पर लगाम लगाने की कोशिश में अपना सक्रिय और सकारात्मक सहयोग दें।
सही है कि नीट 2026 का प्रश्नपत्र लीक होने की घटना कोई पहली बार नहीं हुई थी। इससे पहले भी कई बार प्रश्नपत्र लीक होने के वाकये सामने आ चुके हैं। मगर सरकार ने औपचारिक निर्देशों के अलावा इसे गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं समझी।
इस वर्ष भी अगर विद्यार्थियों ने सड़क पर उतरकर अपना आक्रोश जाहिर नहीं किया होता और उनके प्रति पुलिस के रुख की वजह से सरकार कठघरे में नहीं खड़ी होती, तो शायद एक बार फिर बात आई-गई हो जाती।
अब देश के सभी राजनीतिक दलों को मिलकर यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि वे ऐसी व्यवस्था बनाएं, जिसमें न केवल नीट, बल्कि हर स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं के आयोजन में पूरी तरह पारदर्शिता और ईमानदारी एक अनिवार्य नियम की तरह लागू हो। साथ ही प्रशासनिक से लेकर विधायी तंत्र में जिम्मेदारी से भरे किसी भी सार्वजनिक पद के लिए वैसे संवेदनशील लोगों को महत्त्व मिले, जो परिस्थितियों को परिपक्व तरीके से संभाल सकें और जिनके लिए शुचिता का सिद्धांत सर्वोच्च प्राथमिकता हो।



















