नेशनल डेस्क: राघव चड्डा के Aap से इस्तीफे के बाद संवैधानिक विशेषज्ञों और राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। बड़े नेता राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने भाजपा में जाने का मन बना लिया है। दावा किया जा रहा है कि हरभजन सिंह और स्वाति मालीवाल जैसे बड़े नामों सहित दो-तिहाई सांसद इस पाला-बदल का हिस्सा हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये नेता अपनी राज्यसभा सदस्यता बचा पाएंगे या उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा?

जानते हैं क्या है दलबदल विरोधी कानून?

भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची (52वां संशोधन, 1985) के तहत सांसदों और विधायकों के पाला बदलने को लेकर कड़े नियम बनाए गए हैं। आइए समझते हैं कि इस मामले में कानून क्या कहता है:

1. स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना 

कानून के मुताबिक, यदि कोई निर्वाचित सांसद खुद अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या किसी दूसरी पार्टी का दामन थामता है, तो वह सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य हो जाता है। इस्तीफा न देने की स्थिति में भी, दूसरी पार्टी ज्वाइन करना ‘स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना’ ही माना जाता है।

2. ‘मर्जर’ (विलय) की अनिवार्य शर्त

इस कानून से बचने का एकमात्र कानूनी रास्ता ‘विलय’ है। इस शर्त के अनुसार यदि किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (66%) सदस्य एक साथ मिलकर किसी दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं, तो उन पर दलबदल कानून लागू नहीं होता।

AAP का गणित: राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के कुल 10 सांसद हैं। कानून से बचने के लिए राघव चड्ढा को कम से कम 7 सांसदों (10 का 2/3) का लिखित समर्थन दिखाना होगा। यदि संख्या 7 से कम रहती है, तो सभी की सदस्यता जा सकती है।

3.  किसका होगा आखिरी फैसला?

दलबदल के मामलों में अंतिम फैसला लेने का अधिकार राज्यसभा के सभापति (उप-राष्ट्रपति) के पास होता है। शिकायत मिलने पर सभापति मामले की जांच करते हैं और अयोग्यता पर अपना निर्णय सुनाते हैं। हालांकि, सभापति के फैसले की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में की जा सकती है।

अयोग्यता की मुख्य स्थितियां

  • अपनी मूल पार्टी की सदस्यता से त्यागपत्र देना।
  • सदन में पार्टी के ‘व्हिप’ (आदेश) के खिलाफ मतदान करना या वोटिंग से अनुपस्थित रहना।
  • कोई निर्दलीय सदस्य यदि जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाए।

क्या अयोग्य होने के बाद दोबारा चुनाव लड़ सकते हैं?

यदि सभापति किसी सांसद को अयोग्य घोषित कर देते हैं, तो उसकी सीट खाली हो जाती है। वह व्यक्ति उस विशेष कार्यकाल के लिए सदन का सदस्य नहीं रहता। हालांकि, वह खाली हुई सीट पर होने वाले उपचुनाव में दोबारा उम्मीदवार बन सकता है, लेकिन उसे नए सिरे से जनता या विधायकों का विश्वास जीतना होगा।

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