रायपुर .छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में उत्पादित होने वाला कोसरा राइस अब मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए कमाई का बड़ा जरिया बन रहा है। मोटे धान की यह किस्म प्राकृतिक रूप से शुगर फ्री है। इसे मोटा अनाज मानकर लोग खाने से कतराते हैं। मल्टीनेशनल कंपनियां अब इस चावल को यहां के ग्रामीणों से करीब 25-30 रुपये किलो की दर से खरीद रही हैं और फिर एक किलो के पैकेट में पैक कर इसे बर्ड सीड के नाम से बाजार में 370 रुपये प्रति किलो की दर से बेचा जाता है। यह चावल लव बर्ड पालने के शौकीन चिड़ियों के दाने के लिए खरीद रहे हैं।बस्तर के ग्रामीण पारंपरिक रूप से पहाड़ी ढलानों पर कोसरा लगाते आ रहे हैं। दक्षिण बस्तर में बैलाडीला की तराई में बसे ग्राम बेंगपाल, कड़मपाल, मदाड़ी, पाड़ापुर, दुगेली, कलेपाल, कोड़ेनार आदि 25 गांवों के किसान करीब एक हजार एकड़ में कोसरा की फसल लेते हैं।कुटकी को बस्तर में कोसरा कहा जाता है। इसका अंग्रेजी नाम लिटिल मिलेट है।  जल्दी पकने वाली कुटकी को चिकमा और देर से पकने वाले को कोसरा कहते हैं। इसमें आयरन अधिक होता है प्राकृतिक रूप से कैल्सियम और फाइबर की भी काफी होता है। वहीं इसमें कार्बोहाईड्रेटस का ग्लाइसिमिक इण्डेक्स जीआई कम होता है।बताया गया कि बैलाडीला क्षेत्र के किसानों से खरीदा गया कोसरा कुछ दलाल कोलकाता भेजते हैं। वहां इसकी छनाई की जाती है। छोटा कोसरा चाइना भेजा जाता है। वहां इसकी चमक बढ़ा कर पैकेजिंग की जाती है और विटापाल नामक कंपनी लवर बर्ड शीड्स के नाम से बाजार में भेजती है। यह शीड 370 रुपए प्रति किलो की दर से बेचा जा रहा है।

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