हाल ही में 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में जुबानी तीर भी खूब चले। जुबानी तीर जब भाषा की मर्यादा लांघ जाएं तो राजनेताओं को यह सोचने की जरूरत है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं। देश और दुनिया में पिछले 10 साल से राजनीति का स्तर गिरता जा रहा है। लगातार भाषा की मर्यादाएं लांघी जा रही हैं। हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने तमिलनाडु में प्रधानमंत्री को कथित तौर पर आतंकवादी कहा। हालांकि बाद में उन्होंने सफाई देते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी लोगों और राजनीतिक पाॢटयों को डरा रहे हैं। मैंने कभी नहीं कहा कि वे आतंकवादी हैं। ई.डी., आयकर विभाग और सी.बी.आई. छापेमारी कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री को आतंकी कहने के मामले में चुनाव आयोग से खरगे की शिकायत की थी। इसके बाद महाराष्ट्र के मंत्री नीतिश राणे ने कहा कि इस देश में सिर्फ एक आतंकवादी है और वो है राहुल गांधी, जो पाकिस्तान की भाषा बोलता है। इसके साथ ही एक चुनावी रैली में गृहमंत्री अमित शाह ने भी ममता बनर्जी के लिए गलत लहजे में बात की। 

अगर हम पिछले 4-5 महीने के राजनेताओं के वक्तव्यों पर गौर करेंगे तो गंदी भाषा के अनेक उदाहरण सामने आ जाएंगे। सार्वजनिक जगहों पर यह गंदी भाषा वे लोग बोल रहे हैं, जो अपनी अपनी पार्टी में या फिर सरकार में जिम्मेदार पदों पर हैं। सवाल यह है कि क्या गंदी भाषा के बिना राजनीति नहीं हो सकती? मल्लिकार्जुन खरगे एक वरिष्ठ राजनेता हैं और देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष हैं। क्या उन्हें प्रधानमंत्री को आतंकवादी कहना शोभा देता है? इस मुद्दे पर कांग्रेस के समर्थक यह कह सकते हैं कि भाजपा के लोग सोनिया गांधी और राहुल गांधी के बारे में अक्सर गंदी भाषा का इस्तेमाल करते रहते हैं। पं. नेहरू को भी बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। इसलिए अगर खरगे ने प्रधानमंत्री के बारे में गलत शब्द बोल दिया तो क्या हो गया। तो क्या इस आधार पर मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा प्रधानमंत्री को आतंकवादी कहना उचित है? निश्चित रूप से नहीं। अगर दूसरों के संस्कार ठीक नहीं, तो क्या हमें भी अपने संस्कार उन जैसे ही कर लेने चाहिएं?

निश्चित रूप से पं. नेहरू, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के बारे में आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया जाता है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संबंध में भी आपत्तिजनक भाषा बरती जाती है। कई बार कांग्रेस भी भाजपा को स्वयं ही एक मुद्दा पकड़ा देती है और भाजपा कई दिनों तक उस पर उछल-कूद करती रहती है। सवाल यह नहीं कि किस राजनीतिक दल के नेता ने कब किस प्रकार की अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया, सवाल यह है कि अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया ही क्यों गया? इस दौर में राजनेता जोश और अतिरेक में आकर राजनीति की मूल भावना को तिलांजलि दे रहे हैं। राजनीति अपनी ठसक या हनक दिखाने का माध्यम बना दी गई है।

राजनेताओं को यह समझना चाहिए कि राजनीति में अहंकार का कोई स्थान नहीं होता लेकिन इस दौर की राजनीति में राजनेताओं में अहंकार बढ़ता जा रहा है। यहां बात भाजपा, कांग्रेस या फिर किसी एक दल की नहीं, सभी राजनेताओं के संस्कार की है। तो क्या आज की राजनीति संस्कारहीन हो गई है? कुछ भी हो, राजनेताओं को भाषा की मर्यादा का ख्याल तो रखना ही चाहिए। तभी वरिष्ठ राजनेता नई पीढ़ी के राजनेताओं को राजनीति का सही पाठ पढ़ा और राजनीतिक शुचिता को भी महत्व दे पाएंगे। राजनीति में स्वयं को ईमानदार और दूसरों को पापी साबित करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जो राजनीति के मूल चरित्र को कठघरे में खड़ा कर रही है। इस दौर में मुद्दों पर बात कम हो गई है और व्यक्तिगत बातों पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है। इस सारी प्रक्रिया में सबसे दुखद यह है कि धीरे-धीरे राजनीति में नफरत की भावना बढ़ती जा रही है।

इस दौर में साम्प्रदायिक राजनीति को ही असली राजनीति समझ लिया गया है। यही कारण है कि धर्म के नाम पर राजनीति में इंसानियत खत्म होती जा रही है। राजनीति के इस नकारात्मक भाव के लिए आम जनता में भी कोई हलचल या गुस्सा नहीं है। आम जनता ने इसे ही अपनी नियति समझ लिया है, बल्कि कई बार तो आम जनता राजनीति की बदलती धारा में स्वयं ही शामिल हो जाती है। यही कारण है कि इस दौर में मूल समस्याओं के लिए होने वाले आन्दोलन कमजोर हो गए हैं। कुछ कुटिल राजनेता और समाज के कुछ ठेकेदार मिलकर एक ऐसा वातावरण बना रहे हैं, जिससे समाज के विभिन्न वर्गों और धर्मों के लोगों के बीच आपसी विश्वास कम हुआ है। सवाल यह है कि राजनीति की यह बदलती प्रवृत्ति क्या भविष्य में हमें अंधकार की तरफ धकेल रही है? ऐसे ही अनेक प्रश्नों पर गंभीरता के साथ ङ्क्षचतन का समय अब आ गया है।-रोहित कौशिक  

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