मानसून के मौसम में लगातार 7 वर्षों की अच्छी बारिश के बाद, भारत की किस्मत अब साथ छोड़ती दिख रही है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आई.एम.डी.) के पूर्वानुमान के अनुसार, इस साल का मानसून अपेक्षाकृत शुष्क रहने की उम्मीद है। आने वाली वर्षा ऋतु के अपने पहले पूर्वानुमान में, आई.एम.डी. ने मंगलवार को कहा कि पूरे देश में इस बार सामान्य की तुलना में केवल ‘92 प्रतिशत बारिश’ होने की संभावना है। यह पिछले 20 वर्षों में आई.एम.डी. द्वारा जारी किया गया अब तक का सबसे कम अखिल भारतीय मानसून वर्षा का पूर्वानुमान है।
जून से सितंबर तक चलने वाला 4 महीने का मानसून, भारत की वाॢषक वर्षा का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा लाता है। भीषण गर्मी से राहत देने के अलावा, इस मौसम में होने वाली बारिश का अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव पड़ता है।

भारत की लगभग आधी फसल भूमि अभी भी सिंचाई के लिए वर्षा जल पर निर्भर है। अच्छी कृषि पैदावार के लिए समय पर और पर्याप्त वर्षा महत्वपूर्ण है, जो बदले में कृषि आय और ग्रामीण मांग को बढ़ाती है। मानसून की बारिश भारत के जलाशयों को भी भरती है, जिनका उपयोग शेष वर्ष के लिए पीने के पानी, जलविद्युत और उद्योग की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाता है। नदियों के प्रवाह को बनाए रखना, अंतर्देशीय जल परिवहन और भूजल पुनर्भरण कुछ अन्य चीजें हैं, जो मानसून की बारिश से प्रभावित होती हैं। कम बारिश का पूर्वानुमान, जैसे कि इस साल का, सरकारों और नीति निर्माताओं के लिए एक तरह का नोटिस है कि वे शुष्क मानसून सीजन के प्रभावों को सोखने के लिए सभी प्रकार की आकस्मिकताओं की तैयारी शुरू कर दें।

बढ़ता लचीलापन : हाल तक, अपेक्षाकृत कम वर्षा की भविष्यवाणी आमतौर पर सरकार में खतरे की घंटी बजा देती थी। इसे कृषि संकट और आर्थिक विकास की संभावनाओं पर रोक के एक निश्चित संकेत के रूप में देखा जाता था। पिछले कुछ वर्षों में चीजें बहुत बेहतर हुई हैं। इसलिए कि भारत विभिन्न क्षेत्रों में विविध पहलों के कारण मानसून की बारिश के वाॢषक उतार-चढ़ाव के प्रति धीरे-धीरे अधिक लचीला होता जा रहा है। पिछले एक दशक में आई.एम.डी. के पूर्वानुमान न केवल अधिक सटीक और समयबद्ध हो गए हैं, बल्कि अधिक विस्तृत, सूक्ष्म और कार्रवाई योग्य भी हो गए हैं। इसने नीति नियोजन प्रक्रिया में अधिक दक्षता और निश्चितता ला दी है। पूर्वानुमान की सटीकता में यह सुधार ऐसे समय में आया है, जब जलवायु परिवर्तन के प्रभाव में मौसम के पैटर्न तेजी से अप्रत्याशित होते जा रहे हैं। आई.एम.डी. के सामने आगे की चुनौती इन घटनाओं के पूर्वानुमानों में और सुधार करना है, क्योंकि इनमें बड़े पैमाने पर आपदा और विनाश पैदा करने की क्षमता होती है। बेहतर जल प्रबंधन प्रथाएं, जलाशयों के संरक्षण के प्रयास, नदी और झील सफाई अभ्यासों ने यह सुनिश्चित करने में योगदान दिया है कि भारत मानसून के दौरान बारिश की कमी से निपटने के लिए बहुत बेहतर तरीके से तैयार है।

प्रमुख ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम के तहत किए गए कार्यों का एक बड़ा हिस्सा जल संरक्षण पर केंद्रित था। ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों तालाबों, कुओं, चैक डैमों और अन्य समान संपत्तियों के निर्माण ने पानी की उपलब्धता में सुधार किया है, भूजल स्तर को बढ़ाया है और वर्षा जल पर निर्भरता कम की है। इसी तरह, नदी और झील सफाई अभ्यासों ने कई जल निकायों को सामान्य उपयोग के लिए सुलभ बना दिया है। खराब मानसून वर्ष में एक बड़ी चिंता जलाशयों का खाली होना होती है। पिछले 2 वर्षों में हुई भरपूर बारिश के कारण (2024 और 2025 दोनों में मानसून के दौरान 100 प्रतिशत से अधिक बारिश हुई) जलाशय अभी तुलनात्मक रूप से आरामदायक स्थिति में हैं। जब तक बारिश की कमी वास्तव में बहुत तीव्र न हो, भारत बारिश की अधिकता की तुलना में कमी से निपटने के लिए बेहतर तैयार दिखता है, विशेष रूप से जब इसके कारण बाढ़ और आपदाएं आती हैं। पिछले एक दशक में हर साल भारी वर्षा की घटनाओं के परिणामस्वरूप कम से कम एक बड़ी आपदा हुई है।

प्रभाव एकसमान नहीं : 92 प्रतिशत वर्षा के पूर्वानुमान का मतलब यह नहीं है कि देश के हर स्थान पर कम वर्षा होने की संभावना है। विशिष्ट क्षेत्रों और महीनों के लिए पूर्वानुमान मई के महीने में किए जाते हैं। इस वर्ष, हालांकि, आई.एम.डी. ने इस बात का संकेत दिया है कि व्यक्तिगत क्षेत्रों और महीनों के लिए क्या स्थिति हो सकती है। ‘सामान्य से कम बारिश’ लगभग पूरे देश में अपेक्षित थी और उत्तर-पूर्व, उत्तर-पश्चिम और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत के केवल कुछ क्षेत्रों में सामान्य या सामान्य से अधिक बारिश होने की उम्मीद की जा सकती थी। सीजन के पहले 2 महीनों (जून और जुलाई) में बारिश सामान्य रहने की संभावना है, जबकि दूसरी छमाही (अगस्त और सितम्बर) के शुष्क रहने की उम्मीद है, क्योंकि मानसून की बारिश को दबाने का मुख्य कारण, पूर्वी प्रशांत महासागर में अल नीनो घटना, जुलाई में कभी शुरू होने की उम्मीद है और भारत पर इसका प्रभाव आमतौर पर 1 या 2 महीने के अंतराल के बाद महसूस किया जाता है। अप्रैल में ही विशिष्ट महीनों और क्षेत्रों के दौरान संभावित प्रभावों का संकेत देना अपने पूर्वानुमानों में आई.एम.डी. के बढ़ते आत्मविश्वास का संकेत है।-अमिताभ सिन्हा

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