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राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की घोषणाओं के विपरीत, कुछ लोगों का दावा है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन (निजाम में बदलाव) न तो हुआ है और न ही हो सकता है। दोनों पक्षों की ओर से यह एक बहुत बड़ा दावा है। इसे करीब से देखने और परखने के बाद कुछ दिलचस्प नतीजे सामने आ सकते हैं। लेकिन उसके लिए सबसे पहली शर्त यह है कि अपना मन खुला रखा जाए और यह जिद छोड़ दी जाए कि ऐतिहासिक तथ्यों के नतीजे हमारे मनपसंद ही हों।

अमरीका ने ईरान के पुराने निजाम के सभी नहीं तो सुप्रीम लीडर सहित भारी बहुमत में लगभग वे सभी लोग उड़ा ही दिए हैं, जो उस कट्टर अब्राहमिक सोच वाले इस्लामिक निजाम के वफादार थे। इससे एक नया निजाम खुद-ब-खुद अस्तित्व में आ चुका है। देखना यह है कि क्या ये नए चेहरे पुराने निजाम के स्वभाव और नीतियों का ही नया रूप हैं या बात कुछ और भी है। यह भी संभव है कि मौजूदा सत्ताधारी लोग कुछ समय तक दिखावा तो पुराने निजाम की नीतियों पर चलने का ही करें, क्योंकि वह राजनीतिक मजबूरी होगी, लेकिन धीरे-धीरे इस नए निजाम की नई सोच और दृष्टिकोण सामने आने लगे। जो नए चेहरे हैं, उनमें से कुछ को छोड़कर पुराने निजाम के दौरान इनमें से अधिकतर खुद हाशिए पर थे। अब खुदा जाने इसमें कितनी सच्चाई है, लेकिन एक विमर्श यह भी चल रहा है कि शायद इन्होंने ही चुपके से अमरीका के साथ मिलकर पुराने तानाशाह मरवा दिए हों। इसमें सच्चाई है या नहीं, कहना मुश्किल है। लेकिन कुछ रहस्यमयी तथ्य ध्यान जरूर खींचते हैं जिनके पक्ष और विरोध में बराबर के तथ्य और दलीलें पेश की जा सकती हैं।

यह बात बहुत ही रहस्यमयी है कि किसी को भी इस बात की भनक न लगे कि पुराने नेता इतनी आसानी से कैसे मारे गए और नए लोगों को मारने में अमरीका-इसराईल को क्या मुश्किल पेश आई। एक प्रभाव यह भी है कि निजाम सचमुच बदल चुका है लेकिन यह बात जाहिर करना न अमरीका के हित में है और न ईरान के मौजूदा निजाम के हक में। ईरान के लोग नए निजाम वालों को गद्दार न कहें, इसलिए मिल-जुलकर एक ऐसी जंग चलाई जा रही है, जिसमें अमरीका नए निजाम के किसी चपरासी तक को भी नहीं मार रहा। इस दलील को खारिज करना उतना ही आसान है जितना इसे साबित करना।  अमरीका और इसराईल के वे गुप्तचर हथकंडे जो ईरान के सुप्रीम लीडर, सेना प्रमुख, सबसे बड़े सैन्य अफसरों जैसे इंटैलिजैंस प्रमुख सहित पुराने निजाम के लगभग सभी सदस्यों को उनके घरों के अंदर तक जाकर आराम से कत्ल करके उन्हें जन्नत भेज सकते हैं, तो यदि वे चाहें तो उनके लिए मौजूदा निजाम के किसी भी नेता को मार गिराना कितना मुश्किल होगा? लेकिन पहली कतार तो छोडि़ए, अमरीका और इसराईल मिलकर ईरान के मौजूदा निजाम के किसी तीसरे-चौथे दर्जे के नेता या अफसर तक को हाथ नहीं लगा रहे। क्यों?

पहले 48 घंटों में ईरान के अंदर जमीन के ऊपर या जमीन के सैंकड़ों फुट नीचे तक कोई एक इंच जमीन ऐसी नहीं बची जहां अमरीका और इसराईल ने बड़े आराम से चहल-कदमी करके राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के सिर कलम न किए हों। फिर, उसके तुरंत बाद अचानक अमरीका और इसराईल यह प्रभाव देने लगे कि उनके हाथ कोई हीरा (प्रमुख ईरानी नेता) नहीं लग रहा, जबकि ईरानी नेता खुलेआम इस्फहान जैसे प्रमुख स्थानों पर घूमते और ईरानी लोगों के गले मिलते देखे जा सकते थे और देखे जा सकते हैं। ऐसा प्रभाव दिया जा रहा है जैसे जंग के चौथे दिन ही अमरीका-इसराईल की सारी खुफिया तंत्र शक्तियां छुट्टी पर चली गई हों और अब वे बिना तलवार के ही जंग लड़ रहे हैं। उधर ईरान, चीन, रूस, हिजबुल्ला, हमास और कई अन्य ताकतें मिलकर भी अमरीका या इसराईल का कोई तीसरे दर्जे का नामी फौजी मारने का दावा भी नहीं कर रहे।

अब तो कमाल ही हो गया। ईरान कहता है कि मैंने होर्मुज बंद कर दिया। इसके जवाब में बनता तो यह था कि अमरीका कहता कि मैं खुलवाऊंगा, मगर वह कह रहा है कि होर्मुज को बंद करने वाले ईरानी फैसले को पूरी तरह लागू करने के लिए मैं भी मदद करूंगा। अमरीका ने ईरान द्वारा बंद किए गए होर्मुज को बंद कर दिया! अमरीका और ईरान का नया निजाम होर्मुज को बंद रखने के लिए पूरी तरह साफ सहमत दिखाई दे रहे हैं। यानी दोनों का एक ही लक्ष्य। फिर जंग किस बात की हुई? और ट्रम्प की देखने में बेतुकी लगने वाली बयानबाजी और ईरानियों के खोखले दावे किसलिए? यदि मेरा शक सही है तो ये दावे एक बड़े विमर्श का हिस्सा हो सकते हैं। नए रिजीम को ईरान के अंदर राजनीतिक लोकप्रियता और विश्वसनीयता दिलाने के लिए अमरीका-विरोधी लड़ाकू जज्बे वाला दिखना जरूरी है, ताकि उनके लिए ईरानी लोगों के मन में सम्मान कायम रखा जाए। यदि ऐसा न हो तो नया निज़ाम अमरीका के किस काम का? लेकिन यह कोई खुफिया तथ्यों पर आधारित दावा नहीं है। यह एक संभावना का चित्रण है, जो बेबुनियाद नहीं बल्कि उन ठोस तथ्यों पर आधारित है जो तथ्य ईरानी और अमरीकी मीडिया में पहले ही जगजाहिर किए जा चुके हैं। यह याद रखना जरूरी है कि इतिहासकार का काम मनपसंद नतीजों के पक्ष में तथ्य इक_ा करना नहीं, तथ्यों को पवित्र मानकर उनके आगे सिर झुकाना होता है, चाहे वे इतिहासकार की मनपसंद धारणाओं की धज्जियां ही क्यों न उड़ाते हों।

निष्पक्ष विमर्श का दूसरा नाम इतिहास है और इतिहास न तो ईरान का दीवाना है, न अमरीका या इसराईल या चीन या भारत या पाकिस्तान का गुलाम। इसीलिए इतिहास आज आपका आशिक और कल आपका दुश्मन नजर आएगा। असल में वह न दोस्त है न दुश्मन। वह खुदा की तरह निष्पक्ष है। इस लेख में सिर्फ कुछ तथ्य पेश किए गए हैं। इन तथ्यों को खोजकर सिर्फ ऐतिहासिक सच की तलाश ही शुरू की जा सकती है। तलाश तक ही सीमित रहा जाए और दावों या फतवों से परहेज किया जाए तो बेहतर है।-हरचरण बैंस

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