भारत न ही मेरी जागीर है और न ही केंद्र में सत्ता चला रही सरकार की। सत्ता स्थायी नहीं होती। आज जहां मैं हूं, कल कोई और होगा परन्तु मेरी ‘भारत भूमि’ सदैव जीवित रहेगी। इस देश के मूलभूत सिद्धांतों और लोकतंत्र को कोई नहीं बदल सकता। यह 140 करोड़ भारतवासियों का देश है। इस देश में पक्ष और विपक्ष के टकराव से अराजकता फैल रही है जिसे रोकना आवश्यक है। इसके लिए केंद्र में सरकार चला रही पार्टी और विपक्षी नेताओं को मिल-बैठकर विचार करना होगा।
सत्ता पक्ष को विपक्ष की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाना होगा। विपक्ष को सत्ताधारी पार्टी की रीति-नीतियों की आलोचना करने का अधिकार है। सत्ता पक्ष ने यह क्यों सोच लिया कि विपक्ष का हर नेता ‘देशद्रोही’ है और कि वह विदेशी फंडों के दम पर अराजकता फैला रहा है। इस देश का सत्तापक्ष भी ‘देशभक्त’ और विपक्ष भी शुद्ध ‘देशभक्त’। इक्का-दुक्का नेता इसका अपवाद हो सकते हैं। जहां तक देश की एकता और अखंडता का प्रश्न है, हम सब भारतवासी एक हैं। यह सत्तापक्ष की जिम्मेदारी है कि वह विपक्षी नेताओं को ‘वार्तालाप की टेबल’ पर लाएं। विपक्ष यह क्यों सोचे कि सत्ता पक्ष उनकी आवाज को सुनता ही नहीं। विपक्ष सरकार का पूरक है। भारत के लोकतंत्र और संविधान का शृंगार है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए दोनों मित्रता का भाव रखें। सरकार और विपक्षी दलों की जिम्मेदारी है कि दोनों मिल कर देश को अराजकता के वातावरण से बाहर निकालें।
140 करोड़ लोग इस देश के मालिक हैं। सरकार लोगों की वोटों से बनती है। इस देश के मालिकों को वोटों के बाद कोई पूछता ही नहीं? क्या कोई साधारण व्यक्ति इस देश के प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों से मिल सकता है? अपने ‘ग्रीवैंसिस’ अपने चुने हुए प्रतिनिधियों तक पहुंचा सकता है? देश के 98 प्रतिशत लोग तो कभी नहीं। हां, 2 प्रतिशत पहुंच वाले, रौबदार व्यक्ति जरूर मंत्रियों या सचिवों तक पहुंच सकते होंगे। साधारण व्यक्ति ने अपने जन प्रतिनिधियों से मिलने-मिलाने की बात ही भुला दी है। बस इतनी सी बात वह कह सकते हैं :
किस-किस की फिक्र कीजिए, किस-किस को रोइए?
नींद बड़ी चीज है, मुंह ढंक के सोइए॥
जनता किससे फरियाद करे? अंग्रेजों का राज था तो महात्मा गांधी जब कभी ‘अनशन’ या ‘आमरण अनशन’ में आजादी के आंदोलन के समय बैठते थे तो अंग्रेज सरकार उनसे खुल कर अनशन तोडऩे, उनकी शिकायत दूर करने की अनुनय-विनय करती। पं. जवाहर लाल नेहरू के सत्याग्रह और अनशन पर अंग्रेजी हुकूमत उनसे वार्तालाप बनाए रखती। आज सत्ता पक्ष और विपक्ष टकराव की मुद्रा में लड़ते-झगड़ते दिखाई देते हैं। मिलकर मतभेदों को सुलझाने वाला कोई नेता न आज सत्तापक्ष में और न विपक्ष के पास है।
पर आज की अराजकता से देश का युवा कुछ अधिक दुखी है। आज की युवा पीढ़ी बड़ी बुद्धिमान है। भ्रष्टाचार ने उसको सोचने पर विवश कर दिया है। आज का युवा हैरान है कि ‘नीट’ के प्रश्नपत्र लीक क्यों हो रहे हैं। पेपर लीक कोई एक-दो बार नहीं, 121 बार हुए हैं। पेपर लीक हर रोज, हर स्टेट में हो रहे हैं। परीक्षा में 33 प्रतिशत अंक लेने वाला तो सरकारी डाक्टर बन गया और जिसने 93 प्रतिशत अंक लिए वह बेकार घूम रहा है। ‘चयन प्रणाली दोषपूर्ण, परीक्षा भवन नकल के केंद्र बन रहे हैं। पास को फेल और फेल को अव्वल घोषित किया जा रहा है। कोई पढ़े-लिखे युवाओं की सुनता ही नहीं।
ऐसी परिस्थितियों में आप बताएं कि युवा वर्ग ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ न बनाए तो क्या करे? चक्का जाम न करे तो क्या करे। धरना, जलूस, न निकाले तो क्या करे? इस अवसाद में या तो विदेश जाकर ‘सफाई सेवक’ बन जाएगा या आत्महत्या कर लेगा। क्या आप जानते हैं ‘नीट’ की परीक्षा में 21 बार पेपर लीक हुए हैं। इससे दुखी होकर 20 के लगभग योग्य युवक-युवतियों ने आत्महत्या कर ली है। क्या केंद्र या राज्य सरकारों ने अपने बहुमूल्य और योग्य युवाओं के माता-पिता के दुख-दर्द को सुना? उनके आंसुओं को पोंछा? फिर युवा वर्ग के पास चारा ही क्या था? आंदोलन, दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘आमरण अनशन’।
विपक्षी नेताओं को युवाओं को भड़काने-उकसाने और सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करने का अवसर मिल गया। लोहा पहले ही ‘अयोध्या राम मंदिर’ के चढ़ावे में करोड़ों की चोरी के मुद्दे पर गर्म था। सरकार और आर.एस.एस. की साख खतरे में थी। अत: देश में अराजकता का वातावरण खड़ा हो गया। देश में खतरे की घंटी बज उठी।-मा. मोहन लाल(



















