गुवाहाटी: असम के बिश्वनाथ जिले में, व्यस्त सड़कों पर चलते ई-रिक्शा की आवाज रीमा तेरांगपी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बन गई है। कई यात्रियों के लिए, वह बस एक युवा ड्राइवर है जो उन्हें उनकी मंज़िल तक पहुंचाती हैं। अपने परिवार के लिए, वह गंभीर आर्थिक तंगी के दौर में सहारा बनी हुई है। और अब अपने स्कूल और समाज का नाम रोशन किया है। तमाम बच्चों के लिए प्रेरणा बनी हैं। रीमा ने हायर सेकेंडरी परीक्षाओं में फर्स्ट डिवीज़न हासिल की है। उनकी लगन और मेहनत की पूरे असम में चर्चा हो रही है।

रीमा की यह उपलब्धि सिर्फ इसलिए खास नहीं है कि उसने कितने नंबर (कुल 307) हासिल किए, बल्कि इसलिए भी खास है कि उसने किन मुश्किल हालात में परीक्षा की तैयारी की। जहां ज्यादातर छात्र अपनी सुबह पढ़ाई दोहराने या कोचिंग क्लास जाने में बिताते हैं, वहीं रीमा अपने दिन की शुरुआत ई-रिक्शा में यात्रियों को लाने-ले जाने से करती है, उसके बाद कॉलेज जाती है।

पढ़ाई और काम के बीच बनाया तालमेल

बिश्वनाथ कॉमर्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल की छात्रा रीमा बीते एक साल से भी ज़्यादा समय से ई रिक्शा चला रही हैं। उन्होंने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पेट पालना ही मुश्किल था और उसी में उनकी पढ़ाई का बोझ माता-पिता उठा नहीं सकते थे। आखिरकार रीमा ने तमाम दबाव के बीच तालमेल बिठाया। ई-रिक्शा चलाने का फैसला किया।

मां बीमार, पिता का पैर टूटा

रीमा ने बताया कि उनकी मां की तबीयत अक्सर खराब रहती है। उसके पिता का पैर टूट गया था। परिवार की आर्थिक हालत बहुत खराब हो गई थी। रीमा की चार बहने हैं, जिनमें से वह सबसे बड़ी हैं। उन्होंने कहा कि वह पढ़ना चाहती थीं लेकिन पढ़ाई छोड़कर काम करने की नौबत आ गई थी। नतीजे घोषित होने के बाद मीडिया से बात करते हुए, रीमा ने बताया कि उसे तो परीक्षा पास करने की भी उम्मीद नहीं थी। उसने कहा, ‘मुझे तो यह भी नहीं पता था कि मैं पास भी हो पाऊंगी या नहीं। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं फर्स्ट डिवीज़न हासिल करूंगी।’

सुबह तड़के ई रिक्शा लेकर निकलती हैं रीमा

रीमा ने बताया कि उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था। कॉलेज जाने से पहले, मैं ई-रिक्शा चलाती हूं। इसके लिए सुबह पांच बजे घर से निकलती हैं। यात्रियों को उनकी मंज़िल तक पहुंचाती हैं। फिर स्कूल का समय होने पर वह उसी ई-रिक्शा से स्कूल भी जाती हैं। स्कूल से छुट्टी होने के बाद वह सवारियां बैठकर निकलती हैं। आर्थिक तंगी के बावजूद, बताया जाता है कि परिवार को बाहर से बहुत कम मदद मिली है। उन्हें सिर्फ़ असम की ‘अरुणोदय योजना’ के तहत उसकी मां को मिलने वाले फ़ायदे ही मिले हैं।

झुग्गी में रहता है परिवार

रीमा का घर एक झुग्गी में है। घर में पढ़ने के लिए कुर्सी मेज तो दूर की बात है, पर्याप्त रोशनी तक नहीं है। जिस दिन उसके नतीजे घोषित हुए, उस दिन भी रीमा ने जश्न मनाने के लिए समय निकालने के बजाय काम करना जारी रखा। उसकी दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आया, क्योंकि परिवार के गुज़ारे के लिए रोज़ की कमाई अब भी ज़रूरी है। उसका सबसे पहला सपना बैचलर ऑफ़ कॉमर्स (B.Com) की डिग्री हासिल करना है। हालांकि, घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए वह डिप्लोमा कोर्स करने के बारे में भी सोच रही है।

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