चीन में तलाक चाहने वाले जोड़े इन दिनों जल्द ये प्रक्रिया पूरी कराने के लिए भाग- दौड़ कर रहे हैं। उनकी कोशिश है कि 31 दिसंबर तक उनका तलाक हो जाए। इस जल्दबाजी की वजह यह है कि एक जनवरी 2021 से देश में पहली नागरिक संहिता लागू हो जाएगी। इस कारण तलाक का नियम बदल जाएगा। आम समझ यह है कि एक जनवरी के बाद तलाक लेना मुश्किल हो जाएगा। वेबसाइट सिक्थटोन.कॉम के मुताबिक शंघाई में तलाक की प्रक्रिया पूरी करने वाले दफ्तर के बाहर आने वाले लोगों की संख्या इन दिनों दो गुनी हो गई है। ग्वांगझू और शेंनझेन प्रांतों में तलाक प्रक्रिया के अपॉइंटमेंट के लिए ऑनलाइन स्लॉट पूरी तरह भर चुके हैँ। कई जगहों पर तलाक कार्यालय के बाहर देर तक लंबी लाइनें इन दिनों देखने को मिली हैं। नए सिविल कोड को इस साल मई में चीन की संसद ने मंजूरी दी थी। इसके आलोचकों का कहना है कि इसमें शामिल तलाक संबंधी नियम लोगों की तलाक पाने की आजादी का हनन करते हैं। साथ ही इसका नतीजा घरेलू हिंसा बढऩे के रूप में सामने आएगा। अभी तक चीन में तलाक की प्रक्रिया बहुत आसान है। आवेदन करने पर कई बार सिविल अफेयर्स ब्यूरो एक या दो दिन में ही तलाक पर मुहर लगा देते हैं। चीन में 2003 के बाद से तलाक की दरें लगातार बढ़ती गई हैं। 2019 में 47 लाख दंपतियों ने औपचारिक रूप से तलाक की प्रक्रिया पूरी की। ज्यादातर मामलों में तलाक का प्रस्ताव महिलाओं की तरफ से आता है। पिछले साल हुए कुल हुए तलाक में 74 फीसदी मामलों में पहल महिलाओं ने की थी। विशेषज्ञों के मुताबिक इस ट्रेंड का कारण महिलाओँ में आई आर्थिक आत्मनिर्भरता और विवाह के प्रति उनका बदला नजरिया है। इसके बावजूद पश्चिमी देशों की तुलना में चीन में आज भी तलाक की दर कम है। नए नियमों के मुताबिक अब पूरे अलगाव के पहले तलाक चाहने वाले दंपतियों को छह महीने के कुल-ऑफ पीरियड से गुजरना होगा। अधिकारियों के मुताबिक इस नए नियम का मकसद यह है कि फौरी गुस्से में लिए जाने वाले तलाक के मामलों में कमी लाई जाए। अधिकारियों का कहना है कि नौजवान दंपतियों में आवेश में आकर तलाक लेने के मामलों में बढ़ोतरी के कारण ये नियम बनाया गया है। इसके तहत तलाक की अर्जी देने के बाद दंपति को छह महीने का वक्त दिया जाएगा। अगर इसके बावजूद दोनों इसी नतीजे पर होंगे कि वे साथ नहीं रह सकते, तभी उनके तलाक को मंजूर किया जाएगा। लेकिन समाज शास्त्रियों का कहना है कि नया नियम तलाक लेने में बाधक बन जाएगा। चाइनीज एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज में समाजशास्त्र के प्रोफेसर वु शिओयिंग ने वेबसाइट सिक्थटोन.कॉम से कहा कि कूल-ऑफ पीरियड का प्रावधान समाज को पीछे ले जाने वाला है। यह तलाक में रुकावट बनेगा, लेकिन इससे टूट चुके रिश्तों को दोबारा जोडऩा संभव नहीं है। वू ने कहा कि सरकार समाज और वैवाहिक रिश्तों में स्थिरता लाना चाहती है, लेकिन नौजवानों में ये नीति जितनी अलोकप्रिय है, उससे जाहिर है कि नई पीढ़ी में विवाह संबंधी सोच बदल चुकी है। महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि अभी भी हिंसक व्यवहार की शिकार पत्नियों के लिए तलाक लेना आसान नहीं है। उन्हें अपनी जिंदगी बिल्कुल नए सिरे से खड़ी करनी पड़ती है। अब छह महीने के कूल-ऑफ पीरियड में स्थिति और बिगड़ सकती है। नए नियम का यह प्रावधान मुश्किलें खड़ी कर सकता है। कूल-ऑफ पीरियड के बाद भी तलाक तभी मिलेगा, जब दोनों पक्ष इसके लिए रजामंद हों। यानी कोई एक पक्ष अगर तलाक देने पर राजी ना हो, तो तलाक की अर्जी ठुकरा दी जाएगी। महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये मुमकिन है कि पति छह महीनों में अपनी राय बदल ले। इससे बहुत सी महिलाएं घरेलू हिंसा सहते हुए वैवाहिक संबंध में बनी रहने के लिए मजबूर हो जाएंगी। वैसे सरकारी अधिकारियों ने सफाई दी है कि नया प्रावधान सिर्फ उन मामलों पर लागू होगा, जिनमें दंपति पारस्परिक सहमति के आधार पर तलाक लेते हैं। यह उन मामलों पर लागू नहीं होगा, जिनमें तलाक का कारण घरेलू हिंसा बताया जाता है। लेकिन महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि असल में अब हर तलाक प्रक्रिया पूरी होने में कम से कम दो महीने लग जाएंगे।

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