देश की सबसे बड़ी मैडीकल प्रवेश परीक्षा नीट-यू.जी. 2026 को रद्द किए जाने के निर्णय ने करोड़ों भारतीय परिवारों को झकझोर दिया है। लाखों विद्यार्थियों ने वर्षों की मेहनत, अनुशासन और मानसिक संघर्ष के बाद इस परीक्षा में भाग लिया था। कई अभ्यर्थियों ने दिन-रात की पढ़ाई, सामाजिक जीवन से दूरी और आर्थिक कठिनाइयों के बीच डाक्टर बनने का सपना संजोया था। लेकिन परीक्षा रद्द होने की खबर ने अचानक उन सपनों के आगे अनिश्चितता का धुंधला पर्दा खड़ा कर दिया है। परीक्षा आयोजन संस्था नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एन.टी.ए.) ने कथित पेपर लीक और प्रश्नपत्र के कुछ हिस्सों के सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद परीक्षा निरस्त करने का फैसला लिया। मामला अब जांच एजैंसियों तक पहुंच चुका है और विपक्ष केंद्र सरकार तथा परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठा रहा है।

राजनीतिक बयानबाजी अपने स्थान पर है, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न उन विद्यार्थियों और अभिभावकों का है जिनकी महीनों नहीं बल्कि वर्षों की तपस्या इस घटनाक्रम से प्रभावित हुई है। भारत में नीट केवल एक परीक्षा नहीं है। यह मध्यम वर्गीय परिवारों के सपनों, संघर्षों और सामाजिक उन्नति की आकांक्षा का प्रतीक बन चुकी है। छोटे कस्बों और गांवों से आने वाले विद्यार्थी सीमित संसाधनों में पढ़ाई कर इस परीक्षा तक पहुंचते हैं। अनेक परिवार अपनी बचत कोचिंग संस्थानों और अध्ययन सामग्री पर खर्च कर देते हैं। ऐसे में परीक्षा रद्द होना केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि लाखों परिवारों के भावनात्मक संतुलन पर भी सीधा आघात है।

अभिभावकों की चिंता : आज सोशल मीडिया और समाचार चैनलों पर विद्यार्थियों की आंखों में आंसू, अभिभावकों की चिंता और भविष्य को लेकर असमंजस साफ दिखाई दे रहा है। कई छात्र मानसिक तनाव में हैं। कुछ ने पहली बार परीक्षा दी थी, तो कुछ अंतिम प्रयास कर रहे थे। परीक्षा दोबारा होने का अर्थ है  फिर वही मानसिक दबाव, फिर वही तैयारी और फिर अनिश्चितता का एक लंबा दौर। किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की सबसे बड़ी पूंजी उसकी निष्पक्षता होती है। यदि लाखों विद्यार्थियों के बीच कुछ लोगों को अनुचित लाभ मिला हो, तो परीक्षा परिणाम पर भरोसा समाप्त हो जाता है। इसलिए सरकार के सामने दो कठिन विकल्प थे। या तो विवादित परीक्षा के परिणाम घोषित कर दिए जाएं, जिससे ईमानदारी से मेहनत करने वाले विद्यार्थियों के साथ अन्याय होता, अथवा परीक्षा रद्द कर पुन: आयोजित की जाए, जिससे सभी अभ्यर्थियों को समान अवसर मिल सके। स्पष्ट है कि दोनों स्थितियों में सबसे अधिक नुकसान विद्यार्थियों का ही होना था। यही कारण है कि इस पूरे प्रकरण को केवल राजनीतिक दृष्टि से देखने की बजाय शिक्षा व्यवस्था के व्यापक संकट के रूप में समझना होगा।

आरोपों से घिरी रही अव्यवस्था : पिछले कुछ वर्षों में देश की अनेक प्रतियोगी परीक्षाएं पेपर लीक, तकनीकी गड़बडिय़ों और प्रशासनिक अव्यवस्थाओं के आरोपों से घिरी रही हैं। कभी भर्ती परीक्षाएं निरस्त होती हैं, कभी परिणाम विवादों में घिर जाते हैं और कभी परीक्षा केंद्रों की अनियमितताएं सामने आती हैं। इससे युवाओं का भरोसा कमजोर होता जा रहा है। लाखों छात्र यह महसूस करने लगे हैं कि उनकी मेहनत से अधिक ताकत सिस्टम की कमजोरियों और भ्रष्ट नैटवर्क के हाथ में है। यदि देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं में से एक की गोपनीयता सुरक्षित नहीं रह पाती, तो व्यवस्था की विश्वसनीयता पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठेंगे। विपक्ष सरकार की आलोचना कर रहा है और इसे प्रशासनिक असफलता बता रहा है। लोकतंत्र में विपक्ष का यह अधिकार भी है और दायित्व भी। लेकिन इस संवेदनशील विषय पर केवल राजनीतिक लाभ-हानि की दृष्टि उचित नहीं होगी। विद्यार्थियों का भविष्य किसी दल की चुनावी रणनीति का माध्यम नहीं बनना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, विपक्ष, शिक्षा विशेषज्ञ और परीक्षा एजैंसियां मिलकर स्थायी समाधान खोजें। सबसे पहले परीक्षा प्रणाली को तकनीकी रूप से अधिक सुरक्षित बनाने की आवश्यकता है। प्रश्नपत्र निर्माण, परिवहन और वितरण की पूरी प्रक्रिया को आधुनिक डिजिटल निगरानी से जोडऩा होगा। परीक्षा केंद्रों पर सुरक्षा व्यवस्था और जवाबदेही बढ़ानी होगी। जिन अधिकारियों या कर्मचारियों की लापरवाही सामने आए, उनके विरुद्ध त्वरित और कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। 

कोचिंग पर गंभीर विमर्श आवश्यक : इसके अतिरिक्त कोचिंग संस्कृति पर भी गंभीर विमर्श आवश्यक है। मैडीकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं के इर्द-गिर्द एक विशाल आर्थिक तंत्र खड़ा हो चुका है। प्रतियोगिता इतनी तीव्र हो गई है कि विद्यार्थी किशोरावस्था से ही दबाव में जीने लगते हैं। जब ऐसी परीक्षा विवादों में घिरती है, तो उसका असर केवल परिणाम तक सीमित नहीं रहता बल्कि युवाओं के आत्मविश्वास और सामाजिक विश्वास पर भी पड़ता है। नीट परीक्षा रद्द होना केवल एक प्रशासनिक घटना नहीं बल्कि देश की शिक्षा और भर्ती व्यवस्थाओं के सामने खड़ा गंभीर चेतावनी संकेत है। यदि समय रहते कठोर और पारदर्शी सुधार नहीं किए गए, तो युवाओं का भरोसा लगातार कमजोर होता जाएगा।  आज जरूरत दोषारोपण से अधिक संवेदनशीलता और सुधार की है।-बालकृष्ण थरेजा

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