कारगिल कश्मीर का हिस्सा है, इस भ्रम में भारतीय जनता है। कारगिल लद्दाख का हिस्सा है। १९९९ का कारगिल युद्ध लद्दाख की जमीन पर हुआ। उसमें शहीद हुए जवानों का ‘युद्ध स्मारक’ कारगिल में खड़ा है। लद्दाख, कश्मीर आज अलग हो गए, पर सवाल वही हैं। कश्मीर प्रदेश पार्वती की भूमि है। इस भूमि में गुस्से, आक्रोश पर पाबंदी है!

श्रीनगर से कारगिल के सफर में भारतीय संस्कृति और हिमालय का विहंगम दृश्य देखने को मिला। भारत से प्यार करने वाले हर शख्स को यह सफर एक बार जरूर करना चाहिए। इस सफर में आम ‘कश्मीरी’ राजनीतिक कार्यकर्ता और सेना के अधिकारी मिले। श्री संजय नहार कई सालों से कश्मीर घाटी में सामाजिक काम कर रहे हैं। दुर्गम इलाकों में स्कूल चलाते हैं। वे बोले, ‘‘कश्मीर साधारण नहीं है। कश्मीर देवी पार्वती का रूप है। देवी सरस्वती को कश्मीर में ‘कश्मीर पूरवासिनी’ कहा गया है। पार्वती क्रोधी थीं। इसलिए कश्मीरी मिट्टी में लगातार ‘बगावत’ है।
इस बगावत, बेचैनी को कुचलना और बंदूक के दम पर राज चलाना ठीक नहीं है। घाटी के युवाओं से संवाद आज टूट चुका है और ३७० धारा हटाने से हिंदुत्व की जीत हुई ऐसा मानना गलत है।’’ ‘‘हमारे साथ धोखा हुआ। एक भी वादा पूरा नहीं किया गया’’, ऐसा कहने वाले लोग श्रीनगर से लेकर लद्दाख, कारगिल तक मिले। जम्मू-कश्मीर छात्र संगठन के युवा पदाधिकारी मिले। वे कहते हैं, ‘‘दिल्ली को कश्मीर सिर्फ भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण लगता है। आज के नेताओं को कश्मीर का इतिहास फिर से पढ़ना चाहिए। कश्मीर को पार्वती का रूप मानते हो और कश्मीरी बच्चों की भावनाएं मारते हो, यह पार्वती पर अन्याय है!’’
‘‘जम्मू-कश्मीर में बेरोजगारी का स्तर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। हम निराशा के गर्त में हैं। हमारे साथ भेदभाव किया जा रहा है। देशभर में पढ़ने वाले कश्मीरी छात्रों को सामाजिक बहिष्कार, उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। यहां के युवाओं का आत्मविश्वास टूट चुका है। हम देश के नागरिक हैं यह सरकार नहीं मानती क्या?’’ उनका यह सवाल लाजवाब है। राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने का मौका कश्मीर के युवाओं को नहीं मिलता। अतीत के संघर्ष, इंटरनेट बंदी, शिक्षा-शोध में रुकावट के कारण अनगिनत उम्मीदवार प्रतियोगी परीक्षाओं में हिस्सा नहीं ले पाते। केंद्रीय प्रतियोगी परीक्षा (ळझ्एण्) रेलवे, बैंकों की परीक्षा में यहां के छात्रों को विशेष छूट मिलनी चाहिए, यह छात्रों की मांग जायज है, पर सरकार इंप्रâास्ट्रक्चर और धार्मिक कार्यों में ज्यादा उलझी है और पार्वती के प्रदेश की जनता की भावनाओं पर सरकार का ध्यान नहीं है।
कारगिल की लड़ाई
सोनमर्ग, गुलमर्ग, द्रास की बर्फ में पर्यटकों की भीड़ है। कारगिल पूरी तरह लद्दाख का हिस्सा है। कई लोगों को लगता है कि कारगिल जम्मू-कश्मीर में आता है। ऐसा नहीं है। भारतीय सीमा पर कारगिल है। १९९९ में यहां पाकिस्तानी घुस आए। पहाड़ों से उन्होंने हमले किए। इस अचानक हमले से अफरा-तफरी मच गई। वे ऊंचाई से हमले कर रहे थे, इसका उन्हें फायदा मिला। उन्होंने ‘हाईवे’ कब्जे में ले लिया, पर भारतीय सेना ने ५६२ सैनिकों का बलिदान देकर पाकिस्तान को खदेड़ दिया। उन ५६२ वीरों का ‘कारगिल युद्ध स्मारक’ अब खड़ा है। भारतीय भूमि पर यह युद्ध हुआ। इसमें कई युवा योद्धाओं ने प्राणों की आहुति दी। स्मारक की जगह से ऊपर ‘टाइगर हिल्स’ दिखता है। वैâप्टन विक्रम बत्रा अपनी सेना की टुकड़ी के साथ वहां पहुंचे और ‘टाइगर हिल्स’ को पाकिस्तानी सेना से मुक्त कराया। उस लड़ाई में वैâप्टन बत्रा को शहादत देनी पड़ी। ऐसे सभी वीरों की तस्वीरें वहां शौर्यगाथाओं के साथ लगी हैं। लड़ने वालों को प्रेरणा देने वाला और देशभक्ति क्या होती है यह दिखाने वाला ‘कारगिल युद्ध स्मारक’ नई पीढ़ी को जरूर देखना चाहिए। देशभक्ति सिर्फ हिंदू बनाम मुसलमान का संघर्ष नहीं है। माथे पर तिलक लगाकर उत्पात मचाना नहीं है। लोकतंत्र का युद्ध गलत तरीके से जीतना नहीं है। युद्ध की बुनियाद बलिदान और त्याग है। वही सच्ची देशभक्ति है, जो कश्मीर से कारगिल तक के सफर में दिखाई देती है और युद्ध स्मारक में प्रवेश करते ही जवानों के बलिदान की गाथाएं पढ़कर दिमाग सुन्न हो जाता है। देशभक्ति की खुशबू हर हिमशिखर से मानो हम तक पहुंचती है। मराठा रेजिमेंट पर कारगिल स्मारक की जिम्मेदारी है, यह खास बात है।
कश्मीर का विभाजन
नए राज्य पुनर्गठन में लेह-लद्दाख को जम्मू-कश्मीर राज्य से अलग किया गया। लद्दाख में अब सरकार नहीं है और दिल्ली द्वारा थोपी गई नौकरशाही राज कर रही है। लद्दाख यह प्रदेश पंजाब और कश्मीर से भी बड़ा है, यह भारतीयों को ही पता नहीं है। लद्दाख सिर्फ जमीन का टुकड़ा है ऐसा जिनको लगता है, उनके लिए यह खास जानकारी है। कारगिल लद्दाख का हिस्सा है। सिंधु नदी लद्दाख की मुख्य नदी है। यह नदी लेह शहर से आगे पाकिस्तान में प्रवेश करती है। कारगिल की सीमाएं सीधे पाकिस्तान से जुड़ी हुई हैं। सेना के अधिकारी ने सामने के पहाड़ की ओर इशारा करके बताया, ‘‘वह तिरंगा ऊपर फहरा रहा है और नीचे हरा झंडा दिख रहा है, यही सीमारेखा है। यह नदी बह रही है। जहां तक हमारा झंडा फहरा रहा है, वहां तक हमारा है। आगे उस पर पाकिस्तान का हक है। भारत की सीमा से बहने वाला पानी पाकिस्तान की सीमा में प्रवेश करता है। पानी पर दोनों का हक है। पहलगाम हमले के बाद प्रधानमंत्री मोदी बोले, ‘‘सिंधु नदी का पानी रोकेंगे’’ वैसा कुछ हुआ नहीं। भारत की चौकी से दी गई आवाज सामने पाकिस्तानी चौकी तक पहुंचती है। दोनों के बीच में एक सीमारेखा है। यहां एक बात समझनी चाहिए। कारगिल की सीमा के पार जो पाकिस्तान दिख रहा है, वह पाक अधिकृत कश्मीर नहीं है। जिसे आजाद कश्मीर कहा जाता है, वह यह हिस्सा नहीं है। पाक अधिकृत कश्मीर पूरी तरह अलग विषय है। सामने जो दिख रहा है वह पाक अधिकृत गिलगित-बाल्टिस्तान है। गिलगित-बाल्टिस्तान के लोग खुद को कश्मीरी नहीं मानते। उनकी भाषा और संस्कृति पूरी तरह अलग है। उनकी भाषा शिना और बाल्टी है। इन दोनों प्रदेशों पर पाकिस्तान का कब्जा है। किसी समय में यह भारत का हिस्सा था। प्रधानमंत्री मोदी जब पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर जीतेंगे तब गिलगित-बाल्टिस्तान के लिए भी उन्हें लड़ना पड़ेगा और तभी अखंड हिंदुस्तान का सपना पूरा होगा। उस जमीन पर आज पाकिस्तान का झंडा फहराते हुए देखा और उस दिशा में भारतीय सेना की बंदूकें भी सदैव तनी हुई दिखीं। लद्दाख की भूमि पर यह सब देखने को मिला। लद्दाख के बाजार में और सड़कों पर ईरान के शहीद सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई के पोस्टर लगे हैं। कई घरों पर, दुकानों पर ये पोस्टर लगे हैं, यह वैâसे? ‘‘यहां बहुसंख्यक शिया मुसलमान हैं। खामेनेई उनके भी सुप्रीम लीडर हैं। यहां एक अचरज हुआ। सुप्रीम लीडर की हत्या के बाद कश्मीर लद्दाख के शिया-सुन्नी एकजुट हुए और उन्होंने विरोध किया,’’ ऐसी जानकारी प्रशासन ने दी। कश्मीर से लद्दाख आज पूरी तरह टूटा हुआ है। पंख कटे हुए बाज की तरह वह बेचैन है। ३७० धारा हटाने से लद्दाख की जमीन भाजपा के ‘लैंड माफिया’ के लिए खुल गई। यहां की जमीनें आदिवासियों की हैं। अब उन पर कब्जा किया जाएगा। ‘‘आपको किसका डर लगता है?’’ इस पर ‘‘अडानी का’’ ऐसा जवाब मिला। लद्दाख की जमीन पर स्थित पावर ग्रिड पर कब्जा करने के लिए धारा ३७० हटाई गई। पावर ग्रिड पर अडानी की नजर है और ३७० हटाने के पीछे का खेल यही है, यह भावना लद्दाखवासियों की है। ‘लद्दाख की संपत्ति, जमीनें, जंगल अब लूटे जाएंगे। इसलिए भारतीय संविधान की छठी अनुसूची (ेगर््ेूप् ेम्प्ल्त) यहां लागू की जाए। इससे बाहर के लोगों को यहां आकर हमारी जमीनें लूटने का मौका नहीं मिलेगा। हमारी संस्कृति की रक्षा होगी। लद्दाख का स्वाभिमान बचाया जा सकेगा। सोनम वांगचुक ने इसी मांग के लिए लद्दाख की जमीन पर आंदोलन किया, तब उन्हें आतंकवादी ठहराकर जेल में डाल दिया गया, ऐसा बताने वाले मिले। कश्मीर की तरह लद्दाखी युवाओं के भी सवाल हैं। लद्दाख के पास अभी तक अपना विश्वविद्यालय नहीं है। जम्मू-कश्मीर का हिस्सा रहते हुए लद्दाख के छात्रों को जम्मू-कश्मीर के विश्वविद्यालयों, कॉलेजों में दाखिला मिल जाता था। अब वह बंद हो गया। डोमिसाइल सर्टिफिकेट की भी समस्या खड़ी हो गई है।
सरकार राजनीतिक फायदे के लिए राज्य तोड़ती है, लोगों में विभाजन करती है और फिर यह सब अधर में छोड़कर अगली राजनीति की ओर मुड़ जाती है!
कश्मीर-लद्दाख में ऐसी ही ‘अधर में’ राजनीति चल रही है।
गृहमंत्री अमित शाह की अब कश्मीर, लद्दाख में दिलचस्पी खत्म हो गई है। फिर भी लोग शांत रहें। बगावत की तो देशद्रोही कहलाओगे। पार्वती के प्रदेश में गुस्से, क्रोध, आक्रोश पर पाबंदी है!

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