केंद्र सरकार का ‘लाइफ मिशन’ एवं ‘स्वच्छ भारत मिशन’ तथा ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे अभियान भी जनभागीदारी को प्रोत्साहित कर रहे हैं। लेकिन किसी भी नीति की सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन और जनता के सहयोग पर निर्भर करती है। अंतत: पर्यावरण संरक्षण केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है…
प्रत्येक वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1972 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा शुरू किया गया यह दिवस केवल औपचारिक आयोजन का अवसर नहीं है, बल्कि पृथ्वी और मानव जीवन के भविष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारियों का स्मरण भी कराता है। पर्यावरण संरक्षण किसी एक देश, सरकार या संस्था का विषय नहीं रह गया है। यह हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी बन चुका है। वर्तमान समय में पर्यावरणीय संकट के आंकड़े चिंताजनक हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार वर्ष 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष दर्ज किया गया, जब वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में लगभग 1.55 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि तापमान वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया गया तो सूखा, बाढ़, हीटवेव और अन्य प्राकृतिक आपदाएं और अधिक विनाशकारी रूप ले सकती हैं। प्लास्टिक प्रदूषण भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। वर्तमान में दुनिया में हर वर्ष लगभग 40 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है, जबकि इसका केवल लगभग 9 प्रतिशत ही पुनर्चक्रित हो पाता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार हर साल 80 लाख से 1 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा समुद्रों में पहुंच जाता है। 1950 के दशक से अब तक 8.3 अरब टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन हो चुका है, जिसका अधिकांश हिस्सा आज भी कचरे के रूप में धरती पर मौजूद है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया की लगभग 99 प्रतिशत आबादी ऐसी हवा में सांस ले रही है जो स्वास्थ्य मानकों पर खरी नहीं उतरती है। वायु प्रदूषण के कारण हर वर्ष 70 लाख से अधिक लोगों की असमय मृत्यु होती है। भारत में भी लाखों लोग प्रदूषित वायु के कारण श्वसन, हृदय और अन्य गंभीर बीमारियों का सामना कर रहे हैं। जल प्रदूषण की स्थिति भी चिंताजनक है। देश के अनेक नदी निगरानी केंद्रों पर जल गुणवत्ता मानकों से नीचे पाई गई है, जिससे मानव स्वास्थ्य और जलीय जीवन दोनों प्रभावित हो रहे हैं। ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के अनुसार वर्ष 2023 में दुनिया ने हर मिनट में लगभग 10 फुटबॉल मैदान के बराबर वन क्षेत्र को खोया है। भारत का वन क्षेत्र कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 21.71 प्रतिशत है। शहरीकरण, सडक़ निर्माण, खनन और अन्य विकास गतिविधियों के कारण वनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप जैव विविधता प्रभावित हो रही है और प्राकृतिक संतुलन कमजोर पड़ रहा है। हिमाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय राज्यों में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। बादल फटना, भूस्खलन, फ्लैश फ्लड और अनियमित वर्षा जैसी घटनाओं में वृद्धि हुई है। वर्ष 2023 और 2025 में प्रदेश में अनेक प्राकृतिक आपदाओं के कारण बड़ी जन-धन हानि हो चुकी है। कोरोना महामारी के दौरान जब मानवीय गतिविधियां सीमित हुईं, तब प्रकृति में उल्लेखनीय सुधार भी देखने को मिला था। कई शहरों में वायु गुणवत्ता बेहतर हुई, नदियों का जल अधिक स्वच्छ दिखाई दिया और वन्यजीवों की गतिविधियों में वृद्धि दर्ज की गई थी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि प्रकृति में स्वयं को पुनर्जीवित करने की अद्भुत क्षमता है, आवश्यकता केवल उसे पर्याप्त अवसर देने की है। समाधान भी हमारे दैनिक जीवन में ही छिपा हुआ है। यदि प्रत्येक व्यक्ति छोटे-छोटे पर्यावरण अनुकूल कदम उठाए, तो बड़ा परिवर्तन संभव है।
सिंगल-यूज प्लास्टिक के स्थान पर कपड़े या जूट के थैले अपनाना, स्टील की बोतलों का उपयोग करना, जल और बिजली की बचत करना तथा कचरे का पृथक्करण करना, सरल लेकिन प्रभावी उपाय हैं। एक वयस्क वृक्ष प्रतिवर्ष लगभग 22 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर सकता है। इसी प्रकार एक टपकता नल सालभर में लगभग 11 हजार लीटर पानी बर्बाद कर सकता है। नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग भी समय की मांग है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोगैस और अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोत न केवल प्रदूषण कम करते हैं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा भी प्रदान करते हैं। विश्व स्तर पर नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है और भारत भी इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। देश ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है। पर्यावरण संरक्षण में शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि बचपन से ही विद्यार्थियों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित की जाए, तो वे आगे चलकर जिम्मेदार नागरिक बन सकते हैं। विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं को पर्यावरण जागरूकता अभियान चलाने चाहिए ताकि यह विषय केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रहे, बल्कि व्यवहार का हिस्सा भी बने।
सरकारों की भूमिका भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। केंद्र सरकार का ‘लाइफ मिशन’ एवं ‘स्वच्छ भारत मिशन’ तथा ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे अभियान भी जनभागीदारी को प्रोत्साहित कर रहे हैं। लेकिन किसी भी नीति की सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन और जनता के सहयोग पर निर्भर करती है। अंतत: पर्यावरण संरक्षण केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है। हमें यह समझना होगा कि प्रकृति के बिना मानव सभ्यता का अस्तित्व संभव नहीं है। आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। यदि सरकार, समाज, शैक्षणिक संस्थान, उद्योग जगत और आम नागरिक मिलकर कार्य करें, तो आने वाली पीढिय़ों के लिए एक स्वच्छ, सुरक्षित और संतुलित पृथ्वी का निर्माण संभव है। विश्व पर्यावरण दिवस हमें यही संदेश देता है कि धरती केवल हमारी विरासत नहीं, बल्कि आने वाली पीढिय़ों की अमानत भी है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह अपने दैनिक जीवन में पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देगा। क्योंकि सच यही है कि प्रकृति को हमारी आवश्यकता नहीं है, बल्कि हमें प्रकृति की ज्यादा आवश्यकता है।-अनुज आचार्य



















