डिब्रूगढ़ : अरुणाचल प्रदेश में लोंगडिंग कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) की एक टीम ने जेडुआ गांव के रूटीन फील्ड विजिट के दौरान एक पीले पफबॉल मशरूम को देखा और रिकॉर्ड किया। यह जिले में इस प्रजाति को देखे जाने और रिकॉर्ड किए जाने के शुरुआती मामलों में से एक हो सकता है और अरुणाचल प्रदेश की ज्ञात फंगल विविधता में एक महत्वपूर्ण बढ़ोतरी हो सकती है। फील्ड सर्वे 4 जून को किया गया था।

KVK के प्लांट पैथोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. दीप नारायण मिश्रा ने इसके खास पीले, गोले के आकार के फ्रूटिंग बॉडी और पफ़बॉल जैसी बनावट के आधार पर इस नमूने की पहचान शुरुआती तौर पर ‘बोविस्टा कोलोराटा’ (Bovista colorata) के रूप में की। उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य की शुरुआती समीक्षा से पता चलता है कि लोंगडिंग जिले से इस प्रजाति का कोई रिकॉर्ड अभी तक मौजूद नहीं है, जिससे यह जानकारी इस क्षेत्र के माइकोलॉजिकल रिकॉर्ड के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

पहली बार दिखा ऐसा मशरूम

डॉ. मिश्रा ने कहा कि उपलब्ध लिक्ट्रेचर की शुरुआती समीक्षा से पता चलता है कि लोंगडिंग जिले से इस प्रजाति का कोई रिकॉर्ड अभी तक मौजूद नहीं है। यह जानकारी अरुणाचल प्रदेश की ज्ञात मैक्रो-फंगल विविधता में एक महत्वपूर्ण बढ़ोतरी हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि पक्की टैक्सोनॉमिक पुष्टि के लिए माइक्रोस्कोपिक जांच और मॉलिक्यूलर कैरेक्टराइज़ेशन जरूरी होगा।

कैसा होता है येली पफबॉल मशरूम

‘बोविस्टा कोलोराटा’ फंगी के पफबॉल समूह से संबंधित है, जो आम मशरूम से अलग होते हैं। कैप के नीचे गिल्स पर स्पोर बनाने के बजाय, पफबॉल फंगी एक बंद, गोलाकार फ्रूटिंग बॉडी के अंदर लाखों माइक्रोस्कोपिक स्पोर बनाते हैं। जैसे-जैसे मशरूम बड़ा होता है, इसका अंदरूनी टिश्यू बारीक पाउडर जैसे स्पोर मास में बदल जाता है, जो हवा, बारिश की बूंदों या किसी हलचल से फैल जाता है, जिससे यह दूर-दूर तक आसानी से फैल सकता है।

खूब हेल्दी होता है यह येलो पफबॉल मशरूम

इकोलॉजिकल नज़रिए से, बोविस्टा प्रजातियां जंगल के इकोसिस्टम में महत्वपूर्ण डीकंपोज़र के तौर पर काम करती हैं। वे लिग्नोसेल्युलोजिक प्लांट मटीरियल को तोड़ती हैं, न्यूट्रिएंट साइक्लिंग में मदद करती हैं, कार्बन साइक्लिंग में योगदान देती हैं और मिट्टी में ऑर्गेनिक मैटर बनाने में मदद करती हैं। न्यूट्रिशन के नजरिए से, कई प्रजातियों के युवा पफबॉल मशरूम में प्रोटीन, डाइटरी फाइबर, जरूरी अमीनो एसिड, मिनरल और एंटीऑक्सीडेंट कंपाउंड होते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों में एंटीमाइक्रोबियल, एंटी-इंफ्लेमेटरी और संभावित फार्मास्युटिकल गुणों वाले बायोएक्टिव मेटाबोलाइट्स की मौजूदगी भी दर्ज की गई है।

जहरीला भी हो सकता है

इतिहास में, पफबॉल स्पोर का इस्तेमाल कुछ पारंपरिक संस्कृतियों में घाव पर लगाने के लिए प्राकृतिक मटीरियल के तौर पर किया जाता रहा है, क्योंकि इनमें नमी सोखने और खून का थक्का जमाने के गुण होते हैं। हालांकि, एक्सपर्ट चेतावनी देते हैं कि जंगली मशरूम को कभी भी एक्सपर्ट की सही पहचान के बिना नहीं खाना चाहिए, क्योंकि कभी-कभी कच्ची जहरीली किस्में खाने योग्य पफबॉल जैसी ही दिख सकती हैं।

इस खोज से पूर्वी हिमालय क्षेत्र की समृद्ध लेकिन कम दर्ज की गई फंगल जैव-विविधता की ओर ध्यान आकर्षित हुआ है। शोधकर्ताओं ने इस क्षेत्र में जंगली मैक्रो-फंगी की पारिस्थितिक भूमिकाओं और कृषि, पोषण तथा चिकित्सा में उनके संभावित उपयोगों को बेहतर ढंग से समझने के लिए व्यवस्थित सर्वेक्षण, हर्बेरियम प्रलेखन और डीएनए बारकोडिंग की आवश्यकता पर जोर दिया। लोंडिंग KVK ने कहा है कि इस नमूने को आगे के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए लिया जाएगा।

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