Masik Shivratri 2026: आज यानी 13 जून को ज्येष्ठ अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि है. सनातन परंपरा में इस दिन को मासिक शिवरात्रि के रूप में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव की सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने और व्रत रखने से जीवन के दुख-कष्ट दूर होते हैं तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है. यह व्रत दांपत्य जीवन में खुशहाली और मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए भी किया जाता है.

मासिक शिवरात्रि 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त

हिंदू पंचांग के अनुसार, मासिक शिवरात्रि की पूजा मध्य रात्रि (निशिता काल) में करने का विशेष महत्व है. इसलिए उदया तिथि और निशिता काल को ध्यान में रखते हुए व्रत 13 जून को रखा जा रहा है.

  • चतुर्दशी तिथि का आरंभ: 13 जून 2026 को शाम 04:07 बजे से
  • चतुर्दशी तिथि का समापन: 14 जून 2026 को दोपहर 12:19 बजे तक
  • निशिता काल पूजा मुहूर्त: रात 11:01 बजे से 12:41 बजे तक
  • प्रदोष काल: शाम 06:34 बजे से रात 08:04 बजे तक

पूजा की विधि

सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें. इसके बाद भगवान शिव के समक्ष हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें. मंदिर में जाकर या घर पर शिवलिंग का गंगाजल, दूध, दही, शहद और घी से अभिषेक करें. भोलेनाथ को चंदन का तिलक लगाएं. इसके बाद बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, भस्म और शमी पत्र अर्पित करें. भगवान शिव को फल और मिठाई का भोग लगाएं. अंत में शिव चालीसा का पाठ करें और घी के दीपक से आरती उतारें.

भगवान शिव के मंत्र

  • ॐ नमः शिवाय।
  • ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्उ। र्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
  • ॐ नमो भगवते रुद्राय।
  • ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
  • ॐ पशुपतये नमः।

भगवान शिव आरती 

भगवान शिव की आरती 

ॐ जय शिव ओंकारा,स्वामी जय शिव ओंकारा.

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव,अर्द्धांगी धारा॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुराननपञ्चानन राजे.

हंसासन गरूड़ासनवृषवाहन साजे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चार चतुर्भुजदसभुज अति सोहे.

त्रिगुण रूप निरखतेत्रिभुवन जन मोहे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमालामुण्डमाला धारी.

त्रिपुरारी कंसारीकर माला धारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बरबाघम्बर अंगे.

सनकादिक गरुणादिकभूतादिक संगे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमण्डलुचक्र त्रिशूलधारी.

सुखकारी दुखहारीजगपालन कारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिवजानत अविवेका.

मधु-कैटभ दो‌उ मारे,सुर भयहीन करे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

लक्ष्मी व सावित्रीपार्वती संगा.

पार्वती अर्द्धांगी,शिवलहरी गंगा॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

पर्वत सोहैं पार्वती,शंकर कैलासा.

भांग धतूर का भोजन,भस्मी में वासा॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

जटा में गंग बहत है,गल मुण्डन माला.

शेष नाग लिपटावत,ओढ़त मृगछाला॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

काशी में विराजे विश्वनाथ,नन्दी ब्रह्मचारी.

नित उठ दर्शन पावत,महिमा अति भारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरतिजो कोइ नर गावे.

कहत शिवानन्द स्वामी,मनवान्छित फल पावे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

भगवान शिव चालीसा 

॥ दोहा ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन,मंगल मूल सुजान.

कहत अयोध्यादास तुम,देहु अभय वरदान॥

श्री शिव चालीसा पाठ

जय गिरिजा पति दीन दयाला.सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके.कानन कुण्डल नागफनी के॥

अंग गौर शिर गंग बहाये.मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे.छवि को देखि नाग मन मोहे॥

मैना मातु की हवे दुलारी.बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी.करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे.सागर मध्य कमल हैं जैसे॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ.या छवि को कहि जात न काऊ॥

देवन जबहीं जाय पुकारा.तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥

किया उपद्रव तारक भारी.देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

तुरत षडानन आप पठायउ.लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥

आप जलंधर असुर संहारा.सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई.सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥

किया तपहिं भागीरथ भारी.पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं.सेवक स्तुति करत सदाहीं॥

वेद माहि महिमा तुम गाई.अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला.जरत सुरासुर भए विहाला॥

कीन्ही दया तहं करी सहाई.नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा.जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥

सहस कमल में हो रहे धारी.कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई.कमल नयन पूजन चहं सोई॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर.भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

जय जय जय अनन्त अविनाशी.करत कृपा सब के घटवासी॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै.भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो.येहि अवसर मोहि आन उबारो॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो.संकट ते मोहि आन उबारो॥

मात-पिता भ्राता सब होई.संकट में पूछत नहिं कोई॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी.आय हरहु मम संकट भारी॥

धन निर्धन को देत सदा हीं.जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी.क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

शंकर हो संकट के नाशन.मंगल कारण विघ्न विनाशन॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं.शारद नारद शीश नवावैं॥

नमो नमो जय नमः शिवाय.सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥

जो यह पाठ करे मन लाई.ता पर होत है शम्भु सहाई॥

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी.पाठ करे सो पावन हारी॥

पुत्र होन कर इच्छा जोई.निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे.ध्यान पूर्वक होम करावे॥

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा.ताके तन नहीं रहै कलेशा॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे.शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥

जन्म जन्म के पाप नसावे.अन्त धाम शिवपुर में पावे॥

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी.जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥ दोहा ॥

नित्त नेम उठि प्रातः ही,पाठ करो चालीसा.

तुम मेरी मनोकामना,पूर्ण करो जगदीश॥

मगसिर छठि हेमन्त ॠतु,संवत चौसठ जान.

स्तुति चालीसा शिवहि,पूर्ण कीन कल्याण॥

(Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहां दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।

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