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किसी भी समृद्ध और शांत समाज की असली ताकत उसका आपसी तालमेल, भाईचारा और सामाजिक समरसता होती है। छत्तीसगढ़ का ग्रामीण अंचल हमेशा से अपनी इसी अनूठी खूबी के लिए जाना जाता रहा है, जहां अलग-अलग जातियों, जनजातियों और समाजों के लोग एक सुंदर माला की तरह पिरोए हुए रहते हैं। बालोद जिले के तुएगोंडी-पाटेश्वर धाम (जामड़ीपाठ क्षेत्र) का यह विवाद भी बुनियादी तौर पर कभी ऐसा नहीं था जो समाज को आपस में बांटे। लेकिन आज, ‘सर्व आदिवासी समाज’ और ‘गोंडवाना’ के कुछ स्वयंभू व अलगाववादी नेताओं ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए इस क्षेत्र की ‘सामाजिक समरसता’ (Social Harmony) पर सीधा प्रहार किया है। जो ग्रामीण कल तक एक-दूसरे के सुख-दुख में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते थे, आज उनके बीच राजनीतिक लाभ के लिए अविश्वास की एक गहरी खाई खोदने की पुरजोर कोशिश की जा रही है।
सदियों पुराना भाईचारा बनाम मुट्ठी भर लोगों का एजेंडा

  1. गांवों की वास्तविक बनावट: विविधता में एकता का जीवंत प्रतीक
    इस जामड़ीपाठ क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सभी 12 गांवों का इतिहास गवाह है कि यहां की आबादी एकाकी नहीं है।
    • मिश्रित और समावेशी आबादी: इन गांवों में केवल आदिवासी समाज ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में गैर-आदिवासी, पिछड़े वर्ग (OBC) और अन्य समाजों के लोग भी पीढ़ियों से एक साथ निवास कर रहे हैं।
    • सांस्कृतिक ताना-बाना: यहां का सामाजिक ढांचा इतना मजबूत रहा है कि आदिवासियों के पारंपरिक त्योहारों, मड़ई और नवाखाई में गैर-आदिवासी उतनी ही श्रद्धा से शामिल होते हैं, जितनी श्रद्धा और आदर के साथ आदिवासी समाज के लोग अन्य उत्सवों का हिस्सा बनते हैं। यह आपसी निर्भरता, साझा चूल्हा-चौका और एक-दूसरे के प्रति सम्मान ही इन गांवों की असली पहचान है, जिसे अब निशाना बनाया जा रहा है।
  2. ‘हम और वो’ का कृत्रिम विभाजन पैदा करने की साजिश
    बाहर से आए अलगाववादी नेताओं और संगठनों का पूरा जोर इस बात पर है कि शांत ग्रामीण समाज में ‘आदिवासी बनाम गैर-आदिवासी’ का एक कृत्रिम विभाजन (Artificial Divide) पैदा कर दिया जाए।
    • असुरक्षा का मनोवैज्ञानिक खेल: ये नेता स्थानीय सीधे-साधे आदिवासियों के मन में यह झूठा डर और जहर घोल रहे हैं कि गैर-आदिवासी या बाहरी लोग उनकी जमीन, उनकी अनूठी संस्कृति और उनके प्राचीन देवस्थलों को हड़प लेंगे।
    • नफरत का बीज बोना: इस भड़काऊ और नकारात्मक प्रचार का उद्देश्य केवल और केवल समाज के एक हिस्से को दूसरे हिस्से के खिलाफ खड़ा करना है। जब गांवों में अविश्वास और नफरत का माहौल बनेगा, तभी इन स्वयंभू नेताओं की पूछ-परख बढ़ेगी और लोग अपनी वास्तविक समस्याओं (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार) को भूलकर इनके राजनैतिक एजेंडे के पीछे लामबंद होने को मजबूर हो जाएंगे।
  3. स्थानीय ग्रामीणों की वास्तविक इच्छा: सिर्फ शांति, सौहार्द और प्रगति
    यदि आंदोलन के इस प्रायोजित शोरगुल से अलग हटकर इन 12 गांवों के आम आदिवासियों और गैर-आदिवासियों से एकांत में बात की जाए, तो वे आज भी किसी तरह का टकराव नहीं चाहते।
    • शांति की सामूहिक मांग: स्थानीय ग्रामीण आज भी उसी आपसी भाईचारे, शांति और सौहार्द के साथ रहना चाहते हैं जिसमें उनके दादा-परदादा रहते आए हैं। उन्हें अच्छी तरह पता है कि आंदोलन खत्म होने के बाद बाहर से आए ये नेता तो अपनी बड़ी गाड़ियां लेकर शहरों को लौट जाएंगे, लेकिन नफरत की जो आग वे गांवों में लगा रहे हैं, उसमें जलना और भुगतना इसी क्षेत्र के स्थानीय लोगों को पड़ेगा।
    • विकास की चाह: समझदार ग्रामीण यह बखूबी जानते हैं कि पाटेश्वर धाम जैसी जगहों पर होने वाले सकारात्मक और धार्मिक कार्यों से पूरे क्षेत्र का बुनियादी विकास होता है, सड़कें बनती हैं, बाहर से लोग आते हैं जिससे रोजगार बढ़ता है और इसका फायदा किसी एक जाति को नहीं, बल्कि गांव के सभी वर्गों को मिलता है।
  4. मुट्ठी भर लोगों द्वारा सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करना
    यह पूरा विवाद पूरे आदिवासी समाज का स्वतः स्फूर्त आंदोलन नहीं है, बल्कि यह मुट्ठी भर अलगाववादी और राजनैतिक रोटियां सेकने वाले लोगों का एक सुनियोजित एजेंडा है।
    • राजनैतिक स्वार्थ सर्वोपरि: इन स्वयंभू नेताओं को न तो आदिवासियों के वास्तविक कल्याण से कोई सरोकार है, न उनकी आर्थिक तरक्की से और न ही गांवों के विकास से। इन्हें सिर्फ आगामी चुनावों को देखते हुए अपनी खोई हुई राजनैतिक जमीन वापस पाने और खुद को मीडिया व प्रशासन के सामने एक बड़े ‘वोट बैंक’ के ठेकेदार के रूप में चमकाना है। इसके लिए वे इतने संवेदनशील और शांत क्षेत्र की सामाजिक समरसता को भी दांव पर लगाने से रत्ती भर भी नहीं हिचकिचा रहे हैं।
    बालोद का यह विवाद अब केवल जमीन के एक टुकड़े या किसी देवस्थल तक सीमित नहीं रह गया है। यह इस शांत क्षेत्र की सदियों पुरानी ‘सामाजिक समरसता’ और आपसी विश्वास को लील जाने की एक बेहद खतरनाक और गहरी राजनैतिक कोशिश है। समय रहते यदि स्थानीय 12 गांवों के समझदार नागरिक, युवा, बुजुर्ग और पीढ़ियों से चले आ रहे परंपरागत मुखिया (गांयता, बैगा, सियान) एकजुट नहीं हुए और इन बाहरी ताकतों को नहीं नकारा, तो मुट्ठी भर लोगों का यह राजनैतिक स्वार्थ यहां के सुंदर सामाजिक ताने-बाने और सुख-शांति को पूरी तरह नष्ट कर देगा।
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