24 जून 2026 की सुबह भारत के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर लेकर आई. अमेरिका ने ईरान के कच्चे तेल पर से प्रतिबंध हटा दिए हैं. लेकिन भारत के लिए यह सिर्फ एक कूटनीतिक खबर नहीं, बल्कि इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों, महंगाई और सरकारी खजाने पर पड़ने वाला है. आइए एक्सप्लेनर समझते हैं कि अमेरिका के इस कदम से भारत को इतना फायदा क्यों हो सकता है…

पहले यह समझ लीजिए कि हुआ क्या है?

2018 में जब डोनाल्ड ट्रंप पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे तो उन्होंने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे. समेत कई देशों को ईरान से तेल खरीदने पर पाबंदी लगा दी गई थी. नतीजतन भारत को अपना पसंदीदा और सस्ता ईरानी तेल छोड़ना पड़ा. लेकिन अब 2026 में ट्रंप प्रशासन ने एक बार फिर वही रास्ता खोल दिया है.

अमेरिका और ईरान के बीच होर्मुज स्ट्रेट में शांति समझौता हुआ है और इसी के तहत अमेरिका ने ईरानी क्रूड ऑयल पर से प्रतिबंध हटाने का ऐलान किया. यह छूट 21 अगस्त 2026 तक के लिए दी गई है, यानी यह एक अस्थायी राहत है, लेकिन भारत के लिए कम समय में भी बड़े मायने रखती है.

भारत की तेल कहानी और ईरान का रोल

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल बाहर से मंगवाता है. एक समय था जब ईरान भारत को तेल सप्लाई करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश हुआ करता था. प्रतिबंधों से पहले भारत हर महीने करीब 4.5 लाख बैरल प्रतिदिन ईरानी तेल खरीदता था. लेकिन 2019 के बाद यह आंकड़ा बिल्कुल जीरो हो गया. तब से भारत ने इराक, सऊदी अरब और खासकर रूस से अपनी तेल खरीद बढ़ा दी. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद तो रूसी तेल भारत की टोकरी में सबसे ऊपर आ गया.

रूसी तेल पर जो डिस्काउंट मिलता था, वह लगातार कम होता जा रहा है. कई बार शिपिंग और बीमा की दिक्कतों के चलते उसकी फाइनल कॉस्ट बढ़ जाती हैच ऐसे में ईरान का रास्ता खुलना भारत के लिए चार वरदान साबित हो सकता है:

1. सस्ता तेल और कम आयात बिल

ईरानी क्रूड आमतौर पर ब्रेंट क्रूड के मुकाबले 8 से 10 डॉलर प्रति बैरल सस्ता मिलता है. ईरान अक्सर अपने तेल पर बेहतर क्रेडिट टर्म्स और लोअर फ्रेट चार्जेज भी देता है, क्योंकि भारत उसके लिए एक पुराना और भरोसेमंद ग्राहक है. जब आप करोड़ों बैरल तेल खरीदते हैं तो 8-10 डॉलर प्रति बैरल की बचत सीधे अरबों डॉलर के आयात बिल को कम कर देती है.

सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल क्रूड ऑयल आयात बिल लगभग 140 अरब डॉलर के पार चला गया था. अगर इस रकम का कुछ हिस्सा भी सस्ते ईरानी तेल में शिफ्ट होता है तो इससे न सिर्फ विदेशी मुद्रा की बचत होगी, बल्कि चालू खाते का घाटा (करेंट अकाउंट डेफिसिट) भी कंट्रोल होगा. इसका सीधा असर रुपये की मजबूती पर पड़ता है.

2. पेट्रोल-डीजल और महंगाई पर असर

सस्ता कच्चा तेल आने से कंपनियों की लागत घटेगी और सरकार चाहे तो इसका फायदा आम आदमी तक पहुंचा सकती है. पिछले कुछ समय से पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर जरूर हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में उथल-पुथल का दबाव हमेशा बना रहता है. ईरानी तेल से कंपनियों को मार्जिन बेहतर करने का मौका मिलता है और जरूरत पड़ने पर कीमतों में कटौती की गुंजाइश बनती है.

इससे भी बड़ा असर महंगाई पर पड़ता है. कच्चे तेल के दाम सिर्फ ईंधन तक सीमित नहीं रहते, ये ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट बढ़ाकर सब्जियों से लेकर दूध तक हर चीज को महंगा बनाते हैं. सस्ता तेल आने का मतलब हर सामान की ढुलाई सस्ती होना है, जो किचन के बजट को राहत दे सकता है.

3. रूस और मिडिल ईस्ट पर निर्भरता घटाने का मौका

भारत के लिए यह सिर्फ कीमत का नहीं, बल्कि रणनीति का भी सवाल है. फिलहाल हमारा तेल आयात काफी हद तक रूस, इराक और सऊदी अरब जैसे कुछ गिने-चुने देशों पर टिका है. किसी एक सप्लायर पर बहुत ज्यादा निर्भर होना किसी भी देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए ठीक नहीं.

ईरान की वापसी से भारत को अपने तेल के सोर्स और ज्यादा बढ़ाने बनाने का मौका मिलेगा. यह एक तरह का रिस्क मैनेजमेंट है, यानी अगर रूस से सप्लाई में कोई रुकावट आती है या OPEC+ देश उत्पादन में और कटौती करते हैं, तो ईरान बेहतर ऑप्शन रहेगा.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत अपनी रिफाइनरियों के लिए हाई-सल्फर क्रूड का भी अच्छा खरीदार है. ईरान का तेल इस लिहाज से एकदम फिट बैठता है. भारत की जामनगर, वडोदरा और मैंगलोर जैसी रिफाइनरियां ईरानी ग्रेड को आसानी से प्रोसेस कर सकती हैं.

4. भुगतान में आसानी का रास्ता

पहले भारत ईरान को रुपए में भुगतान करता था, जिसका एक हिस्सा ईरान भारतीय सामान की खरीद पर खर्च करता था. इससे दोतरफा व्यापार को बढ़ावा मिलता था और डॉलर पर निर्भरता कम होती थी. हालांकि, फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट साफ कहती है कि अभी यह साफ नहीं है कि इस अस्थायी छूट में किस तरह पेमेंट किया जाएगा.

एक्सपर्ट्स का मानना है कि पुराना रुपया-रियाल करेंसी अरेंजमेंट फिर से शुरू हो सकता है. अगर ऐसा हुआ तो भारत के लिए यह सोने पे सुहागा जैसी स्थिति होगी. एक तरफ सस्ता तेल और दूसरी तरफ डॉलर खर्च किए बिना खरीदारी.

लेकिन क्या तेल खरीदना इतना आसान है?

विदेश मामलों के जानकार और और JNU के प्रोफेसर राजन कुमार कहते हैं, ‘यह पूरी तरह सुनहरी तस्वीर नहीं है, क्योंकि यह छूट सिर्फ 21 अगस्त 2026 तक के लिए ही है. यानी दो महीने से भी कम समय में भारत जितना ईरानी तेल खरीद सकता है, उसकी एक सीमा होगी. इतने कम समय में बहुत ज्यादा तेल मंगवाने के लिए शिपिंग, बीमा और लॉजिस्टिक्स की चुनौतियां सामने आ सकती हैं.’

CNBC की रिपोर्ट के मुताबिक, यह राहत पूरी तरह से शांति समझौते के अमल पर निर्भर है. अगर तनाव दोबारा बढ़ता है तो प्रतिबंध वापस लग सकते हैं.

इसके अलावा, अमेरिकी विदेश मंत्रालय के बयान में साफ कहा गया है कि यह एक सीमित और सशर्त छूट है. यानी भारत को बहुत सावधानी से कदम उठाना होगा ताकि अमेरिकी प्रतिबंधों के दूसरे पहलू उल्लंघन न हों.

भारत सरकार ने तेल खरीद के लिए क्या कदम उठाए?

भारत सरकार और तेल कंपनियां अभी से इस तैयारी में जुट गई हैं कि कैसे जल्द से जल्द पहला कंसाइनमेंट ईरान से मंगवाया जाए. इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और भारत पेट्रोलियम जैसी बड़ी कंपनियों ने कमर्शियल टर्म्स पर बातचीत शुरू कर दी है. उम्मीद है कि अगर यह छूट आगे बढ़ाई गई तो भारत एक बार फिर ईरान का सबसे बड़ा तेल ग्राहक बन सकता है.

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