भारत के संदर्भ में 25 जून का दिन अलोकतांत्रिक, दमनकारी, तानाशाही आपातकाल का है, लेकिन वैश्विक स्तर पर भी आपात स्थितियां बनी हैं, क्योंकि अमरीका और ईरान के बीच सब कुछ विरोधाभासी ही है। दोनों देशों ने 14 बिंदुओं वाले सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन संवाद ठहरा है अथवा मध्यस्थों के साथ जारी है। अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप बार-बार विनाशक हमले की धमकियां दे रहे हैं। वहां के अधिकतर लोग मानते हैं कि ईरान युद्ध में अमरीका पराजित हुआ है। सहमति-पत्र में लगभग सभी ईरानी शर्तें अमरीका को माननी पड़ी हैं। सीनेट में भी टं्रप हार गए हैं, क्योंकि अमरीकी संसद ने ‘वॉर पॉवर्स’ संबंधी प्रस्ताव पारित कर लिया है। अब संसद की पूर्व अनुमति के बिना राष्ट्रपति टं्रप किसी भी युद्ध में कूद नहीं सकते। बहरहाल टं्रप की धमकियों पर ईरान भी पलटवार को तैयार है। उनके सुप्रीम लीडर मुज़्तबा खामेनेई का एक सीक्रेट पत्र लीक हुआ है, जिसमें साफ आदेश है कि अमरीका के साथ बातचीत तुरंत रोक दें। इसी जंगी माहौल में ईरान ने ‘कादिर’ बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया है। अमरीका और ईरान युद्ध के मोर्चों पर सैन्य तौर पर तैनात हैं। क्या ऐसे समझौता संभव है? ईरान और इजरायल एक बार फिर एक-दूसरे पर विध्वंसक हमले करने की तैयारी-तैनाती में हैं। राष्ट्रपति टं्रप लेबनान पर हमले रोकने के लिए इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर दबाव नहीं बना सके हैं। इजरायल हवाई बमबारी कर दक्षिण लेबनान में तबाही और विध्वंस को जारी रखे है। लगातार हत्याएं की जा रही हैं, लोग विस्थापित होने को मजबूर हैं, लेकिन टं्रप सिर्फ ईरान को धमकाते रहते हैं कि समझौता नहीं हुआ, तो पहले से ज्यादा विध्वंसक हमले झेलने पड़ेंगे। ईरान पहले ही बर्बाद हो चुका है। राष्ट्रपति टं्रप की धमकियों के कारण ही समझौते का संवाद 24 घंटे भी जारी नहीं रह सका है। ईरानी दल ने अमरीकी दल से न तो हाथ मिलाया, न ही संयुक्त फोटो खिंचवाई, बल्कि वार्ता-सभागार से वॉकआउट कर गया। ईरान ने मध्यस्थों को साफ कर दिया कि वे अमरीका के साथ इस तरह बातचीत नहीं करेंगे।

तो क्या समझौता नहीं होगा? अधिक मौजू सवाल यह है कि जिस तरह टं्रप ईरान को हडक़ाए रखना चाहते हैं, उसके मद्देनजर अंतिम समझौता कैसे होगा? अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप और उपराष्ट्रपति वेंस ने ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों, यूरेनियम के संवर्धन और अमरीकी सामान खरीदने की बाध्यता पर जो बयान दिए हैं, ईरान ने उनका खंडन किया है। ईरान ने अमरीका और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) को साफ कह दिया है कि परमाणु स्थलों का निरीक्षण अंतिम समझौता होने के बाद ही संभव हो सकता है। ईरानी दल ने स्विट्जरलैंड में आईएईए प्रमुख राफेल ग्रोसी से मुलाकात करने से भी इंकार कर दिया है। अमरीका और ईरान के दरमियान इतने विरोधाभास हैं कि सवाल स्वाभाविक लगता है कि इस तरह अंतिम समझौता कैसे होगा? समझौता होगा भी अथवा नहीं? ‘व्हाइट हाउस’ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय के तहत ईरानी तेल को पाबंदियों से मुक्त कर दिया है। 1979 के बाद अमरीका ने यह ऐतिहासिक फैसला लिया है। बेशक ईरान वार्ता के 60 दिनों तक ही तेल की आजादी महसूस करेगा, फिर भी उसकी अर्थव्यवस्था के लिए यह अति महत्वपूर्ण निर्णय है। ईरान हमेशा पाबंदी-मुक्त रहे, यह बिंदु भी सहमति-पत्र में है। यदि समझौता हुआ, तो ईरान को हमेशा के लिए पाबंदी-मुक्त करना ही पड़ेगा। बहरहाल ईरान इस दौरान 40-43 अरब डॉलर का तेल बेच सकेगा। इसी के मद्देनजर भारत ने भी ईरान से 38.85 लाख बैरल तेल खरीदा है। संभव है कि दोनों देशों के बीच नया करार हो जाए! भारत के 11 जहाज, टैंकर होर्मुज को पार कर निकले हैं, जिनमें कच्चा तेल, एलएनजी, एलपीजी और खाद लदी है। अभी 10 और भारतीय जहाज वहां फंसे हैं। वे भी 60 दिन की इस अवधि में तेल-गैस आदि लेकर लौट सकते हैं। इसी दौरान अमरीका ने ईरान पर यह शर्त थोपी है कि पाबंदियां खुलने के बाद ईरान अमरीका को ही तेल बेचेगा, लेकिन ईरान ने साफ इंकार कर दिया है। टं्रप की यह भी शर्त है कि ईरान की जब्त संपत्तियों में से जो भी राशि जारी की जाएगी, उससे ईरान अमरीकी सामान ही खरीदेगा। क्या ऐसी शर्तें थोपने के बाद किसी समझौते की उम्मीद की जा सकती है?

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