आखिर राष्ट्रपति टं्रप और ईरान क्या चाहते हैं? वे युद्ध को समाप्त करने के पक्षधर हैं अथवा युद्धविराम का ढोंग करते रहना चाहते हैं? दुनिया की पतली आर्थिक स्थितियों और ऊर्जा-खाद्य संकट के कोहराम के लिए दोनों ही देश जिम्मेदार हैं। राष्ट्रपति टं्रप ने पोस्ट लिखी है, जिसके भाषायी मायने साफ हैं कि उन्होंने मान लिया है कि ईरान मानने लायक नहीं है, लिहाजा अब सेना के जरिए काम पूरा करना पड़ेगा। यदि ऐसा करना पड़ा, तो ईरान का वजूद ही खत्म हो जाएगा। पलटबयान में ईरान भी कम नहीं है। उसके प्रवक्ता भी खूब धमकियां देते हैं। अप्रत्याशित हथियारों की बात करते हैं। समझौते के सहमति-पत्र पर दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने दस्तखत किए थे। उसकी अपनी राष्ट्रीय और द्विपक्षीय महत्ता और गरिमा होती है, लेकिन ईरान में कट्टरपंथियों और आईआरजीसी का एक तबका ऐसा है, जो युद्ध खत्म करने के खिलाफ है। और कितना बर्बाद, खंडहर होना चाहता है ईरान? उसकी 40 फीसदी से ज्यादा आबादी गरीबी-रेखा के तले जीने को विवश है। मुद्रास्फीति 65-70 फीसदी के करीब है, लिहाजा ब्रेड, मांस, खाने-पीने की आम चीजों की कीमतें 140 फीसदी तक उछल गई हैं। अर्थव्यवस्था में 8.8 से 10 फीसदी तक की गिरावट संभावित है। यह आकलन आईएमएफ का है। ईरानी मुद्रा ‘रियाल’ का ऐसा ऐतिहासिक पतन हुआ है, लिहाजा लोग किश्तों पर ‘रोटी’ खाने को विवश हैं। युद्ध में ईरान का नुकसान करीब 270 अरब डॉलर आंका गया है, जो उसकी जीडीपी के 57 फीसदी के बराबर है। और कितना दरिद्र होगा ईरान? ताजा हालात ये हैं कि अमरीकी सेना ने ईरान के 10 मिसाइल और ड्रोन के ठिकानों पर हमले किए। उसने ईरान के रडार और सर्विलांस सिस्टम को तबाह कर दिया। पलटवार में ईरान ने कुवैत के अमरीकी वायुसेना बेस और बहरीन के अमरीकी नौसेना के 5वें बेड़े पर मिसाइल हमले कर उन्हें तबाह कर दिया। ईरान ने कतर में भी हमले किए, लेकिन इस बार सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को नहीं छुआ। शायद कोई ‘मोटी डील’ हो गई होगी! अमरीका ने होर्मुज के तटीय इलाकों में, केश्म द्वीप और सिरिक में, एफ-16 समेत 6 लड़ाकू विमानों से हमले किए और ईरान के 4 अहम ठिकानों को तबाह, बर्बाद करने का दावा किया। अब ईरान ने हुंकार भरी है कि होर्मुज पर उसका ही कब्जा बरकरार रहेगा। जिस जहाज, टैंकर ने उसके निर्देश नहीं माने, तो उन पर हमला कर नेस्तनाबूद कर दिया जाएगा।
यह समझौते और युद्धविराम की कौन-सी भाषा है? इन हमलों और जंगी परिस्थितियों से स्पष्ट है कि अमरीका-ईरान के दरमियान एक ठोस, स्थायी समझौता संभव नहीं है। दोनों की मानसिकता ही समझौते की नहीं है, बल्कि वे अब भी कट्टर दुश्मन की तरह व्यवहार कर रहे हैं। दोनों के बीच जिस तरह हमले बोले जा रहे हैं, वे कोई सामान्य, छुटपुट टकराव नहीं हैं, संपूर्ण युद्ध के आक्रमण हैं। शायद इस युद्ध से अमरीकी अर्थव्यवस्था और सप्लाई चेन पर उतना असर न पड़े, लेकिन युद्ध के दौरान उसके भी 14 सैनिक मारे गए और 300 से अधिक घायल हुए। यह पेंटागन की ही रपट है कि 42 मानवरहित विमान, ड्रोन, लड़ाकू विमान नष्ट हुए या क्षतिग्रस्त हुए। अमरीका का कुल युद्ध खर्च 5 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच गया। पेंटागन ने शेष युद्ध और हथियारों के लिए 80 अरब डॉलर (करीब 6.6 लाख करोड़ रुपए) के अतिरिक्त बजट की मांग संसद से की है, लेकिन संसद ने फिलहाल मंजूरी नहीं दी है। यदि युद्ध के संदर्भ में भारत का आकलन करें, तो ईरान युद्ध से भारत को करीब 2 लाख करोड़ रुपए का व्यापक आर्थिक और राजकोषीय झटका लगा है। भारत करीब 88 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। जब तेल के दाम 110 डॉलर तक उछले थे, तो पेट्रोल-डीजल, एलपीजी, सीएनजी, खाद आदि के दाम भी बढ़ाए गए थे। फिलहाल उन्हें सस्ता नहीं किया गया है। युद्ध और आयात बिल बढऩे से हमारा विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 11.68 अरब डॉलर कम हुआ है। भारत की औसत विकास दर भी 1 फीसदी कम हो सकती है। युद्ध के तनाव और हमलों के कारण करीब 13 लाख भारतीय प्रवासी खाड़ी देश छोड़ कर स्वदेश लौट आए हैं। उनके रोजगार का अब क्या होगा? बहरहाल यह युद्ध खत्म होना ही चाहिए। दोनों पक्षों को नुकसान ही हुआ है। साथ ही विश्व के कई देश भी इससे प्रभावित हुए हैं। जनकल्याण के लिए विकास गतिविधियां जरूरी हैं, और विकास तभी होगा, जब विश्व भर में शांति कायम होगी।



















