चाहे सरकार का निर्देश हो या अदालत का फैसला, कुछ लोग नियमों की अनदेखी कर अपने हित साधने का कोई न कोई रास्ता निकाल लेते हैं, भले ही इससे किसी की जान जोखिम में क्यों न पड़ जाए। सर्वोच्च अदालत ने अपने एक फैसले में कहा कि सरकारी जमीन के अतिक्रमण पर पूरी तरह रोक लगाई जानी चाहिए। सरकार की ओर से भी यह कहा जाता रहा है कि अतिक्रमण करना कानूनी जुर्म है और ऐसा करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
कानून के मुताबिक, रिहायशी भवनों का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। भवन निर्माण से पहले प्रवेश और प्रस्थान के लिए उचित रास्ते बनाए जाने चाहिए। इमारतों में आग लगने या अन्य आपात स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त प्रबंध करना जरूरी है। मगर इन नियम-कानूनों की कौन परवाह करता है? विकास के नाम पर बहुमंजिला इमारतें या भीड़भाड़ वाले स्थलों पर बेतरतीब निर्माण प्रगति का प्रतीक बनते-बनते मौत का सूचक बनने लगे हैं।
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के राजेंद्र नगर में दो वर्ष पहले एक इमारत के भूतल में बारिश का पानी भर जाने से वहां कोचिंग सेंटर में मौजूद तीन युवाओं की मौत हो गई थी। ये वे नौजवान थे, जो यूपीएससी परीक्षा की तैयारी कर अपने लिए बेहतर रोजगार की जमीन तलाश रहे थे। यहां भी नियमों का उल्लंघन कर निर्माण हुआ था, मगर संबंधित महकमे के अधिकारियों की मिलीभगत से इसे नजरअंदाज कर दिया गया।
इसी तरह का एक मामला हाल में दिल्ली के मालवीय नगर में सामने आया। एक इमारत का अवैध तरीके से विस्तार कर उसे बहुमंजिला होटल बना दिया गया। छह कमरों की विभागीय मंजूरी लेकर 26 कमरे बना दिए गए। इस इमारत में आपात स्थिति के लिए वैकल्पिक निकासी मार्ग और अग्निशमन के पुख्ता प्रबंध नहीं किए गए थे। जब आग लगी तो कई लोग इमारत के अंदर ही फंस गए और उनकी मौत हो गई। इनमें से कई लोग ऐसे थे, जो अपने निकट संबंधियों के उपचार के लिए इस होटल में ठहरे हुए थे। इस घटना के बाद विरोध-प्रदर्शन हुए, सरकार की ओर से पीड़ितों के लिए अनुदान राशि घोषित की गई और फिर अवैध निर्माण को गिराकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
लखनऊ में व्यावसायिक इमारत में आग से 15 लोगों की मौत हुई थी
इसके बाद नियमों की अनदेखी और विभागीय लापरवाही की दिल दहला देने वाली घटना उत्तर प्रदेश में लखनऊ के अलीगंज में सामने आई। जिस इमारत को वर्ष 2016 से ढहाने का नोटिस दिया गया था, वहां गैर-कानूनी ढंग से निर्माण किया गया था। इस व्यावसायिक इमारत में कोचिंग सेंटर भी संचालित किया जा रहा था। यहां लगी आग की घटना में विद्यार्थियों सहित पंद्रह लोगों की मौत हो गई। पहली मंजिल पर पक्षी और जानवर रखे गए थे। दूसरी मंजिल पर गोदाम था और तीसरी मंजिल पर कोचिंग सेंटर था। आग गोदाम में लगी और देखते ही देखते पूरी इमारत जल गई। अंदर बैठे छात्र बाहर की ओर भागे, लेकिन निकासी के लिए कोई वैकल्पिक मार्ग नहीं था। बचाव दल ने इमारत की पिछली दीवार तोड़कर कुछ लोगों को बाहर निकाला, तो कुछ छात्र जान बचाने के लिए खिड़की से कूद गए।
इसे शासन-प्रशासन की लापरवाही नहीं तो और क्या कहा जाएगा कि कुछ लोग चंद पैसों के लालच में नियम-कानून का उल्लंघन कर बहुमंजिली इमारतें खड़ी कर देते हैं, जहां आपात स्थिति के लिए कोई बंदोबस्त नहीं किए जाते। ऐसी इमारतों को कहीं होटल में तब्दील कर दिया जाता है, तो कहीं कोचिंग सेंटर संचालित किए जाते हैं। जाहिर है कि यह विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है।
अदालतों की ओर से ऐसे मामलों में कई बार निर्देश और चेतावनियां दी जा चुकी हैं, लेकिन इन्हें अमल में लाने का जिन पर जिम्मा है, वे आंखें मूंदे बैठे हैं। प्रशासन में छिपी काली भेड़ें नियमों का उल्लंघन करने वालों का रास्ता साफ कर देती हैं। लखनऊ के अलीगंज में जिस व्यावसायिक इमारत में आग लगी थी, वह वर्ष 2014 में बनाई गई थी। हैरत की बात है कि नियमों की अनदेखी करने पर निर्माण के दो साल बाद ही इस इमारत को गिराने का नोटिस दे दिया गया था, इसके बावजूद इसका व्यावसायिक इस्तेमाल होता रहा। अब जब आग की घटना में पंद्रह लोगों की जान चली गई, तब जाकर स्थानीय प्रशासन हरकत में आया।
सरकार ने इस घटना की जांच के लिए विशेष दल गठित किया और कानपुर में ऐसे ही 22 और कोचिंग संस्थान सील कर दिए गए। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि नियमों की अनदेखी और अवैध तरीके से निर्माण कितने बड़े पैमाने पर हो रहा है। अलीगंज के मामले में भवन मालिक को गिरफ्तार कर लिया गया है और लापरवाही बरतने के आरोप में चार विभागीय अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है। कुल मिलाकर सोलह कर्मियों पर कार्रवाई की गई है। पीड़ित परिवारों को पांच-पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता की घोषणा की गई।
मगर सवाल है कि बार-बार होने वाली इस तरह की घटनाओं के बाद कार्रवाई क्या सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटने जैसी नहीं है? ऐसी क्या वजह है कि अवैध तरीके से भवन निर्माण और नियमों की अनदेखी करने वालों को शुरू में नहीं रोका जा सकता? ऐसे लोगों के भीतर कानून का खौफ क्यों नहीं है और क्यों उन्हें ऐसा लगता है कि वे जो कर रहे हैं, उसे कोई नहीं देख रहा?
सवाल है कि देश में ‘यह सब चलता है’ की मनोवृत्ति कब खत्म होगी? नौकरशाही को जब सुविधा केंद्रों में बदला जाता है, तो वे असुविधा केंद्र कैसे बन जाते हैं? जो जनप्रतिनिधि चुनाव के दौरान भ्रष्टाचार को कतई बर्दाश्त नहीं करने की बात करते हैं, जब कभी उनकी तिजोरियों को खंगाला जाता है, तो बेहिसाब संपत्ति का पता चलता है। इससे साफ है कि व्यवस्था में भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे तक फैला हुआ है, जिसकी आग में आम आदमी झुलस रहा है।
अगर प्रशासनिक ढांचा ईमानदार हो और कानून तोड़ने वालों को तुरंत दंडित किया जाए, तो कई समस्याएं शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएंगी। मगर ऐसा केवल चुनावी घोषणाओं में ही होता है और उसके बाद दिल्ली के राजेंद्र नगर, मालवीय नगर तथा उत्तर प्रदेश के अलीगंज अग्निकांड जैसी घटनाओं का सिलसिला जारी रहता है।
आखिर सरकार और समाज कब जागेंगे कि नियम-कानूनों का उल्लंघन करके हथेलियों पर धन-दौलत की फसल उगाने वालों पर शिकंजा कसा जाए और आम लोगों को भी सम्मान से जीने और अपने सपने पूरे करने का अवसर मिल सके। यह याद रखना चाहिए कि जब तक प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापक सुधार नहीं होगा, तब तक भ्रष्टाचार और कानून का उल्लंघन कर आमजन की जान को जोखिम में डालने का कुत्सित प्रयास भी अनवरत जारी रहेगा।
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दिल्ली के एक होटल में आग लगने के कारण 21 लोगों की जान जाने के बाद दिल्ली सरकार अब अवैध निर्माणों के खिलाफ सख्त लहजा अपनाने के मूड में है। दिल्ली सरकार में मंत्री आशीष सूद ने कहा कि केंद्रशासित प्रदेश में अब अवैध निर्माण के मामलों में शामिल अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी, इसके लिए जिलाधिकारियों की शक्तियां बढ़ाई जाएंगी। दिल्ली सरकार के गृह मंत्री आशीष सूद ने कहा कि दिल्ली सरकार अवैध निर्माण के मामलों को लेकर सख्त हो गई है, ऐसे निर्माणों में मिलीभगत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इसके लिए रेखा गुप्ता सरकार जिलाधिकारियों की शक्तियां बढ़ाएगी।-Suresh Seth



















