गुवाहाटी : 34 साल की उम्र। शादीशुदा। दिल्ली में एक सफल डॉक्टर। स्थिरता, सम्मान और एक सेटल्ड जिंदगी। डॉ. द्वीपानिता कलिता के पास वह सब कुछ था जिसकी समाज उस उम्र की महिला से उम्मीद करता है। लेकिन उन्होंने यह सब छोड़ दिया ताकि वह कुछ ऐसा कर सकें जिसे ज्यादातर लोग 30 के दशक में किसी व्यक्ति के लिए नामुमकिन समझते थे। उन्होंने उम्र, जेंडर और शादी से जुड़ी हर पारंपरिक सोच को चुनौती दी। आज, मेजर कलिता सिर्फ कोई आम यूनिफॉर्म नहीं पहनतीं, वह ‘मरून बेरेट’ पहनती हैं। एक ऐसा खास निशान जो भारत के बेहतरीन पैराट्रूपर्स को दूसरों से अलग पहचान देता है।
असम की पहली महिला पैराट्रूपर, मेजर कलिता, एक नेशनल आइकॉन बन गई हैं और ‘फेमिना’ मैगज़ीन के कवर पर भी नजर आ चुकी हैं। 34 साल की उम्र में, जब समाज उनसे घर बसाने की उम्मीद कर रहा था, तो उन्होंने हजारों फीट की ऊंचाई से हवाई जहाज से छलांग लगाकर उन्हें गलत साबित कर दिया। उन्होंने यह भी दिखाया कि महिलाएं किसी भी उम्र में क्या कुछ हासिल कर सकती हैं।
डॉक्टर से योद्धा तक का सफर
असम के सोनितपुर जिले के छोटे से शहर ढेकियाजुली की रहने वाली मेजर कलिता अपने इलाके की पहली लड़की थीं जिन्होंने विदेश में पढ़ाई की। उन्होंने फ़िलीपींस से MBBS किया और 2015 में AIIMS में अपनी इंटर्नशिप पूरी करने के बाद दिल्ली के कई अस्पतालों में काम किया, जिसमें इमरजेंसी और ऑब्सटेट्रिक्स (प्रसूति) विभाग भी शामिल थे। उनके पास सब कुछ था, अच्छा करियर, पक्की कमाई और सम्मान। लेकिन एक चीज की कमी थी: ऑलिव ग्रीन यूनिफॉर्म।
2019 में, उन्होंने आर्मी मेडिकल कॉर्प्स के ऑफिसर डॉ. चरंग मेट से शादी की। 2020 में, उन्होंने 100 से ज्यादा उम्मीदवारों के साथ मुकाबला किया और कैप्टन (मेडिकल ऑफ़िसर) के तौर पर चुनी गईं। 30s में एक शादीशुदा महिला का सेना में शामिल होना? ज्यादातर लोगों का कहना था कि यह नामुमकिन है। लेकिन उन्होंने इसे कर दिखाया।
2025 में बनी मेजर
2023 में, मेजर कलिता ने आगरा में आर्मी सेंटर पर मुश्किल एयरबोर्न ट्रेनिंग पूरी की और पैराट्रूपर बैज हासिल किया। ऐसा करने वाली वह असम की पहली महिला बनीं। जनवरी 2025 में उन्हें मेजर के पद पर प्रमोट किया गया। आज, वह खास पैराशूट मेडिकल रेजिमेंट में सेवा दे रही हैं, जहां वह हवाई जहाज से कूदती हैं और लड़ाई वाले इलाकों में मेडिकल सुविधाएं देती हैं। ऐसी जिंदगी जो ज्यादातर लोग सिर्फ फिल्मों में देखते हैं? वह असल में ऐसी ही जिंदगी जीती हैं।
दिग्गजों के नक्शेकदम पर
वह पहली नहीं हैं। लेकिन वह एक परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। लेफ्टिनेंट कर्नल जोस्युला फरीदा रेहाना 1966 में भारत की पहली महिला पैराट्रूपर बनीं। उनका आवेदन दो बार इसलिए खारिज कर दिया गया क्योंकि वह एक महिला थीं। उन्होंने हार नहीं मानी और अपने करियर में 1,000 बार छलांग लगाई। कैप्टन रुचि शर्मा 1996 में पहली ऑपरेशनल महिला पैराट्रूपर बनीं। उन्होंने कहा कि मैंने हमेशा असाधारण पुरुषों के इस ग्रुप में शामिल होने का सपना देखा था। और उन्होंने ऐसा कर दिखाया।
मेजर कलिता कहती हैं कि आप यहां किसी सांचे में ढलने के लिए नहीं, बल्कि उससे बाहर निकलने के लिए हैं। असम के स्वास्थ्य मंत्री अशोक सिंघल ने ट्वीट किया कि फेमिना इंडिया के कवर पर ढेकियाजुली की बेटी और असम की पहली महिला पैराट्रूपर, मेजर द्विपनिता कलिता को देखकर बहुत गर्व हो रहा है। असम के एक छोटे से शहर से लेकर भारत के लिए हवाई जहाज से छलांग लगाने तक, मेजर कलिता ने एक बात साबित कर दी: उम्र सिर्फ़ एक नंबर है। तीस की उम्र जिंदगी का अंत नहीं है। यह बस एक नई शुरुआत हो सकती है। ूी45बस आपको छलांग लगाने की हिम्मत चाहिए।



















