राष्ट्रपति टं्रप बयान देते हैं और देशों की अर्थव्यवस्थाएं हिचकोले खाने लगती हैं। बाजार धड़ाम से गिरते हैं। तेल, गैस, उर्वरक और अन्य सामान की किल्लत बढऩे लगती है, लिहाजा संकट भी व्यापक और विकराल होने लगते हैं। मंदी और महंगाई भी बढऩे लगती है। अब राष्ट्रपति टं्रप ने ईरान के अलग-अलग ठिकानों और परमाणु केंद्रों पर लगातार 21 दिन तक हमलों की योजना का ऐलान किया है। फिलहाल औसतन 4 घंटे हररोज हमले किए जा रहे हैं। ईरान ने भी नई मिसाइल से खाड़ी देशों के अमरीकी ठिकानों पर विनाशक हमले जारी रखे हैं। अमरीका के वायु बेस, नौसेना बेड़े, रडार सिस्टम, मिसाइल-ड्रोन ठिकानों पर हमले कर ईरान ने साफ कर दिया है कि वह युद्ध के मोर्चे पर अभी तैनात है और लड़ रहा है। बहरहाल इन हमलों का पहला असर यह है कि कच्चे तेल के दाम 86 डॉलर प्रति बैरल तक उछल गए हैं। ये दाम 71 डॉलर तक लुढक़ आए थे, जब समझौते के सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए गए थे। एकबारगी लगा था कि युद्ध का अंत निकट है, लेकिन यह पहले की तरह ही विनाशक और वीभत्स हो रहा है। अब तेल-बाजार में जो शिपमेंट (लदान) बुक की जा रही है, वह 86-87 डॉलर के हिसाब से की जा रही है। बीते 15 दिनों में ही भारत के खजाने पर करीब 2 लाख करोड़ रुपए का बोझ बढ़ चुका है, क्योंकि आयात-बिल बढ़ा है। भारत को कच्चा तेल 105 डॉलर प्रति बैरल पर खरीदना पड़ रहा है। इसमें युद्ध-बीमा, परिवहन की बढ़ी दरें और ईरान का टोल-टैक्स आदि भी शामिल हैं। यदि लाल सागर की ओर हूती लड़ाकों ने ‘बाब-अल-मंदेब’ मार्ग को बंद कर दिया, तो 12 फीसदी वैश्विक आपूर्ति और प्रभावित होगी, नतीजतन तेल की कीमतें 200 डॉलर तक उछल सकती हैं, ऐसा विशेषज्ञों का दावा है। दरअसल अर्थशास्त्रियों के विश्लेषण हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था आयात-केंद्रित हो चुकी है। घरेलू उत्पादन से बेहतर आयात लगता है और वह अभी तक आसान भी रहा है। आयात न केवल घरेलू बाजार, एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) पर, बल्कि निर्यात पर भी हावी हो चुका है। भारत का आयात 16 फीसदी बढ़ चुका है। अनुमान है कि आयात 17-18 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है, जो बीते साल में 11 लाख करोड़ रुपए रहा है। भारत खाड़ी देशों को 19 लाख करोड़ रुपए से अधिक का निर्यात करता रहा है, लेकिन ईरान युद्ध और खाड़ी देशों तक आपूर्ति के व्यवधान और जोखिमों के कारण निर्यात काफी प्रभावित हो रहा है। इन परिस्थितियों में भारत का व्यापार-घाटा बढ़ रहा है। यदि कच्चा तेल 10 फीसदी भी महंगा होता है, तो चालू खाता घाटा देश के जीडीपी का 0.4 फीसदी बढ़ जाता है। सीईआईसी के मुताबिक, भारत में जहां मैन्युफैक्चरिंग की स्थिति पूर्ववत है, वहीं निर्माण-कार्यों और सेवा क्षेत्र के व्यापार और परिवहन में भारी गिरावट दर्ज की गई है। गांव के गरीबों, किसानों को शहर के निर्माण-कार्यों में रोजगार मिलता रहा है, लेकिन गिरावट के बाद उन्हें गांव की ओर लौटना पड़ रहा है। सूखे से खेती पर भी असर पडऩा तय है, लिहाजा कई फसलें इस बार कम बोई गई हैं। इस तरह ग्रामीण अर्थव्यवस्था कई तरह कुचली जाएगी। महंगाई की जो दरें उच्चतम स्तर पर पाई गई हैं, उनमें गांव में महंगाई अपेक्षाकृत बढ़ी है। बहरहाल भारत में कच्चे तेल की आमद तो संतोषजनक है, क्योंकि रूस सप्लाई कर रहा था। भारत अमरीका, ऑस्टे्रलिया, अफ्रीका आदि देशों से तेल की ‘स्पॉट खरीददारी’ भी कर रहा है। संकट एलएनजी का है। करीब 60 फीसदी एलएनजी होर्मुज के रास्ते भारत तक आती थी, लेकिन बीते शनिवार, 11 जुलाई, के बाद एलएनजी की सप्लाई भारत में नहीं हुई है। हालांकि अमरीका, ऑस्टे्रलिया, नॉर्वे आदि देशों से एलपीजी (रसोई गैस) की आपूर्ति जारी है, लेकिन उसका आयात महंगा पड़ रहा है। गैस पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध भी नहीं है, नतीजतन एलपीजी का पहले जैसा संकट भी सामने आ सकता है। अभी भारत सरकार के बयान का इंतजार है कि कितने भंडारण शेष हैं, लेकिन एलपीजी का भंडारण तो अधिकतम पौने दो दिन तक ही किया जा सकता है। बहरहाल, अमरीका और ईरान के बीच यह लड़ाई जल्द खत्म होती, नहीं लगती है। दोनों ओर से हमले पर हमले हो रहे हैं। ईरान के साथ-साथ अमरीका का भी काफी नुकसान हो चुका है, लेकिन कोई भी पक्ष समझौते के लिए तैयार नहीं है। अमरीका बार-बार धमकी दे रहा है कि अगर ईरान ने जल्द समझौता नहीं किया, तो उसे तबाह कर दिया जाएगा। ऐसे में शांति की उम्मीद नहीं है।

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