ईरान युद्ध के छह माह के दौरान 10 लाख से अधिक भारतीयों को खाड़ी देशों से वापस घर आना पड़ा है। वे अचानक बेरोजगार हो गए हैं। खाड़ी देशों में काम करते हुए भारतीय करीब 51-54 अरब अमरीकी डॉलर अपने घरों को भेजते रहे हैं। यह औसत अब काफी कम हो सकता है। खाड़ी देशों में करीब 1 करोड़ भारतीय विभिन्न क्षेत्रों में, लंबे वक्त से, काम कर रहे हैं। अचानक थोपे गए युद्ध ने बहुत कुछ अस्थिर, अनिश्चित कर दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य लगभग बंद है और उस पर ईरान की आईआरजीसी का पूर्ण नियंत्रण है। राष्ट्रपति टं्रप सपने देखते रहते हैं, लिहाजा यह बयान भी अटपटा नहीं लगना चाहिए कि उन्होंने कहा है कि होर्मुज का नाम बदल कर ‘टं्रप स्टे्रट’ कर देना चाहिए। बहरहाल होर्मुज से कच्चे तेल की भारत को आपूर्ति नगण्य है। कतर, कुवैत, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात को भारत जो इंजीनियरिंग उत्पाद निर्यात करता था, वह लगभग ठप हो गया है। बासमती चावल, केला, नारियल और चाय पत्ती आदि का निर्यात भी 50 फीसदी तक गिर गया है। यह आर्थिक नुकसान, अंतत:, भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा। अब भारत एलपीजी और एलएनजी का, अमरीका से, सबसे बड़ा आयातक बन गया है। भारत ने कुल 11 लाख टन एलपीजी का आयात किया है, जिसमें अमरीका की हिस्सेदारी करीब 6 लाख टन है। अमरीका से ही एलएनजी का आयात भी 38 फीसदी से अधिक है। कभी कतर हमें 43-45 फीसदी एलएनजी की आपूर्ति करता था। अमरीकी गैस महंगी भी पड़ती है, लेकिन मजबूरी है कि इतने विशाल देश की खपत के लिए पर्याप्त गैस भी अनिवार्य है। अमरीकी पाबंदियों के बावजूद भारत ने जून-जुलाई में रूस से औसतन 26-28 लाख बैरल तेल रोजाना खरीदा है।
यह हिस्सेदारी 50-55 फीसदी है। तेल-गैस का कारोबार बढऩे और वेनेजुएला के तेल पर ‘अवैध’ कब्जा करने के बावजूद अमरीका पर कर्ज 40 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। यह चीन, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन और भारत की साझा, कुल अर्थव्यवस्थाओं से भी अधिक है। यह कर्ज प्रत्येक अमरीकी पर करीब 1,19,000 डॉलर का है और प्रत्येक घर पर करीब 3 लाख डॉलर का कर्ज है। राष्ट्रपति टं्रप इसे पिछले 35 साल का कर्ज मानते हैं और अपने कार्यकाल के दौरान कर्ज को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। बहरहाल युद्ध में संहारक प्रहार वाली, इंटरसेप्टर मिसाइलों-पैट्रियट और थाड-की कमी 50-65 फीसदी है। उत्पादन के पुराने स्तर तक लौटने में सालों लगेंगे, लेकिन फिर भी राष्ट्रपति टं्रप ईरान युद्ध को लंबा खींचना चाहते हैं। या यूं कहें कि वह ऐसे ‘चक्रव्यूह’ में फंस गए हैं कि युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता ही नहीं दिख रहा। अब राष्ट्रपति टं्रप और इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ईरान में तख्तापलट की साजिशों में जुटे हैं। किसका तख्तापलट…चुनी हुई सरकार का अथवा खामेनेई और आईआरजीसी के नेतृत्व का…! नेतन्याहू ने टं्रप को आश्वस्त किया है कि उन्होंने पूरे तंत्र को निर्देश दे दिए हैं कि ईरान में तख्तापलट करना है। दोनों नेताओं के सामने यह मकसद तब भी था, जब 28 फरवरी को उन्होंने ईरान पर हवाई हमलों की बौछार कर दी थी। वे ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई और उनके 45-48 सिपहसालारों, कमांडरों की हत्याएं ही कर पाए। अलबत्ता ईरान में हुकूमत यथावत है और आज मुज्तबा खामेनेई ईरान के सुप्रीम लीडर हैं। राष्ट्रपति टं्रप एक तरफ ईरानी अवाम को ‘विद्रोह’ के लिए भडक़ा रहे हैं, उन्हें हथियार मुहैया कराने का लालच भी दे रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ सिरिक क्षेत्र में एक शादी समारोह के घर पर हमला कर और उस दिन कुल 20 हत्याएं करा ‘शैतानियत’ पर उतारू लग रहे हैं। यह विशेषण ईरानी संसद के स्पीकर कालीबाफ ने इस्तेमाल किया है।
अमरीकी सेना ने एक ही दिन में ईरान के करीब 100 ठिकानों पर हमले किए हैं। हमलों की धमकियां अब भी जारी हैं। ईरान भी पलटवार कर अमरीकी ठिकानों की तबाही कर रहा है। सवाल यह है कि आखिर टं्रप की मंशा क्या है? उन्होंने दुनिया की अर्थव्यवस्था हिला कर रख दी है। देशों के तेल के रिजर्व भंडार खत्म हो रहे हैं। जब देश फिर तेल के भंडार भरने की कवायद करेंगे और मांग बढ़ेगी, तब कच्चे तेल के दाम 150 डॉलर प्रति बैरल तक उछल सकते हैं। तब अमरीका भी क्या करेगा?



















