डॉ. स्वाति नायक
जलवायु से जुड़ी चुनौतियों और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान अक्सर वैश्विक खाद्य अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं, जिससे ब्रिक्स समूह को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। खाद्य भंडारों, जिन्हें अक्सर आपातकालीन स्टॉक के रूप में देखा जाता है, को अब पोषण सुदृढ़ता, स्थिरता और तेज़ी से बदलती बाजार और सामाजिक प्रणालियों के हिसाब से नए सिरे से व्यवस्थित करने की ज़रूरत है।
हालांकि वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए रणनीतिक भंडार बनाए रखना महत्वपूर्ण है, लेकिन अभी सवाल यह है कि जलवायु और व्यापार की अनिश्चितताओं के साथ-साथ भूख और कुपोषण की लगातार मौजूद समस्याओं के जवाब में किस तरह के भंडार निर्मित किये जाने चाहिए। विश्व बैंक–एफएओ–डब्ल्यूएफपी रिपोर्ट (2025) – खाद्य सुरक्षा बढ़ाने के लिए रणनीतिक अनाज भंडार को मजबूत करना – में बताया गया है कि 2024 में 74 देशों में 343 मिलियन लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे थे। यह संख्या कोविड-19 महामारी से पहले के सालों में खाद्य असुरक्षा का सामना करने वाले लोगों की संख्या से लगभग दोगुनी है। बहु-स्तरीय आर्थिक उथल-पुथल से व्यापार में व्यवधान हुए हैं और भूख में वृद्धि हुई है, इन सभी ने खाद्य सुरक्षा के लिए नए चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
2026 में हालात और भी खराब हो गए। विश्व बैंक के अनुसार, पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए तेल और उर्वरक का परिवहन प्रभावित हुआ है, जो वैश्विक कृषि-खाद्य मूल्य श्रृंखलाओं की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। फरवरी से मार्च 2026 के बीच उर्वरकों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई, जिसमें यूरिया की कीमत एक ही महीने में लगभग 46 प्रतिशत बढ़ गई। विश्व खाद्य कार्यक्रम के पूर्वानुमानों के अनुसार, लगातार व्यवधान के कारण 45 मिलियन तक लोग भुखमरी की स्थिति में पहुंच सकते हैं।
यह ब्रिक्स देशों के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि इनमें से अधिकांश देश प्रमुख कृषि उत्पादक/आयातक और उर्वरक के उपभोक्ता दोनों हैं।
हालाँकि, खाद्य भंडारों के बारे में पारंपरिक सोच अब पुरानी पड़ती जा रही है। पारंपरिक रूप से, खाद्य भंडार बनाने का उद्देश्य मुख्य रूप से कीमतों को स्थिर रखना या अस्थायी कमी से निपटना था। दूसरी ओर, आधुनिक समस्या अधिक जटिल है और इसके लिए ऐसे उपायों की जरूरत है जो न सिर्फ पर्याप्त कैलोरी की गारंटी दें, बल्कि खाद्य के पोषण संतुलित होने, किफायती होने और व्यवधानों के बीच लगातार उपलब्ध होने की भी गारंटी दें। यूरोपीय आयोग की संश्लेषण रिपोर्ट – ‘विकासशील देशों में खाद्य और पोषण सुरक्षा बढ़ाने के लिए खाद्य भंडार का उपयोग’ – के अनुसार, खाद्य और पोषण सुरक्षा; अनाज की भौतिक उपलब्धता से कहीं अधिक है।
ब्रिक्स देशों के संदर्भ में यह परिवर्तन और भी महत्वपूर्ण बन गया है, जहाँ भरपूर खाद्य संसाधन होने के बावजूद भी खाद्य संकट बरकरार है। उदाहरण के तौर पर, भारत ने 2024 से 2025 की अवधि में रिकॉर्ड 353.96 मिलियन टन अनाज का उत्पादन किया है, साथ ही दुनिया के सबसे बड़े खाद्य नेटवर्क में से एक को बनाए रखा है। भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय द्वारा ‘फसल से घर तक: अनाज भंडारण के लिए सुदृढ़ अवसंरचना का निर्माण’ विषय पर 2025 में जारी एक पृष्ठभूमि विज्ञप्ति में इस तथ्य का उल्लेख किया गया था।
भारत में उभरती हुई भंडार प्रणालियाँ यह दिखाती हैं कि भंडार केवल जमा किए गए अनाज से कहीं ज़्यादा सक्रिय पोषण प्रबंधन की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। वैज्ञानिक भंडारण, डिजिटलीकरण, विकेंद्रीकरण और सार्वजनिक वितरण प्रणाली से जुड़ाव की प्रक्रिया प्रमुख अनाज – चावल और गेहूं – के साथ-साथ दालों, मोटे अनाजों और पोषण वर्धित खाद्य पदार्थों की जैविक पोषण वर्धित किस्मों को शामिल करके भंडार में विविधता लाने का मौका देती है। यह और भी जरूरी हो जाता है, क्योंकि भारत दुनिया के पोषण परिदृश्य में फसल विविधीकरण को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहा है।
इसी तरह, चीन भी अपने भंडारों को लेकर अपनी रणनीति को फिर से व्यवस्थित करने की कोशिश कर रहा है, एक ऐसे दृष्टिकोण के तहत, जो उसके खाद्य प्रणाली में सुदृढ़ता को ध्यान में रखता है। चावल, गेहूँ और मक्का का भारी स्टॉक जमा करने के साथ-साथ, बीजिंग अब स्मार्ट भंडारण, एआई-समर्थित खाद्य निगरानी, कोल्ड चेन लॉजिस्टिक्स और देसी बीजों पर ज़्यादा ध्यान दे रहा है। अब खाद्य आपूर्ति श्रृंखला में पोषण के माध्यम से सुरक्षा सुनिश्चित करने पर अधिक ध्यान है, ताकि फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम किया जा सके और विविध आहार प्राप्त किए जा सकें।
रूस ने जो रास्ता अपनाया है, वह भंडार नीति के एक और पहलू का उदाहरण पेश करती है। यह भू-राजनीतिक सुदृढ़ता है। रूस ने खाद्य सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच स्पष्ट संबंध बनाए हैं, अपने भंडार बढ़ाए हैं, कृषि क्षेत्र के लिए घरेलू उत्पादन पर ध्यान दिया है तथा पश्चिम एशिया और अफ्रीका में अनाज निर्यात और उर्वरकों का भू-राजनीतिक उपकरण के रूप में उपयोग किया है। एक ऐसी दुनिया में जहाँ प्रतिबंध, अलग-अलग व्यापारिक संबंध और निर्यात नियंत्रण आम होते जा रहे हैं, यह एक महत्वपूर्ण बात है।
एक और उदाहरण मौजूद है जो अपने आप में बहुत अहम है – दक्षिण अफ्रीका। संपूर्ण खाद्य उपलब्धता पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय, दक्षिण अफ्रीका की समस्याओं को अनाज की किफायती कीमत और पोषण तक पहुँच की कमी के रूप में देखा जा सकता है। इस मामले में, सरकार का ध्यान पोषण-संवेदनशील सामाजिक सुरक्षा, स्कूलों में खाना खिलाने की योजनाओं, सरकारी खरीद और सामुदायिक खाद्य प्रणालियों मौसम के असर से सुरक्षित बनाने पर जाता है। ऐसी स्थिति में, भंडार अधिकतर व्यापक अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने के साधन के बजाय पोषण कार्यक्रमों को लागू करने का एक उपकरण बन जाते हैं।
इसके अलावा, विश्व बैंक–एफएओ–डब्ल्यूएफपी रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि रणनीतिक भंडार तब सबसे प्रभावी होते हैं, जब वे “छोटे, सरल और स्मार्ट” होते हैं और बाज़ार प्रबंधन के बजाय अधिकतर आपातकालीन प्रतिक्रिया पर केंद्रित होते हैं। इसी तरह, यूरोपीय आयोग की रिपोर्ट बताती है कि भंडार का स्तर तो मायने रखता ही है, लेकिन असल में शासन ही यह तय करती है कि भंडार खाद्य सुरक्षा नीति के लक्ष्यों में मदद करेंगे या उन्हें नुकसान पहुँचाएँगे।
यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका प्रभाव ‘ब्रिक्स देश अपनी खाद्य सुरक्षा स्थिति में सुधार करने के लिए कैसे सहयोग कर सकते हैं’ पर पड़ता है। कई देशों के साझा भंडार निर्मित करने के बजाय, जिन्हें बनाना राजनीतिक रूप से मुश्किल और लॉजिस्टिक्स के लिहाज़ से असंभव है, ब्रिक्स के लिए एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय तालमेल प्रणाली का निर्माण बेहतर हो सकता है, जो डेटा आदान-प्रदान, समन्वित इलेक्ट्रॉनिक निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, सरकारी खरीद मानक नियम और भंडारण अवसंरचना को बेहतर बनाने पर केंद्रित हो।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि भंडार के भविष्य को पोषण संबंधी विविधता से जोड़ा जाना चाहिए। मुख्य रूप से चावल और गेहूं पर आधारित भंडार छिपी हुई भूख और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के बढ़ते ख़तरे का सामना नहीं कर पाएँगे। स्वस्थ/पोषक तत्वों से भरपूर चावल और गेहूं, जैसे जैविक पोषण वर्धित चावल/गेहूं, दालें, मोटे अनाज और पोषण वर्धित अनाज जैसी चीज़ों का एक विविध मिश्रण सुनिश्चित करने की ज़रूरत है। इससे ब्रिक्स देशों के लिए अपने खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों को सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों से जोड़ना संभव होगा।
भंडारों की योजना बनाते समय जलवायु के हिसाब से सुदृढ़ता सुनिश्चित करना भी ज़रूरी है। बाढ़, सूखा, चक्रवात और लू जैसी घटनाओं के बार-बार होने के कारण, यह सुनिश्चित करना ज़रूरी हो गया है कि इन आपदाओं का असर उत्पादन और भंडारण, दोनों प्रक्रियाओं पर एक साथ न पड़े। इस संदर्भ में, आधुनिक भंडारों के लिए सिर्फ पारंपरिक भंडारों में निवेश करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि कोल्ड चेन, अलग-अलग जगहों पर बनी भंडारण सुविधाओं, आई-ओ-टी सक्षम निगरानी प्रणालियों और नमी नियंत्रण प्रणालियों में भी निवेश करना जरूरी हो गया है।
दुनिया की खाद्य भंडारण नीति को बदलने में मदद करने के लिए ब्रिक्स देश सबसे अच्छी स्थिति में हैं। सामूहिक रूप से, वे दुनिया के अनाज उत्पादन, उर्वरक उपयोग, कृषि व्यापार और जोखिम में रहने वाले समुदायों के मामले में में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। सही योजना के साथ, उनकी भंडारण सुविधाओं को केवल आपातकालीन व्यवस्था के स्थान पर सुरक्षित पोषण, मौसम में बदलाव का सामना करने और भू-राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने वाली प्रणाली में बदला जा सकता है।
भविष्य के खाद्य भंडार की सफलता केवल उनके भंडारण सुविधा में रखे अनाज की मात्रा पर निर्भर नहीं करेगी। इसके बजाय, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वे संकट के समय समाज को स्थिर रखने में कितनी मदद कर सकते हैं, गरीब लोगों के लिए अच्छे पोषण के परिणाम कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं, क्षेत्रीय खाद्य उत्पादन प्रणाली को कैसे मजबूत कर सकते हैं और कमजोर वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता को किस प्रकार कम कर सकते हैं। इसलिए, ब्रिक्स देशों के लिए खाद्य भंडार का सवाल यह नहीं होना चाहिए कि अधिक भोजन कैसे पैदा करें, बल्कि यह होना चाहिए कि स्मार्ट, पोषण-केंद्रित भंडार कैसे बनाए जाएं।
(लेखिका सीड सिस्टम्स और प्रोडक्ट मैनेजमेंट की दक्षिण एशिया प्रमुख तथा इंडिया कंट्री मैनेजर (अंतरिम) हैं नॉर्मन बॉरलॉग फील्ड पुरस्कार विजेता (विश्व खाद्य पुरस्कार) 2023, अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान।)



















