Atrial Fibrillation Symptoms And Causes: दिल की धड़कन अचानक तेज होना, सीने में फड़फड़ाहट महसूस होना या बिना किसी खास वजह के सांस फूलना अक्सर लोग सामान्य परेशानी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. हालांकि बार-बार ऐसा होना दिल से जुड़ी एक समस्या एट्रियल फिब्रिलेशन का संकेत हो सकता है. यह दुनिया में दिल की धड़कन की लय से जुड़ी सबसे आम समस्याओं में से एक है. चिंता की बात यह है कि कई लोगों में इसके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते और बीमारी का पता गंभीर समस्या होने के बाद चलता है.
ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी के अनुमानों के मुताबिक, भारत में करीब 80 लाख लोग एट्रियल फिब्रिलेशन के साथ रह रहे हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि बढ़ती उम्र के साथ मोटापा, डायबिटीज और अनियंत्रित हाई ब्लड प्रेशर का बढ़ता बोझ भी इसके मामलों में बढ़ोतरी की वजह बन रहा है. ड्यूक यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ. क्रिस्टोफर ग्रेंजर ने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया कि एट्रियल फिब्रिलेशन उस समय होता है, जब दिल के ऊपरी चैंबर यानी एट्रिया में असामान्य इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी होने लगती है. इसके कारण दिल सामान्य और व्यवस्थित तरीके से धड़कने के बजाय अनियमित रूप से धड़कने लगता है.
एट्रियल फिब्रिलेशन के क्या हैं लक्षण?
एट्रियल फिब्रिलेशन की पहचान हर व्यक्ति में आसान नहीं होती. कुछ लोगों में इसके लक्षण साफ दिखाई देते हैं, जबकि कई लोगों में यह बिना किसी स्पष्ट लक्षण के हो सकता है. इसे साइलेंट एट्रियल फिब्रिलेशन कहा जाता है. ऐसे मामलों में गंभीर समस्या होने तक बीमारी का पता नहीं चल पाता. दिल की धड़कन बहुत तेज होना या धड़कन महसूस होना, सांस फूलना, ज्यादा थकान महसूस होना, एक्सरसाइज करने की क्षमता कम होना और पल्स का अनियमित होना इसके सामान्य लक्षणों में शामिल हैं.
डॉ. ग्रेंजर के मुताबिक, लगातार होने वाली दिल की धड़कन या आराम करते समय अचानक हार्ट रेट बढ़ने को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अनियमित हार्ट रिदम का पता लगाने वाली स्मार्टवॉच भी कुछ लोगों में इस समस्या की पहचान में मदद कर सकती हैं. हालांकि इसके बाद आगे की जांच के लिए ईसीजी की जरूरत पड़ सकती है.
क्यों खतरनाक है एट्रियल फिब्रिलेशन?
एट्रियल फिब्रिलेशन से जुड़ा सबसे बड़ा खतरा स्ट्रोक है. जब दिल के ऊपरी चैंबर सामान्य तरीके से सिकुड़ नहीं पाते तो दिल के अंदर खून जमा हो सकता है. इससे खून का थक्का बनने का खतरा बढ़ जाता है. अगर यह थक्का दिल से निकलकर दिमाग तक पहुंच जाए तो वहां खून का प्रवाह रोक सकता है और इस्केमिक स्ट्रोक का कारण बन सकता है. डॉ. ग्रेंजर के मुताबिक, एट्रियल फिब्रिलेशन स्ट्रोक के खतरे को करीब पांच गुना तक बढ़ा देता है. हर पांच में से एक स्ट्रोक इस समस्या से जुड़ा होता है. एट्रियल फिब्रिलेशन से जुड़े स्ट्रोक अक्सर ज्यादा गंभीर होते हैं और मरीज में स्थायी विकलांगता का खतरा भी अधिक हो सकता है.
यह समस्या केवल स्ट्रोक तक सीमित नहीं है. एट्रियल फिब्रिलेशन दिल की पंपिंग क्षमता को प्रभावित कर हार्ट फेलियर में भी योगदान दे सकता है. इससे फेफड़ों में तरल पदार्थ जमा होने और सांस फूलने जैसी परेशानियां बढ़ सकती हैं.
इलाज से 70 फीसदी तक स्ट्रोक रोकना संभव
एट्रियल फिब्रिलेशन से जुड़े स्ट्रोक को रोकने में समय पर एंटीकोएगुलेंट दवाओं का इस्तेमाल महत्वपूर्ण माना जाता है. इन्हें आमतौर पर ब्लड थिनर भी कहा जाता है. डॉ. ग्रेंजर के अनुसार, प्रभावी ब्लड थिनर का इस्तेमाल एट्रियल फिब्रिलेशन के कारण होने वाले करीब 70 फीसदी स्ट्रोक को रोक सकता है. इसके इलाज में दिल की धड़कन की गति या उसकी लय को नियंत्रित करने वाली दवाएं भी दी जा सकती हैं. कुछ मरीजों में कैथेटर एब्लेशन की जरूरत पड़ सकती है. यह एक मिनिमली इनवेसिव प्रक्रिया है, जिसमें असामान्य इलेक्ट्रिकल सिग्नल को रोककर दिल की सामान्य लय बहाल करने की कोशिश की जाती है.
क्या एट्रियल फिब्रिलेशन से बचाव संभव है?
उम्र और जेनेटिक्स जैसे कुछ जोखिम कारकों को बदला नहीं जा सकता, लेकिन लाइफस्टाइल से जुड़े कई कारणों को नियंत्रित करके इसके खतरे को कम या बीमारी को देर से होने में मदद मिल सकती है. डॉ. ग्रेंजर ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखने, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल को मैनेज करने, स्वस्थ वजन बनाए रखने और नियमित एक्सरसाइज करने की सलाह देते हैं. इसके अलावा धूम्रपान से बचना, शराब का सेवन सीमित करना और पर्याप्त नींद लेना भी जरूरी है. स्लीप एपनिया की आशंका होने पर इसकी जांच कराने की सलाह दी जाती है. उन्होंने यह भी बताया कि सीमित मात्रा में चाय या कॉफी पीने से एट्रियल फिब्रिलेशन का खतरा बढ़ता हुआ नहीं दिखाई देता. कुछ अध्ययनों में इसका संबंध कम जोखिम से भी देखा गया है.



















