मिर्गी के मरीजों के लिए नई स्टडी उम्मीद जगाने वाली है. AIIMS नई दिल्ली और जीबी पंत इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने पाया है कि मुंह में घुलने वाली क्लोबाजाम (Clobazam) लंबे समय तक चलने वाले मिर्गी के दौरे को रोकने में नाक से दी जाने वाली मिडाजोलम (Midazolam) जितनी असरदार हो सकती है.

स्टडी में दोनों दवाओं ने लंबे focal seizures को करीब एक मिनट में रोकने में असर दिखाया. शोधकर्ताओं ने इसके लिए मरीजों के दौरे के लक्षणों के साथ EEG में दिमाग की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी को भी देखा.

क्यों जरूरी है यह रिसर्च?

मिर्गी का दौरा अक्सर कुछ समय बाद अपने आप रुक सकता है, लेकिन अगर दौरा लगातार जारी रहे और लंबा हो जाए तो स्थिति गंभीर हो सकती है. ऐसे मामलों में डॉक्टर रेस्क्यू मेडिसिन का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस रिसर्च में दो मिनट से ज्यादा चलने वाले focal seizures पर ध्यान दिया गया. रिसर्चर्स का मकसद यह पता लगाना था कि ऐसे लंबे दौरे को रोकने में मुंह में घुलने वाली क्लोबाजाम और नाक से दी जाने वाली मिडाजोलम में कितना अंतर है.

95 मरीजों पर हुई स्टडी

यह रिसर्च AIIMS दिल्ली की Epilepsy Monitoring Unit में की गई. इसमें ऐसे मरीजों को शामिल किया गया, जिन्हें ड्रग रेसिस्टेंट मिर्गी थी. इस दौरान कुल 165 मरीजों की जांच की गई, जिनमें 95 मरीज स्टडी में शामिल किए गए.

दो समूह में बांटे गए मरीज

  • 47 मरीजों को नाक से मिडाजोलम दी गई.
  • 48 मरीजों को मुंह में घुलने वाली क्लोबाजाम दी गई.

स्टडी के दौरान कुल 570 दौरे रिकॉर्ड किए गए. इनमें 52 ऐसे दौरे थे, जो दो मिनट से ज्यादा चले और जिनमें रेस्क्यू मेडिसिन की जरूरत पड़ी.

करीब एक मिनट में रुका लंबा दौरा

स्टडी का सबसे अहम नतीजा यह रहा कि दोनों दवाओं ने लंबे focal seizures को करीब एक मिनट में रोकने में असर दिखाया. रिसर्चर्स ने सिर्फ मरीज के शरीर में दिखाई देने वाले दौरे के लक्षणों को ही नहीं देखा, बल्कि EEG के जरिए दिमाग की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी की भी निगरानी की. आसान भाषा में कहें तो इस स्टडी के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि मिडाजोलम या क्लोबाजाम में से कोई एक दवा दूसरी से स्पष्ट रूप से बेहतर है.

नाक में मिडाजोलम देने में क्या दिक्कत?

स्टडी में इस्तेमाल की गई मिडाजोलम नाक के जरिए दी गई. डॉ. मंजरी त्रिपाठी के मुताबिक, बच्चों में इसे कई पफ में देना पड़ सकता है, जबकि बड़ों में भी कई पफ की जरूरत पड़ती है. इस दौरान दवा के लीक होने की आशंका रहती है. उन्होंने बताया कि नाक से दी जाने वाली दवा हर जगह आसानी से उपलब्ध नहीं होती और इसकी कीमत भी एक चुनौती हो सकती है.

मुंह में घुलने वाली क्लोबाजाम अलग कैसे?

क्लोबाजाम के जिस फॉर्म को इस रिसर्च में देखा गया, उसे सामान्य गोली की तरह निगलने की जरूरत नहीं पड़ती. यह मुंह में घुल जाती है, जिससे ऐसे मरीजों में इसे देना आसान हो सकता है, जिन्हें दौरे के दौरान निगलने में परेशानी हो. डॉ. मंजरी त्रिपाठी के मुताबिक, अगर मरीज को दौरा आने से पहले चेतावनी के लक्षण महसूस हो जाएं तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार ऐसी रेस्क्यू दवा का इस्तेमाल दौरे को लंबा होने से रोकने के लिए किया जा सकता है. हालांकि, रेस्क्यू मेडिसिन का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह और निर्धारित डोज के अनुसार ही किया जाना चाहिए.

दोनों दवाएं असरदार, लेकिन किसे चुनें?

इस रिसर्च का संदेश यह नहीं है कि अब मिडाजोलम की जगह हर मरीज को क्लोबाजाम दी जाएगी. स्टडी में दोनों दवाओं की तुलना की गई और दोनों ने लंबे दौरे रोकने में समान प्रभाव दिखाया. रिसर्चर्स के मुताबिक, क्लोबाजाम को मिडाजोलम के एक संभावित विकल्प के तौर पर देखने की दिशा में यह अध्ययन महत्वपूर्ण है. खासकर ऐसे मामलों में जहां नाक से दी जाने वाली दवा उपलब्ध न हो या उसके इस्तेमाल में व्यावहारिक दिक्कत हो.

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