Fcra law india explained: विदेशी फंडिंग पर निगरानी के लिए होता है. सरकार ने मार्च में इसमें संशोधन को लेकर लोकसभा में प्रस्ताव पेश किया था. इसी संशोधन पर अमेरिका के सांसद ने ऐतराज जताया है. कानून को सबसे पहले 1976 में लागू किया गया था, समय समय पर इसमें संशोधन होते रहे हैं.
भारत ने फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट FCRA में संशोधन का प्रस्ताव लेकर आया तो सबसे पहले मिर्ची अमेरिका को लगी. डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सांसद राइली मूर बिफर गए हैं. उन्होंने भारत के साथ अमेरिका के साथ संबंध खराब होने की चेतावनी दी है. भारत सरकार के प्रस्तावित संशोधन को मूर ने ईसाई समुदाय पर हमला बताया है.
यह एक्ट विदेशी फंडिंग पर निगरानी के लिए होता है. सरकार ने मार्च में इसमें संशोधन को लेकर लोकसभा में प्रस्ताव पेश किया था. 22 जून को इन्हें अधिसूचित कर दिया गया. इसका उद्देश्य विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता लाना और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना है. राइली मूर ने इसके विरोध में सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है कि अगर बिल पास हुआ तो भारत और अमेरिका के रिश्ते चिंताजनक स्थिति में पहुंच सकते हैं. ऐसे में सवाल ये है कि आखिर बिल में ऐसा क्या है जिससे अमेरिका को इतनी मिर्ची लग रही है.
क्या है FCRA ?
भारत में जब भी विदेशी फंडिंग, NGO, चर्च, धर्मांतरण या विदेशी प्रभाव पर चर्चा होती है तो सबसे पहले FCRA यानी फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट का नाम सुनाई देता है. हिंदी में इसे विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम कहते हैं. यह भारत सरकार का ऐसा कानून है, जो यह तय करता है कि भारत में कोई NGO, ट्रस्ट, सोसायटी, धार्मिक संस्था या व्यक्ति विदेश से पैसा, दान, उपहार या अन्य आर्थिक सहायता किस तरह प्राप्त कर सकता है और कैसे उसे प्रयोग कर सकता है. इसकी देखरेख गृह मंत्रालय करता है. यानी विदेश से आने वाली फंडिंग पर कोई रोक नहीं है, लेकिन सरकार ये सुनिश्चित करती है कि बाहर से आने वाले पैसे का उपयोग भारत की सुरक्षा या राष्ट्रीय हितों के खिलाफ न हो.
FCRA को पहली बार 1976 में लागू किया गया था. उस समय सरकार को आशंका थी कि विदेशी धन के जरिए भारत की राजनीति, चुनावी व्यवस्था और सामाजिक संस्थाओं को प्रभावित किया जा सकता है. 1984 में इसके नियम और कड़े हुए और रजिस्ट्रेशन अनिवार्य हुआ. 2010 में पुराने कानून को बदलकर नया FCRA कानून लाया गया. इसके बाद पारदर्शिता बढ़ाने को लेकर 2020 में कुछ बदलाव किए गए. अब एक बार फिर इस एक्ट में संशोधन प्रस्तावित है, जिस पर विवाद चल रहा है.
सरकार FCRA में क्या करना चाहती है संशोधन?
सरकार ने लोकसभा में जो FCRA अमेंडमेंट बिल पेश किया है, उसमें प्रस्ताव दिया गया है कि विदेश से चंदा या फंड लेने वाली इसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, या वो खुद पंजीकरण छोड़ देती है तो सरकार एक नामित प्राधिकरण बना सकेगी. यह प्राधिकरण उस संस्था को विदेश से मिले चंद्र और उससे बनाई गई संपत्तियों को मैनेज करेगा. प्रस्ताव में ये भी कहा गया है कि ऐसी संपत्तियों में यदि कोई धार्मिक स्थल है तो उसका स्वरूप भी हर हाल में बनाए रखा जाएगा. प्रस्तावित बिल में FCRA के उल्लंघन पर अधिकतम सजा 5 साल की जेल से घटाकर 1 साल करने का भी प्रावधान किया गया है.
एक्ट के तहत कौन नहीं ले सकता विदेशी फंड?
- चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार
- सांसद और विधायक
- राजनीतिक दल
- सरकारी कर्मचारी
- न्यायाधीश
- मीडिया संस्थान
- राजनीतिक प्रकृति के संगठन
2020 में क्या बड़े बदलाव हुए थे?
मोदी सरकार ने 2020 में FCRA को और सख्त किया था. इसमें पहला बदलाव था विदेशी चंदे को दूसरे NGO को ट्रांसफर करने पर रोक. प्रशासनिक खर्च की सीमा 50% से घटाकर 20% किया जाना. प्रमुख पदाधिकारियों के लिए आधार या पहचान संबंधी नियम और विदेशी फंड केवल निर्धारित SBI खाते के जरिए प्राप्त करने की व्यवस्था. सरकार का तर्क था कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और फंड के दुरुपयोग पर रोक लगेगी.
हालिया संशोधन के प्रस्ताव पर बवाल क्यों?
सबसे ज्यादा बवाल नामित प्राधिकरण को लेकर है, जिसमें FCRA लाइसेंस रद्द होने पर विदेशी फंड से बनी संपत्ति के रखरखाव की जिम्मेदारी प्राधिकरण के पास आ जाएगी. सरकार का कहना है कि इससे विदेशी धन से बनी संपत्तियां अनियंत्रित नहीं रहेंगी और उनका सही उपयोग सुनिश्चित होगा. वहीं आलोचकों का आरोप है कि इससे सरकार को NGOs और धार्मिक संस्थाओं पर अत्यधिक नियंत्रण का अधिकार मिल सकता है.
अमेरिका को क्यों लग रही मिर्ची?
अमेरिकन सांसद राइली मूर ने सोशल मीडिया पर पोस्ट शेयर की है, इसमें उन्होंने लिखा है कि- भारत में ईसाई समुदाय तब से रह रहा है, जब सेंट थॉमस द एपोस्टल यीशु मसीह के पुनरुत्थान के कुछ ही दशकों बाद मालाबार तट आए थे, लेकिन इस लंबे इतिहास के बावजूद भारत की संसद FCRA बिल के नियमों में ऐसे संशोधन करने पर विचार कर रही है, जिससे सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटीज का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की छूट मिल सके.
दरअसल अमेरिका की चिंता है कि इन बदलावों से धार्मिक संस्थाओं पर असर पड़ सकता है. विदेशी फंड पाने वाले मानवाधिकार समूहों की गतिविधियां सीमित हो सकती हैं और सरकार का ज्यादा हस्तक्षेप हो सकता है, जबकि भारत सरकार ऐसे किसी भी आरोप से इंकार करती है.



















