पंजाब के किसान आंदोलन को समझने के लिए 2021 और 2024 के दोनों चरणों को एक साथ देखना जरूरी है। जून 2020 में केंद्र सरकार द्वारा 3 कृषि कानूनों के पारित होने के बाद अगस्त में धरनों और सितम्बर में रेल रोको के आह्वान के साथ शुरू हुआ किसान आंदोलन नवम्बर 2020 में किसान संगठनों द्वारा ‘दिल्ली चलो’ कार्यक्रम के साथ आधिकारिक तौर पर शुरू हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य तीनों कृषि कानूनों को वापस करवाना था। वहीं 2024 में केंद्रीय मुद्दा सभी मुख्य फसलों के लिए देशभर में एम.एस.पी. की कानूनी गारंटी और कई अन्य मांगें बन गईं। यही अंतर आज के गतिरोध को समझने की कुंजी है।

2020 में केंद्र द्वारा 3 कृषि कानून लाए जाने के बाद पंजाब और हरियाणा से शुरू हुआ आंदोलन नवम्बर 2020 में दिल्ली की सीमाओं तक पहुंच गया। सिंघु, टिकरी और गाजीपुर समेत कई मोर्चों पर किसान लंबे समय तक डटे रहे। 2021 में केंद्र और किसान नेताओं के बीच कई दौर की बैठकें हुईं लेकिन कोई समझौता नहीं हुआ। 26 जनवरी, 2021 को लाल किले की घटना ने आंदोलन को बड़ा झटका दिया लेकिन किसान मोर्चा टूटा नहीं। आखिरकार 19 नवम्बर, 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये तीनों कानून वापस लेने की घोषणा की और 29 नवम्बर को संसद ने इन कृषि कानूनों को खत्म करने का कानून पारित कर दिया। यहां एक महत्वपूर्ण बात यह थी कि 2021 में किसान नेताओं की एकता और एक स्पष्ट मुख्य मांग, कृषि कानूनों की वापसी, थी, जिसने सरकार पर बड़ा दबाव बनाया। हालांकि कानून वापस होने के बाद एम.एस.पी. की कानूनी गारंटी सहित अन्य मांगें अधूरी रह गईं। अधूरी रह गई मांगों को मनवाने के लिए फरवरी 2024 में एस.के.एम. (गैर-राजनीतिक) से जुड़ी जत्थेबंदियों ने डल्लेवाल के नेतृत्व में फिर से ‘दिल्ली चलो’ का आह्वान किया। इस बार एम.एस.पी. को कानूनी हक बनाना. किसानों की कर्ज माफी, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें और अन्य कृषि मुद्दे केंद्र में आ गए।

हरियाणा सीमा पर किसानों को रोकने के लिए बैरिकेड्स, आंसू गैस और अन्य सुरक्षा इंतजाम किए गए। दिल्ली पहुंचने की बजाय मुख्य मोर्चे शंभू और खनौरी पर टिक गए। इस तरह ‘दिल्ली चलो’ मोर्चा धीरे-धीरे शंभू-खनौरी मोर्चे में तबदील हो गया। 26 नवम्बर, 2024 को जगजीत सिंह डल्लेवाल ने खनौरी में आमरण अनशन शुरू किया। इससे आंदोलन को नई ताकत मिली। केंद्र के साथ कई बैठकें हुईं लेकिन एम.एस.पी. की कानूनी गारंटी पर कोई अंतिम सहमति नहीं बनी, बल्कि किसान नेताओं ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप शुरू कर दिए। 2021 के आंदोलन की कामयाबी के बावजूद एक बड़ी कमजोरी किसान नेताओं के बीच आपसी फूट के रूप में सामने आ गई। 2021 के बाद किसान नेताओं का एक हिस्सा चुनावी राजनीति में आ गया और संयुक्त समाज मोर्चा बनाया गया। बलबीर सिंह राजेवाल इस प्रक्रिया का मुख्य चेहरा थे। दूसरी तरफ जगजीत सिंह डल्लेवाल थे, जो चुनाव लडऩे के खिलाफ थे, जिसके कारण पहले वाली किसान एकता को झटका लगा।

राजेवाल ने बार-बार यह सवाल उठाया कि किसान आंदोलन को एकजुट रणनीति और सांझा नेतृत्व की जरूरत है। दूसरी तरफ डल्लेवाल की ओर से भी अन्य किसान नेताओं की रणनीति और आंदोलन के प्रति भूमिका पर सवाल उठाए गए। इस तरह आज किसान आंदोलन की लड़ाई केवल केंद्र सरकार के साथ नहीं, बल्कि नेताओं के बीच रणनीति और भरोसे की लड़ाई भी बन गई है। सवाल उठ रहा है कि 5 साल के अंतराल के बाद भी केंद्र और किसानों के बीच पैदा हुआ गतिरोध क्यों नहीं टूट रहा? कारण यह है कि 2021 और 2024 की मांगों में बड़ा अंतर है। 2021 में केंद्र के पास 3 कानून वापस लेने का स्पष्ट रास्ता था। 2024-26 में एम.एस.पी. की कानूनी गारंटी का मसला कहीं अधिक जटिल है। इसका संबंध सरकारी खरीद, मंडियों, बाजार, वित्तीय बोझ और फसल चक्र से है।

इस मसले पर पंजाब सरकार की स्थिति दोहरी रही। एक तरफ सरकार किसानों के साथ हमदर्दी और केंद्र पर दबाव की बात करती रही, दूसरी ओर शंभू और खनौरी पर लंबे समय से बंद राष्ट्रीय राजमार्गों के कारण यातायात और कानून-व्यवस्था का सवाल भी खड़ा हुआ, जिसके कारण 19 मार्च, 2025 को पंजाब पुलिस ने शंभू और खनौरी के मोर्चे खाली कराए और कई किसान नेताओं को हिरासत में लिया। इस कार्रवाई को डल्लेवाल और उनके समर्थकों ने जबरदस्ती धरना उठवाने के रूप में देखा। 2026 में भी एम.एस.पी., कर्ज माफी, पानी, फसल विविधीकरण और किसानी को आॢथक मुनाफा आदि  किसान संघर्ष के मुख्य मुद्दे हैं। 2026 में एस.के.एम. (गैर-राजनीतिक) ने पंजाब भर में धरनों के जरिए एम.एस.पी. की कानूनी गारंटी, किसान-मजदूर कर्ज माफी सहित कई मांगें उठाईं।

इसी दौरान जगजीत सिंह डल्लेवाल द्वारा 16 अगस्त, 2026 से पंजाब और हरियाणा के कई जिलों में किसान आंदोलन शुरू किया गया, जिसमें सड़कों को जाम करना, रेल रोको प्रदर्शन और सरकारी दफ्तरों के आगे धरने शामिल थे। कई जगहों पर हिरासत और टकराव की घटनाएं भी सामने आईं, जिससे स्थिति और तनावपूर्ण बनी। लेकिन अब किसान नेताओं की हरियाणा सरकार के अधिकारियों से बातचीत होने के बाद डल्लेवाल और साथियों की केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर के साथ 4 सितम्बर को बैठक तय होने के कारण खनौरी का धरना स्थगित कर दिया गया है।

यदि आंदोलन से कुछ पाने और खोने की बात करें, तो 2021 में 3 कृषि कानूनों की वापसी, किसानों की राजनीतिक ताकत और पहचान में बढ़ोतरी, एम.एस.पी. और कृषि नीतियों के सवालों का राष्ट्रीय चर्चा में आना ‘पाने’ में गिना जा सकता है। लेकिन अगर खोने की बात करें तो सबसे बड़ा नुकसान आंदोलन की एकता का टूटना और नेताओं के बीच फूट का बढऩा रहा। लंबे धरनों के कारण आॢथक और सामाजिक नुकसान हुआ और कई मौकों पर जनसमर्थन में कमी आई, एम.एस.पी. की कानूनी गारंटी और अन्य मांगें अभी भी अधूरी हैं। लेकिन इस गतिरोध को खत्म करने के लिए दोनों पक्षों को, चाहे वह सरकार हो या किसान, एक लचीली नीति अपनानी होगी और किसान नेताओं को सभी मांगों को एक बार में मानने या लागू करने की जिद करने की बजाय, मांगों को चरणबद्ध तरीके से लागू करने के लिए सरकार के साथ बातचीत करके आपसी सहमति बनाने की जरूरत है।-इकबाल सिंह चन्नी

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