दिल्ली विकास प्राधिकरण (डी.डी.ए.) ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला लिया है। 50 साल से अधिक पुराने, व्यक्तिगत प्लॉट पर बने दो-मंजिला डी.डी.ए. मकानों के पुनॢनर्माण और रीडिवैल्पमैंट के लिए एक समान नीति को मंजूरी दे दी गई है। दिल्ली की कई पुरानी कॉलोनियों के निवासियों के लिए यह लंबे समय से चली आ रही मांग का जवाब है। ये मकान 1962 के मास्टर प्लान के दौर में बने थे और अब संरचनात्मक रूप से कमजोर हो चुके हैं। मालिक अब मौजूदा मास्टर प्लान, एफ.ए.आर., ग्राऊंड कवरेज, ऊंचाई सीमा, स्ट्रक्चरल सेफ्टी और फायर सेफ्टी नियमों के अधीन अपने पुराने घर को गिराकर नया बना सकेंगे। इसके लिए उन्हें रूपांतरण शुल्क, बैटरमैंट लेवी और स्क्रूटनी फीस भी देनी होगी।

सवाल है कि यह फैसला फ्लैट होल्डर्स या मकान मालिकों के लिए कितना लाभकारी है? जाहिर है, सुरक्षा की दृष्टि से बहुत पुरानी इमारतों में दरारें, लीकेज, जंग लगी पाइपलाइन और कमजोर नींव आम बात हो गई है। भूकंप जैसे खतरों के बीच ये मकान जानलेवा साबित हो सकते हैं। रीडिवैल्पमैंट से आधुनिक, भूकंप-रोधी, बेहतर वैंटिलेशन और सुविधाओं वाले घर मिलेंगे। संपत्ति का मूल्य बढ़ेगा। कई परिवारों के लिए यह सपना पूरा होने जैसा है। पुराने छोटे घर की जगह ज्यादा उपयोगी स्पेस। 

लेकिन इसके साथ ही नुकसान भी कम नहीं। आज के दौर के हिसाब से निर्माण लागत भारी पड़ सकती है। हो सकता है कि नवनिर्माण के लिए कई मध्यमवर्गीय परिवारों के पास इतनी पूंजी न हो। निर्माण के दौरान अस्थायी आवास की समस्या खड़ी हो जाएगी। निर्माण को लेकर पड़ोसियों के बीच विवाद बढ़ सकते हैं। यदि कोई मकान ऊंचा बना तो दूसरे की रोशनी और हवा प्रभावित होगी। अगर कई मकान एक साथ टूटें तो पूरे इलाके में धूल, शोर और ट्रैफिक का संकट गहरा जाएगा। गौरतलब है कि यह नीति व्यक्तिगत प्लॉट तक सीमित है, समूह आवास या सोसायटियों पर नहीं। इसलिए इस योजना से सभी पुराने डी.डी.ए. निवासी समान रूप से लाभान्वित नहीं होंगे।

यदि यह योजना कामयाब हुई तो क्या यह योजना अन्य शहरों में दोहराई जानी चाहिए? हां, लेकिन सावधानी से। मुंबई, कोलकाता, चेन्नई जैसे शहरों में भी 50-60 साल पुरानी सरकारी या निजी कॉलोनियां जर्जर हालत में हैं। रीडिवैल्पमैंट से आवास संकट कम हो सकता है और भूमि का बेहतर उपयोग भी संभव है। लेकिन हर शहर की अपनी भूगोल, जलवायु और सामाजिक संरचना है। दिल्ली में भूमि की कमी और घनी आबादी के कारण यह जरूरी हो सकता है। अन्य जगहों पर अगर हरित क्षेत्र ज्यादा हों या सांस्कृतिक धरोहर मजबूत हो तो जल्दबाजी नुकसानदेह साबित हो सकती है। नीति में स्थानीय जरूरतों, पर्यावरण प्रभाव आकलन और निवासियों की सहमति को अनिवार्य बनाना चाहिए। बिना पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर, जैसे पानी, सीवर, बिजली, सड़क के ऐसी रीडिवैल्पमैंट केवल भीड़ ही बढ़ाएगी।

ऐसे में टाऊन प्लानर्स और विशेषज्ञों का दृष्टिकोण मिश्रित है। कई टाऊन प्लानर्स का मानना है कि पुरानी इमारतों को नजरअंदाज करना खतरनाक है। दिल्ली की आबादी 2047 तक और बढ़ेगी। मास्टर प्लान-2047 भी इसी दिशा में सोचता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि रीडिवैल्पमैंट से घनत्व नियंत्रित तरीके से बढ़ाया जा सकता है, बशर्ते एफ.ए.आर. और ऊंचाई के नियमों का सख्ती से पालन हो। साथ ही, पार्किंग, खुले स्थान और सामुदायिक सुविधाओं का प्रावधान भी जरूरी हो। कुछ प्लानर्स चेतावनी देते हैं कि अनियोजित रीडिवैल्पमैंट से ‘कंक्रीट के जंगल’ का विस्तार होगा। पुरानी कॉलोनियां अपेक्षाकृत कम घनत्व वाली थीं, पेड़-पौधे ज्यादा थे, गलियां चौड़ी और सामुदायिक भावना मजबूत थी। नई इमारतें अगर ऊंची और सघन हुईं तो ये विशेषताएं खो जाएंगी। ट्रैफिक जाम बढ़ेगा, वायु प्रदूषण और गर्मी का प्रभाव और गंभीर होगा। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि रीडिवैल्पमैंट के साथ ग्रीन बिल्डिंग मानकों, वर्षा जल संचयन और सोलर ऊर्जा को अनिवार्य किया जाए। साथ ही, विरासत क्षेत्रों में विशेष नियंत्रण रखा जाए।

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल, यह नीति दिल्ली की पुरानी संस्कृति और थीम से कैसे मेल खाएगी? दिल्ली सिर्फ इमारतों का शहर नहीं, यादों, मोहल्लों और सामुदायिक जीवन का शहर है। दिल्ली की पुरानी कालोनियों में दशकों से एक साथ रहने वाले परिवार, पड़ोसी रिश्ते, स्थानीय बाजार और छोटे-छोटे पार्क शहर की पहचान हैं। दो-मंजिला घरों की सादगी, आंगन और छत की संस्कृति मध्यवर्गीय दिल्ली की आत्मा रही है। रीडिवैल्पमैंट अगर केवल ऊंची इमारतों और आधुनिक डिजाइन तक सीमित रही तो यह संस्कृति छिन्न-भिन्न हो सकती है। नई इमारतें अक्सर अलगाव पैदा करती हैं। 

पुरानी कॉलोनियों में बच्चे गलियों में खेलते थे, बुजुर्ग शाम को पार्क में बैठते थे। क्या नई संरचनाएं इसे बनाए रख पाएंगी? टाऊन प्लानिंग में ‘हैरिटेज सैंसेटिव’ दृष्टिकोण जरूरी है। जहां संभव हो, पुरानी वास्तुकला के तत्वों, जैसे बालकनियां, आंगन या स्थानीय सामग्री को नए डिजाइन में शामिल किया जाए। पेड़ों को बचाने और खुले स्थान बढ़ाने पर जोर दिया जाए। रीडिवैल्पमैंट केवल इमारत बदलने का नहीं, सामुदायिक जीवन को मजबूत करने का माध्यम बने। कुल मिलाकर, डी.डी.ए. की यह नीति समय की मांग है। फ्लैट होल्डर्स या मकान मालिकों को लाभ मिलेगा, बशर्ते लागत और प्रक्रिया सरल रखी जाए। टाऊन प्लानर्स सही कहते हैं कि नियंत्रित और संतुलित रीडिवैल्पमैंट ही टिकाऊ होगा। दिल्ली की पुरानी संस्कृति को पूरी तरह मिटाने की बजाय, उसे नए रूप में जीवित रखने का प्रयास होना चाहिए। अन्यथा, आधुनिक घर तो मिल जाएंगे लेकिन वह दिल्ली खो जाएगी। शहर का विकास जरूरी है लेकिन उसकी आत्मा की रक्षा भी उतनी ही जरूरी।-रजनीश कपूर 

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