जिस देश की सरकारों ने ‘लोक कल्याण’ पर आधारित नीति-ढांचे वाला विकास मॉडल अपनाया है, वहां 4-5 साल की उम्र के छोटे-छोटे बच्चों की मानसिक-शारीरिक क्षमता का वैज्ञानिक विधि से निरीक्षण करके उनकी भविष्य की शैक्षणिक रुचियों और खेल की आदतों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इतनी सी उम्र में पूंजीवादी विकास मॉडल अपनाने वाले कम विकसित या विकासशील देशों के बच्चों के माता-पिता अभी उन्हें स्कूल भेजने या न भेजने की दुविधा में फंसे होते हैं और अक्सर आर्थिक तंगियों के कारण अपने बच्चों को बाल श्रम की भट्टी में झोंक देते हैं। 

अनपढ़ता, गरीबी, कुपोषण की मार झेलती मासूमों की यह पीढ़ी हमेशा के लिए चोरियों, लूट-पाट, नशेड़ीपन, अपराध आदि असामाजिक गतिविधियों में उलझ कर रह जाती है। इससे अगला घातक रोग तथाकथित धर्म गुरुओं, धार्मिक संस्थाओं या डेरों आदि की संगत से चिपक जाता है। यहां नई पीढ़ी को ‘आस्था’ के नाम पर प्रतिक्रियावादी विचारों का लेप चढ़ाकर पिछलग्गू, अंधविश्वासी और पूरी तरह से विज्ञान-विरोधी बनने की राह पर धकेल दिया जाता है। देश के अंदर ऐसी प्रवृत्ति प्रचलित है।

भारतीय समाज भी उपरोक्त चरम अमानवीय घटनाओं से अछूता नहीं है। हमारा समाज लगभग सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में मौजूद उक्त लक्षणों के कारण स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी सामंती दौर के प्रतिक्रियावादी विचारों और रीति-रिवाजों से मुक्त नहीं हो सका है। परंतु 2014 के बाद, जब से मोदी सरकार ने देश की केंद्रीय सत्ता संभाली है, तब से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) और इसके द्वारा खड़े किए गए पुरातनपंथी संगठन, देश को पूरी तरह से मध्ययुग के अंधेरे दौर की ओर धकेलने के प्रयास में लगे हुए हैं। संघ परिवार द्वारा इस उद्देश्य के लिए युवा पीढ़ी पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। हर साल की तरह इस साल भी जैसे सावन के महीने में ‘कांवड़ यात्रा’ के लिए गए 4 करोड़ से अधिक लोग, विशेष रूप से 30 साल से कम उम्र के युवा लड़के-लड़कियां उपद्रव मचाते देखे गए हैं, जो भारतीय समाज के लिए भविष्य के बड़े खतरों का सूचक है। साथ ही वोट की राजनीति के लिए युवाओं का भविष्य तबाह करने की भाजपा की अत्यंत घटिया किस्म की रणनीति भी बखूबी उजागर हुई है। 

यह भी याद रखने योग्य है कि ऐसा ही अंधविश्वासी रवैया मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों सहित लगभग सभी धर्मों में प्रचलित है। मुस्लिम परिवारों के जिन बच्चों को वैज्ञानिक शिक्षा देने की बजाय ‘शरिया’, जो कुरान-ए-पाक की शिक्षाओं से बिल्कुल मेल नहीं खाती, की ‘अधीनता’ का पाठ पढ़ाया जाता है और गुण-दोष देखे बिना सभी गैर-मुसलमानों को ‘काफिर’ बनाकर पेश किया जाता है, उन्होंने अपने समाज को आगे बढ़ाने में क्या योगदान देना है? मुस्लिम समाज में महिलाओं के खिलाफ अनुचित व्यवहार और उनकी असमानता को भी सही नहीं ठहराया जा सकता। 

श्री आनंदपुर साहिब में मनाए जाने वाले होला-मोहल्ला के पवित्र त्यौहार के अवसर पर जिस तरह सिख परिवारों के कुछ युवा डी.जे. की कान फोड़ू धुनों पर बहुत ही भद्दे किस्म का, अनावश्यक शोर-शराबा करते हैं, उसका सिख धर्म की मानवीय परंपराओं और गौरवशाली कुर्बानियों से क्या लेना-देना है? ईसाई मत के कुकुरमुत्ते की तरह उगे अनेक धर्म गुरुओं द्वारा जैसे ‘प्रार्थना’ के नाम पर लोगों के सारे रोग भगाने और हर प्रकार के कष्ट हरने का झूठ बोलकर भोले-भाले अनुयायियों को गुमराह किया जाता है, उसका गुलामी के युग के दौरान ईसा मसीह द्वारा गुलामों की मुक्ति के लिए किए गए त्याग से क्या मेल है? हकीकत तो यह है कि लोगों के इलाज के लिए सबसे अधिक अत्याधुनिक अस्पताल उन देशों में बने हैं, जहां ईसाई आबादी का भारी बहुमत है। जबकि शाश्वत सत्य यही है कि किसी भी धर्म की स्थापना, किसी खास दौर के समाज में प्रचलित गलत रीति-रिवाजों और शासक वर्गों द्वारा पीड़ितों पर ढाए जाने वाले जुल्मों के खिलाफ लडऩे के लिए उस समय के ‘मार्गदर्शकों’ द्वारा की जाती है। 

याद रहे, धार्मिक स्वतंत्रता के ध्वजवाहक बनना और हर किसी को अपनी इच्छानुसार किसी भी धर्म को मानने या न मानने की स्वतंत्रता का अधिकार देना बिल्कुल जायज और गर्व करने योग्य बात है। ‘विविधता में एकता’ वाली भारत की गौरवशाली पहचान के तहत भी विभिन्न जातियों में बंटे बहुराष्ट्रीय और बहुधार्मिक लोग, अपनी स्वतंत्र इच्छा से अपने-अपने धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक अधिकारों का उपयोग करते हुए सदियों से मिलकर रहते आ रहे हैं। परंतु धर्म के प्रति अंधी आस्था के नाम पर युवा पीढ़ी के मनों में दूसरे धर्म को मानने वालों के प्रति अंधी नफरत भरना, उपद्रव मचाना, ङ्क्षहसा करना और हर तरीके से उनका अनादर करने में अपनी शान समझना देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। 

आवश्यक है कि हमारे युवा बच्चों और बच्चियों के हाथों में कलम-किताब हो। वे पौराणिक कथा-कहानियों, प्रतिक्रियावादी रीति-रिवाजों और सांप्रदायिक घृणा से मुक्त होकर तर्कवादी बनें। किसी भी देश-क्षेत्र के लोग, वैज्ञानिक सोच अपनाकर ही नया समाज निर्माण करने में अपना सकारात्मक योगदान दे सकते हैं, ऐसा समाज, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा जिसकी विशिष्ट पहचान हो।-मंगत राम पासला

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