शिक्षक भाग्य के विधाता होते हैं। करोड़ों विद्यार्थियों के जीवन में विद्या, कौशल, नैतिकता और प्रेरणा का संचार करने वाले शिक्षकों के प्रति सभी देशवासियों की ओर से, ‘शिक्षक दिवस’ के अवसर पर, मैं कृतज्ञता प्रकट करती हूं। यह सभी जानते हैं कि हमारे देश के दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन चाहते थे कि उनका जन्मदिन ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाए। वह विश्व-प्रसिद्ध विद्वान, लेखक और राजनेता थे, लेकिन उन्होंने शिक्षक की भूमिका को सबसे महत्वपूर्ण माना। अत्यंत लोकप्रिय पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से एक बार पूछा गया कि लोग उन्हें एक वैज्ञानिक के रूप में याद रखेंगे या राष्ट्रपति के रूप में। कलाम साहब ने उत्तर दिया कि वह चाहते हैं कि उन्हें एक शिक्षक के रूप में याद किया जाए।

शिक्षक आदरणीय हों और विद्यार्थी श्रद्धान्वित हों, यही हमारा आदर्श रहा है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है कि शिक्षक विद्यार्थियों से अपनी संतान की तरह प्रेम करें, उनके साथ भेदभाव रहित समानता का व्यवहार करें, उन पर क्रोध न करें, धैर्यवान हों, विद्यार्थियों के कल्याण पर अपना ध्यान केंद्रित रखें और उनकी ग्रहण शक्ति के अनुसार  शिक्षा प्रदान करें। ऐसे शिक्षकों के प्रति सम्मान की भावना के साथ ही लगभग तीन हजार साल पहले, तैत्तिरीय उपनिषद की शिक्षावल्ली  में ‘आचार्यदेवो भव’ का संदेश दिया गया था।

सौभाग्य से अपने विद्यार्थी जीवन में मुझे बहुत अच्छे और स्नेही शिक्षकों का मार्गदर्शन मिलता रहा है। हमारी शिक्षिकाएं, स्कूल की छुट्टी के बाद भी, कभी-कभी अपने घर में ही हमें पढ़ाती थीं और हमारी देखभाल भी करती थीं। सातवीं कक्षा के बाद, अपने गांव से बाहर जाकर पढ़ाई करने वाली मैं पहली छात्रा थी। आगे की पढ़ाई के दौरान भुवनेश्वर में भी, मुझे शिक्षकों का भरपूर स्नेह और मार्गदर्शन मिलता रहा। अपने शिक्षकों का विनम्रतापूर्वक उल्लेख मैंने यह बताने के लिए किया है कि स्नेही और समर्पित शिक्षक विद्यार्थियों में अथाह क्षमता और प्रेरणा का संचार करते हैं। इससे शक्ति प्राप्त करके,  विद्यार्थियों में किसी भी चुनौती का सामना करने का साहस और बड़े से बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने का उत्साह बना रहता है।  मेरा मानना है कि शिक्षक पाठ्यक्रम तो पढ़ाते ही हैं, अपनी गतिविधियों के माध्यम से, विद्यार्थियों को जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं। इस प्रकार, शिक्षक अपने विद्यार्थियों के मार्गदर्शक तो होते ही हैं, उनके शुभचिंतक, मित्र और सहयोगी भी होते हैं।

उत्तम शिक्षक की विशेषता के बारे में हमारी संस्कृति और परंपरा में प्राचीन काल से चले आ रहे विचार आज भी पूरी तरह प्रासंगिक हैं। सदियों पहले, अपने नाटक ‘मालविकाग्निमित्रम’ में महाकवि कालिदास कहते हैं कि जिस शिक्षक में भरपूर ज्ञान हो और उस ज्ञान को समझाने की क्षमता भी हो, वही अच्छा शिक्षक होता है।

अध्यापन केवल एक पेशा नहीं है; यह एक  पवित्र प्रण है। यह केवल व्यवसाय या नौकरी नहीं है, बल्कि मानवता के निर्माण का पवित्र कार्य है। यह भविष्य की पीढिय़ों के लिए मार्ग प्रशस्त करने का सच्चा कार्य है। अध्यापन से जुड़ी यादें मुझे विशेष संतुष्टि देती हैं।  मैंने ओडिशा के रायरंगपुर में स्थित ‘श्री अरबिंदो इंटीग्रल स्कूल’ में बच्चों को पढ़ाया है। विभिन्न विषयों को पढ़ाने के अलावा मैं बच्चों के साथ संगीत, खेलों और नाटकों की तैयारियों में पूरे मन से उनकी मदद करती थी। बच्चों के साथ स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस की तैयारी और उन समारोहों में उनके उत्साह को याद करके आज भी मुझे  रोमांच होता है। विद्यार्थियों को सुंदर प्राकृतिक स्थानों पर पिकनिक के लिए ले जाना और खेल-खेल में उन्हें जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के बारे में जानकारी देना मुझे बहुत सार्थक लगता था। 

स्कूल शिक्षा पूरी करने के वर्षों बाद भी मेरे विद्यार्थी मुझे अपने पारिवारिक समारोहों में बुलाते रहे हैं। मुझे अपने कई विद्यार्थियों के नाम तो याद हैं ही, उन्हें बुलाने वाले उपनाम भी मुझे आज तक याद हैं। मैंने जिन बच्चों को पढ़ाया है, उनसे बहुत कुछ सीखा भी है। मैं समझती हूं कि बच्चों की सहजता और जिज्ञासा सभी शिक्षकों को बहुत कुछ सिखाती है। राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल का दूसरा वर्ष पूरा होने के अवसर पर मैंने राष्ट्रपति भवन परिसर में स्थित स्कूल के विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण के विषय पर पढ़ाया और उनसे बातचीत की। मेरा प्रयास रहता है कि मैं विद्यार्थियों से मिलूं और उनके विचारों को समझूं। माता-पिता और अभिभावक बहुत भरोसे के  साथ अपने बच्चों को शिक्षकों के पास भेजते हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि शिक्षक अपनत्व की भावना के साथ बच्चों की सुरक्षा और विकास पर ध्यान देंगे। इस पवित्र आस्था की रक्षा करना प्रत्येक शिक्षक का धर्म है। 

शिक्षक की भावना, आचरण और व्यवहार  ऐसा होना चाहिए जिससे बच्चों में डर और भय पैदा न हो, उनका मनोबल न टूटे और उनमें हीन भावना पैदा न हो। अच्छे शिक्षक यह सुनिश्चित करते हैं कि विद्यार्थी अपने सर्वोत्तम रूप को प्राप्त कर सकें। विद्यार्थी को अच्छा व्यक्ति बनाना शिक्षक का पवित्र कत्र्तव्य है। नैतिकता के मार्ग पर चलते हुए सफलता और नाम कमाने वाले विद्यार्थी ही शिक्षक की सफलता के जीवंत रूप होते हैं। हमारा देश सामाजिक समावेश के साथ विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। मैं चाहूंगी कि विकास यात्रा की इस कड़ी में हमारे शिक्षक ऐसी पीढिय़ों का निर्माण करें जो हमारी संस्कृति की  गौरवशाली परंपरा के महत्व को समझें, वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ मानवता के भले के लिए काम करें, अंत्योदय के आदर्शों को धारण करें, पर्यावरण और पशु-पक्षियों के संरक्षण में सक्रिय रहें, व्यक्तिगत और सांझा गतिविधियों में उत्कृष्टता प्राप्त करें और ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ की भावना के साथ आगे बढ़ें। मेरी सभी देशवासियों से विनती है कि वे निष्ठावान शिक्षकों के प्रति सदैव सम्मान की भावना रखें। मेरी कामना है कि समर्पित शिक्षकों के योगदान से भारत पढ़े और बहुत आगे बढ़े।-द्रौपदी मुर्मू

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