आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कनाडा में हिंदू पहचान को लेकर व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि हिंदू होने का अर्थ किसी एक भाषा, धार्मिक अनुष्ठान या जीवनशैली को अपनाना नहीं है। उनके अनुसार अलग-अलग परंपराएं और सामाजिक विविधताएं मानव जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं, जबकि इनके पीछे मूल एकता मौजूद रहती है।

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि हिंदू पहचान को किसी खास भाषा, पूजा-पद्धति या जीवनशैली से परिभाषित नहीं किया जा सकता। उन्होंने तर्क दिया कि इसका मुख्य सिद्धांत विविधता का सम्मान और अस्तित्व की एकता को पहचानना है। ग्रेटर टोरंटो इलाके में 2,000 से ज्यादा हिंदुओं और समुदाय के शुभचिंतकों की सभा को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि बाहरी अंतर स्वाभाविक हैं, लेकिन वे मानवता को उसकी मूल भावना में विभाजित नहीं करते।

उन्होंने कहा, “जब मैं हिंदू कहता हूं, तो हिंदू शब्द को किसी खास भाषा, किसी खास पूजा-पद्धति या किसी खास जीवन-शैली से परिभाषित नहीं किया जा सकता।” भागवत ने आगे कहा, “ये सभी चीजें मौजूद हैं। ये इंसानों की विविधताएं हैं। हिंदू सभी का सम्मान करते हैं, हिंदू सभी को स्वीकार करते हैं। उन्हें इससे कोई परेशानी नहीं होती।”

उनकी ये बातें दुनिया को दोस्ती के साथ अपनाना थीम पर आयोजित ‘हिंदू विश्व बंधु’ सभा में कहीं गईं। इस कार्यक्रम में पूरे कनाडा से समुदाय और धर्म के नेता, विद्वान, पेशेवर और संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। भागवत ने कहा कि भारत की सभ्यतागत परंपराओं ने लोगों को दिखाई देने वाले अंतरों के नीचे एक साझा सिद्धांत को पहचानना सिखाया है।

आरएसएस प्रमुख के बयान की बड़ी बातें

  • उन्होंने कहा, “उन्हें विविधता के भीतर छिपी एकता को देखना सिखाया गया है। इसलिए भारत में, विविधता कभी भी एकता के लिए समस्या नहीं बनती क्योंकि हमारी परंपरा हमें न केवल ‘विविधता में एकता’ के बारे में बताती है, बल्कि ‘एकता की विविधताओं’ के बारे में भी बताती है।” उन्होंने कहा कि अंतरों को स्वीकार किया जाना चाहिए, उनका सम्मान किया जाना चाहिए और उनका जश्न मनाया जाना चाहिए क्योंकि वे एक छिपी हुई एकता की अभिव्यक्ति हैं।
  • भागवत ने कहा, “हमें इस विविधता की सेवा करनी चाहिए, इसे स्वीकार करना चाहिए और इसका सम्मान करना चाहिए क्योंकि यह एकता की अभिव्यक्ति है। यह उसे सुंदर बनाती है। यह सजावट की तरह है। हम इसका जश्न मनाते हैं।” उन्होंने कहा कि भारत में हमेशा से कई जातियां, धर्म, भाषाएं, परंपराएं और जीवन-शैलियां रही हैं। इसकी एकता के लिए उन अंतरों का खत्म होना जरूरी नहीं है।
  • उन्होंने कहा, “कोई भी चीज अकेली नहीं है, कोई भी चीज एकल नहीं है। लेकिन सब कुछ एक है। हम यह नहीं कहते कि ‘सभी एक हैं’। हम कहते हैं कि ‘सब कुछ एक है’।” भागवत ने आगे कहा, “विविधता स्वाभाविक है। एकता ही वास्तविकता है।”
  • उन्होंने बदलते बाहरी हालात और गहरी व निरंतर वास्तविकता के बीच अंतर बताने के लिए राजा जनक से जुड़ी एक प्राचीन कथा का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मानवता अंतरों का अनुभव करती है, लेकिन एक बनी रहती है। उन्होंने कहा, “हम इन सभी चीजों का अनुभव करते हैं, लेकिन वे बदल रही हैं। वे माया हैं। ये अंतर माया हैं। हमें इनसे गुजरना होगा। हमें भौतिक रूप से इनका सामना करना होगा, इनसे निपटना होगा। लेकिन असल में, कोई अंतर नहीं है। मानवता एक है।”
  • भागवत ने कहा कि इस समझ का मतलब है कि लोगों को दुनिया को ‘अपना’ और ‘दूसरों का’ मानकर नहीं बांटना चाहिए। उन्होंने कहा, “पूरी धरती एक परिवार है। सब कुछ दिव्य है, इसलिए हर चीज का सम्मान और महत्व बराबर है।” आरएसएस प्रमुख ने कहा कि एक-दूसरे के साथ मिलकर रहने की भावना से ही दूसरों की सेवा करने का भाव स्वाभाविक रूप से आता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि दया की भावना सिर्फ हिंदुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंसानों का एक स्वाभाविक गुण है।
  • उन्होंने कहा, “हिंदुओं ने ऐसा किया है। इसका मतलब यह नहीं है कि इस पर सिर्फ हिंदुओं का एकाधिकार है। यह इंसानों की एक स्वाभाविक भावना है।” अपनी बात को समझाने के लिए उन्होंने पूछा कि क्या कोई व्यक्ति किसी भूखे इंसान के सामने, उसे खाना दिए बिना या मुंह फेरे बिना, आराम से भरपेट खाना खा सकता है। 
  • भागवत ने कहा, “आप उस व्यक्ति को देखकर अपना खाना नहीं खा सकते। कोई भी ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि हम सभी इंसान हैं और उस स्वाभाविक एकता की वजह से ही इंसानों में यह खासियत होती है।” उन्होंने कहा कि इंसानों में दूसरों को वंचित रखने और जरूरतमंदों के साथ चीजें बांटने, दोनों की क्षमता होती है। इस चुनाव को सही दिशा देने के लिए मूल्यों की जरूरत होती है। 

उन्होंने कहा, “सिर्फ इंसान ही ऐसा कर सकते हैं। इंसान दूसरों से खाना छीन सकते हैं। इंसान भूखों को खाना खिला सकते हैं।” भागवत ने कहा कि हिंदू समाज को अपने सिद्धांतों को दूसरों पर थोपने के बजाय अपने आचरण से दिखाना चाहिए। उन्होंने कहा, “हिंदू समाज को मिसाल पेश करनी चाहिए। हम ऐसे नेता हैं जो भीतर से नेतृत्व करते हैं और उदाहरण पेश करके आगे बढ़ते हैं।”

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