मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने के साथ कच्चे तेल की कीमतों ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली है। अमेरिका और ईरान के बीच समुद्री रास्तों पर बढ़ते हमलों ने तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है। खास तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर बाजार की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि दुनिया का बड़ी मात्रा में तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। सोमवार सुबह अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 0.77 फीसदी या 0.74 डॉलर की बढ़त के साथ 97.02 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड करता दिखा। वहीं, WTI क्रूड 0.85 फीसदी या 0.78 डॉलर की बढ़त के साथ 92.26 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड करता दिखा। कच्चे तेल में इसी तरह तेजी जारी रही, तो दाम जल्द ही 100 डॉलर के पार जा सकते हैं। इससे एक बार फिर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका तेज हो गई है।
पिछले हफ्ते 10% महंगा हुआ WTI क्रूड
पिछले सप्ताह भी कच्चे तेल में जोरदार तेजी देखने को मिली थी। ब्रेंट क्रूड करीब 7.8 फीसदी महंगा हुआ, जबकि WTI की कीमत में लगभग 10 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा हमले शुरू होने के बाद होर्मुज स्ट्रेट से तेल की आवाजाही प्रभावित हुई है। इस रास्ते से सामान्य तौर पर दुनिया की करीब पांचवीं तेल आपूर्ति गुजरती है।
समुद्र में तेल टैंकरों को बनाया जा रहा निशाना
तनाव बढ़ने की एक बड़ी वजह समुद्र में तेल टैंकरों को निशाना बनाया जाना है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने शनिवार को ईरान के तीन तेल टैंकरों पर हमला किया। इनमें से एक टैंकर ईरान के खार्ग द्वीप के पास था। खार्ग द्वीप देश का प्रमुख तेल निर्यात केंद्र है। इसके जवाब में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की नौसेना ने भी तीन तेल टैंकरों को निशाना बनाने की बात कही। ईरान के मुताबिक, ये टैंकर होर्मुज स्ट्रेट में ऐसे रास्तों से गुजर रहे थे, जिनकी अनुमति नहीं थी। इसके अलावा तीन अमेरिकी जहाजों को भी निशाना बनाए जाने का दावा किया गया।
समुद्री खुफिया कंपनी Marisks के अनुसार, शनिवार की घटनाएं समुद्री संघर्ष में एक बड़ा बदलाव हैं। कंपनी का कहना है कि अब व्यावसायिक तेल टैंकर भी दोनों देशों के बीच आर्थिक दबाव बनाने का जरिया बनते जा रहे हैं। इससे सैन्य संघर्ष और सामान्य व्यापारिक जहाजों के बीच पहले जैसी स्पष्ट सीमा नहीं रह गई है।
होर्मुज से तेल की आवाजाही में बड़ी गिरावट
आंकड़ों से भी हालात की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। एनालिटिक्स कंपनी Kpler के मुताबिक, पिछले 10 दिनों में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से रोजाना औसतन केवल 10 कमोडिटी जहाज गुजरे हैं। मई के बाद यह सबसे निचला स्तर है। ईरान ने भी संकेत दिए हैं कि आने वाले दिनों में होर्मुज स्ट्रेट के बाहर एक प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया जा सकता है। ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहसेन रेजाई ने रविवार को यह जानकारी दी।
OPEC+ ने अक्टूबर के लिए उत्पादन नीति में नहीं किया बदलाव
इस बीच तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC+ ने अक्टूबर के लिए अपनी तेल उत्पादन नीति में कोई बदलाव नहीं किया है। रविवार को हुई बैठक के बाद संगठन ने कहा कि आगे उत्पादन को लेकर फैसला करने से पहले नए उत्पादन कोटे पर सहमति बनाना जरूरी है। बाजार के जानकारों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव जल्द खत्म होने की संभावना कम है। ANZ के विश्लेषकों के मुताबिक, सीमित सैन्य कार्रवाई के बीच लंबे समय तक टकराव जारी रह सकता है।
विश्लेषकों का अनुमान है कि 2026 के बाकी हिस्से में तेल का निर्यात दबाव में रह सकता है। इसके बाद 2026 की चौथी तिमाही के आखिर में सप्लाई धीरे-धीरे सामान्य होने की शुरुआत हो सकती है। युद्ध से पहले जिस स्तर पर तेल की आवाजाही थी, वहां पूरी तरह लौटने में 2027 की पहली तिमाही के आखिर या दूसरी तिमाही की शुरुआत तक का समय लग सकता है।
भारत में पट्रोल-डीजल के रेट
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बावजूद सोमवार, 7 सितंबर को भारत के प्रमुख शहरों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ। यानी फिलहाल वाहन चालकों को राहत मिली हुई है।
देश में आज पेट्रोल के दाम
| शहर | पेट्रोल की कीमत (rs /लीटर) |
|---|---|
| दिल्ली | 102.12 |
| कोलकाता | 113.51 |
| मुंबई | 111.21 |
| चेन्नई | 107.77 |
| हैदराबाद | 115.69 |
| बेंगलुरु | 110.89 |
देश में आज डीजल के दाम
| शहर | डीजल की कीमत (rs /लीटर) |
|---|---|
| दिल्ली | 95.20 |
| कोलकाता | 99.82 |
| मुंबई | 97.83 |
| चेन्नई | 99.55 |
| हैदराबाद | 103.82 |
| बेंगलुरु | 98.80 |
क्या बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीजल के भाव?
सेबी रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार डॉ रवि सिंह ने बताया कि फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की तेजी का सीधा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर नहीं दिखा है। लेकिन अगर मिडिल ईस्ट का संकट लंबा खिंचता है और होर्मुज से तेल की आवाजाही पर दबाव बना रहता है, तो आगे इसका असर भारत के फ्यूल मार्केट पर भी पड़ सकता है। महंगे कच्चे तेल से तेल मार्केटिंग कंपनियों का घाटा बढ़ा तो यह बोझ पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाकर जनता पर डाला जा सकता है।



















