अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन, उसे महाशैतान कहने वाले ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन भारत में हैं. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं. उन्होंने ट्रंप को एक नई टेंशन दे दी है. वो कह रहे हैं कि डॉलर का इलाज हम कर कर रहेंगे. उनकी सलाह है कि ब्रिक्स के सभी सदस्य खुद अपना करेंसी चलाएं. डॉलर पर निर्भरता खत्म करें. अब बहुत बुरी तरह चिढ़ जाएंगे ट्रंप. ईरानी राष्ट्रपति थोड़े दिन पहले बिश्केक में मोदी से मिले थे. तब मोदी ने वहां ताल ठोककर कहा कि भारत और ईरान ट्रेड बास्केट बढ़ाएंगे. जब ट्रंप ने कहा है कि ईरान से ट्रेड करने वाले पर ही 100% टैरिफ लगाएंगे, ऐसे समय में ईरान से व्यापार बढ़ाने की बात करने का मतलब है ये साफ करना कि भारत किसी दबाव में नहीं है.
पुतिन के बेहद खास और क्रेमलिन के प्रवक्ता डिमित्री पेस्कोव ने भी कहा है कि ब्रिक्स देश अब 90% पैसा अपनी लोकल करेंसी में लेते देते हैं. साफ़ तौर पर इशारा है कि क्या होने जा रहा है. दिल्ली के इस महाजमघट में जहां पूरी दुनिया की आबादी का आधा हिस्सा मौजूद है तो क्या ही किसी की दादागिरी चलेगी.और पेस्कोव ने भी यही कहा कि ट्रंप डॉलर को हथियार की तरह यूज़ कर रहे हैं उससे निपटने की जरूरत है.
तियानजिन में मोदी, पुतिन और जिनपिंग की तस्वीर देखकर भी ट्रंप चिढ़ गए थे. इस बार तो उनके खास सर्जियो गोर नई दिल्ली में तैनात हैं. उन्हें पल-पल की खबर पहुंचा रहे होंगे. अब सवाल है कि ब्रिक्स क्या कर सकता है. इसे समझने के लिए ब्रिक्स बैंक को समझना जरूरी है. इसकी स्थापना 2014 में हुई थी फोर्टालेजा समिट के दौरान. 100 बिलियन डॉलर इसमें शुरुआती पैसा लगाया गया था. शुरू में पांच संस्थापक सदस्य देशों ने 10-10 अरब डॉलर दिए थे. और जब नए सदस्य जुड़े जैसे मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, बांग्लादेश, इथियोपिया तो उसके लिए नियम यह रखा गया कि चाहे नए सदस्य देश जुड़ भी जाए लेकिन संस्थापक देशों की जो हिस्सेदारी है वो 55% से कम नहीं होगी. ब्रिक्स बैंकका हेडक्वार्टर शंघाई चीन में है. रीजनल ऑफिस साऊ पोलो ब्राजील, जोहान्सबर्ग और हमारे गांधीनगरमें है.
तो इसकी जो फंडिंग है और जो लोन डिसबर्समेंट है इसके लिए इंटरनेशनल मार्केट में बॉन्ड जारीकर पैसा इकट्ठा किया जाता है. उस फंड से ये बुनियादी ढांचा, स्वच्छ ऊर्जा, ट्रांसपोर्टेशन, शहरी विकास जिस देश को मेंबर को जरूरत है, वह इससे लोन ले सकता है.यहां आईएमएफ की तरह और वर्ल्ड बैंक की तरह किसी को वीटो या किसी एक देश का दबदबा नहीं चलता. यहां का जो लीडरशिप है इस बैंक का वो भी रोटेशनल है. भारत के केवी कामत थे इस बैंक के पहले सर्वेसर्वा. ब्रिक्स बैंक अमेरिकी डॉलर पर डिपेंडेंसी कम करने के लिए भारतीय रुपए, चीनी युआन, ब्राज़लियन रियाल और दक्षिण अफ्रीकी रैंड में भी अब बॉन्ड जारी करने लगा है. तो शुरुआत तो हो गई है. तो अब अब सवाल उठता है कि क्या यह डॉलर का विकल्प बन सकता है? नहीं. रातोंरात नहीं हो सकता.
डी-डालराइजेशन इतना आसान नहीं है. लेकिन इसका टारगेट है कि 30% जो हम टोटल लोन देते हैं, वो हम अपनी स्थानीय मुद्राओं में देंगे. इससे देशों को डॉलर में फॉरेक्स फ्लक्चुएशन के जोखिम से राहत मिलती है. लेकिन एक चैलेंज ये है कि अब भी खुद ही फंड जुटाने के लिए BRICS बैंक को इंटरनेशनल मार्केट यानी कई बार डॉलर वाले मार्केट में भी बॉन्ड देना पड़ता है, जारी करना पड़ता है. तो उसपर कंप्लीट डिपेंडेंसी खत्म करने के लिए Swift के नेटवर्क से हमें हटना पड़ेगा. जबकि जो टोटल ट्रेड है दुनिया का उसमें Swift नेटवर्क की हिस्सेदारी 80 से 85% है. तो बहुत आसान नहीं है लेकिन हां रास्ता उस तरफ जा सकता है ताकि ट्रंप जैसे शख्सियत के अधिनायकवाद को हमलोग चुनौती दे सकें.
ब्रिक्स की ताकत
दुनिका लगभग आधी आबादी ब्रिक्स देशों में है. अगर हम इकॉनमी में हिस्सेदारी देखें तो ब्रिक्स के जो 10 देश हैं उनका नॉमिनल जीडीपी पूरी दुनिया का 30% है.अगर परचेजिंग पावर कैपेसिटी के आधार पर देखें तो हमारा 40% और बाकी दुनिया 60%. अब अगर ऑयल प्रोडक्शन को देखें तो ब्राजील-यूएई के शामिल होने से और ईरान के आ जाने से 40% से अधिक हिस्सा हम तेल का खुद ही उत्पादन करते हैं. मुख्य खरीदार भारत और चीन हैं. तो इसलिए ये कोई बहुत बड़ा रॉकेट साइंस नहीं है कि इस इस पर डिपेंडेंसी हम घटा सकते हैं.अब सवाल उठता है कि ट्रंप आखिर इस तस्वीर से क्यों चिढ़े रहते हैं? जिसमें हंसते हुए, मुस्कुराते हुए नरेंद्र मोदी हैं, शी जिनपिंग है और व्लादमीर पुतिन हैं. तो अमेरिका को लगता है कि डॉलर नाम का हथियार कमजोर हो जाएगा. इसका डायरेक्ट इंपैक्ट अमेरिकन इकॉनमी पर होगा. वहां की मुद्रास्फीति यानी महंगाई पर असर पड़ेगा.
इसीलिए ट्रंप कहते हैं जो भी देश डॉलर को कमजोर करने या बदलने की कोशिश करेगा उस पर 100% टैरिफ लगाएंगे. ब्रिक्स का नाम लेते ही कहते हैं ब्रिक्स इज डेड. आप कहोगे कि अगर ब्रिक्स बैंक अपना सेटलमेंट सिस्टम बनाता है तो हम टैरिफ लगाएंगे. लेकिन जब बना ही लेगा तो प्रतिबंध लगाकर भी क्या कर लोगे? यही डर उनकी चिढ़ का एक बहुत बड़ा कारण है. फिर ट्रंप को लगता है कि चाइना ब्रिक्स का इस्तेमाल करके उनको सीधे टक्कर ना दे दे. वो तो दे ही रहा है.अमेरिका का पूरा बाजार चीन के सामान से भरा है. तुम चाहकर भी उसको नहीं रोक सकते. नहीं तो खुद के घर में लाले पड़ जाएंगे.
ट्रंप का गुस्सा इस बात को लेकर है कि ब्रिक्स धीरे-धीरे एक ऐसा महा आर्थिक ब्लॉक बन सकता है जो अमेरिका के वित्तीय नियंत्रण, प्रतिबंध लगाने की क्षमता और डॉलर के एकाधिकार को खुले तौर पर चैलेंज कर रहा है. दूसरी ओर ब्रिक्स ने बार-बार यह कहा है कि हम किसी थर्ड कंट्री यानी सदस्य देशों के बाहर के देशों को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं बने हैं. फिर भी ये लोग तो मानते नहीं तो ये इलाज जरूरी है.



















