समय की मांग है कि भारत देखभाल को एक संगठित सामाजिक व्यवस्था और सम्मानजनक व्यवसाय का स्वरूप दे। इसके लिए भारत को चीन, जापान, आस्ट्रेलिया, स्वीडन और डेनमार्क देशों के माडल का अध्ययन करना चाहिए। इससे कई लोगों को देश में रोजगार मिलने की संभावना है…

कभी भारतीय परिवार में बुजुर्ग घर की धुरी हुआ करते थे। संयुक्त परिवार में दादा-दादी, माता-पिता, बच्चे और अन्य सदस्य एक-दूसरे का सहारा बनकर रहते थे। उम्र बढऩे पर बुजुर्गों को यह चिंता नहीं रहती थी कि बीमारी या असहाय अवस्था में उनकी देखभाल कौन करेगा। परिवार ही उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा था। लेकिन आज संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवारों में बदल रहे हैं और इसके साथ ही देखभाल एक बड़ी सामाजिक चुनौती बनती जा रही है। नीति आयोग के अनुसार भारत में बुजुर्गों (60 वर्ष से ऊपर आयु) की आबादी 2022 में लगभग 147 मिलियन थी, जिसके 2050 तक बढक़र लगभग 347 मिलियन होने का अनुमान है। इतनी बड़ी बुजुर्ग आबादी की देखभाल केवल पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। इसके लिए देश को अभी से एक पेशेवर दीर्घकालीन और व्यवस्थित देखभाल नीति बनाने की आवश्यकता है। आजकल बहुत से परिवारों में केवल एक संतान होती है। उच्च शिक्षा और रोजगार के लिए बच्चे दूसरे शहरों अथवा विदेशों में चले जाते हैं। निजी क्षेत्र में लंबे कार्य घंटे, बच्चों की शिक्षा और बेहतर भविष्य की तलाश उन्हें वहीं बसने के लिए विवश कर देती है और माता-पिता अपने पैतृक घर में अकेले रह जाते हैं। बच्चों के लिए बार-बार पैतृक घर आना-जाना संभव नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप बुजुर्ग अपने बच्चों की राह देखते रहते और धीरे-धीरे अकेलेपन, असुरक्षा और निर्भरता का जीवन जीने लगते हैं। कभी-कभी स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि विदेश में रहने वाले बच्चे माता-पिता की बीमारी के समय और कुछ मामलों में अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हो पाते। यह केवल भावनात्मक पीड़ा का विषय नहीं है, बल्कि बदलती सामाजिक संरचना की एक गंभीर वास्तविकता है। पीढिय़ों के बीच बढ़ता विचारों का अंतर भी इस समस्या को जन्म देता है। कई बुजुर्ग अपनी पारंपरिक पारिवारिक प्रभुता छोडऩा नहीं चाहते, जबकि नई पीढ़ी स्वतंत्र जीवन और अपने निर्णयों को प्राथमिकता देती है। इससे मतभेद और टकराव पैदा होते हैं। कभी-कभी बच्चे अलग हो जाते हैं और पीछे रह गए बुजुर्गों की स्थिति अत्यंत कठिन हो जाती है। ऐसे समय में उन्हें केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि साथ, सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधा और नियमित देखभाल की आवश्यकता होती है। देखभाल की आवश्यकता केवल बुजुर्गों के लिए ही नहीं है बल्कि गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति, ऑपरेशन के बाद के मरीज, प्रसूति के बाद जच्चा-बच्चा की देखभाल, एकल स्त्री-पुरुष, मानसिक विकारों से जूझ रहे लोग, बच्चे और दिव्यांग व्यक्ति भी पेशेवर देखभालकत्र्ता की आवश्यकता महसूस कर सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी अनेक परिस्थितियों में पारंपरिक पारिवारिक देखभाल पर्याप्त नहीं होती। प्रशिक्षित देखभालकत्र्ता ऐसी परिस्थितियों में परिवार का महत्वपूर्ण सहारा बन सकता है।

एक संगठित होम-केयर व्यवस्था ऐसे परिवारों के लिए बड़ी राहत बन सकती है। भारत में 26.8 मिलियन भारतीय दिव्यांगता के साथ जीवन जी रहे हैं। दिव्यांग व्यक्तियों की समस्या तो और भी गंभीर है। जो दिव्यांग अपने दैनिक कार्यों के लिए पूरी तरह माता-पिता पर निर्भर हैं, माता-पिता के वृद्ध होने या निधन के बाद उनकी देखभाल कौन करेगा? यह दिव्यांग के माता-पिता के लिए गंभीर चिंतन का विषय हमेशा रहता है। बहन एवं अन्य रिश्तेदार होने पर भी विवाह, रोजगार और अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण उनके लिए निरंतर देखभाल करना कठिन हो जाता है। दिव्यांग व्यक्ति को माता-पिता के बाद कुछ परिस्थितियों में पारिवारिक पेंशन का अधिकार होता है, लेकिन पेंशन अकेली देखभाल की गारंटी नहीं है। उनके लिए दीर्घकालीन आवास, स्वास्थ्य सेवा, प्रशिक्षित व पेशेवर देखभालकर्ता और सामाजिक सुरक्षा की समग्र व्यवस्था जरूरी है। इस चुनौती का समाधान एक मजबूत देखभाल पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में है जिसमें परिवार, प्रशिक्षित देखभालकत्र्ता, अस्पताल, स्वास्थ्य सेवाएं, स्थानीय संस्थाएं, स्वयंसेवी संगठन और सरकार मिलकर काम करें। प्रत्येक जिले में आवश्यकता के अनुसार व्यावसायिक केयर सेंटर तथा प्रशिक्षित होम केयर सेवाओं का नेटवर्क विकसित किया जा सकता है, ताकि जरूरतमंद व्यक्ति को अपने घर पर ही देखभाल उपलब्ध हो सके। इसके साथ ही देखभाल को भारत में मान्यता प्राप्त व्यवसाय बनाया जाना चाहिए। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षण पाठ्यक्रम, परीक्षा और प्रमाणपत्र की व्यवस्था हो। प्रशिक्षित व्यक्ति को बुजुर्गों की दैनिक देखभाल, प्राथमिक चिकित्सा, स्वच्छता, पोषण, मानसिक स्वास्थ्य, दिव्यांगों की सहायता तथा गंभीर रोगियों की आवश्यक देखभाल का प्रशिक्षण दिया जाए। इससे देखभाल की गुणवत्ता बढ़ेगी और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। इस क्षेत्र में महिलाओं के लिए विशेष संभावनाएं हैं। भारतीय घरों में महिलाएं लंबे समय से देखभाल की जिम्मेदारी निभाती आई हैं। यदि उनके अनुभव को औपचारिक प्रशिक्षण और प्रमाणपत्र से जोड़ा जाए तो देखभाल का काम उनके लिए सम्मानजनक और नियमित रोजगार का माध्यम बन सकता है। भारत में परिवार का स्वरूप, जनसंख्या की आयु संरचना और जीवन की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। इसलिए देखभाल की पुरानी व्यवस्था को नए समय के अनुरूप बदलना होगा। बुजुर्गों, बीमारों और दिव्यांगों की देखभाल को केवल परिवार की निजी जिम्मेदारी मानना अब पर्याप्त नहीं है। समय की मांग है कि भारत देखभाल को एक संगठित सामाजिक व्यवस्था और सम्मानजनक व्यवसाय का स्वरूप दे। इसके लिए भारत को चीन, जापान, आस्ट्रेलिया, स्वीडन और डेनमार्क देशों के माडल का अध्ययन करना चाहिए। केन्द्र तथा राज्यों को मिलकर देखभाल क्षेत्र को औपचारिक स्वरूप प्रदान करने के लिए जल्द राष्ट्रीय नीति निर्धारण करनी चाहिए। एक मजबूत देखभाल पारिस्थितिकी तंत्र हमारे बुजुर्गों और निर्भर नागरिकों को सुरक्षा और सम्मान देगा, परिवारों का बोझ कम करेगा, महिलाओं व युवाओं को रोजगार देगा।-सत्यपाल वशिष्ठ

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