भारत के कोने-कोने में बौद्धिक गतिविधियों के आयोजन की ललक देखी जा सकती है। कई ग्रामीण अंचलों में तो दो या तीन दिनों का वार्षिक व्याख्यान आयोजित होता है। यह लोगों की बौद्धिक रुचि का सूचक है। मगर इन आयोजकों को संसाधनों की कमी का संकट नहीं, बल्कि उन्हें वक्ताओं की खोज में पसीना बहाना पड़ता है।
ऐसा नहीं है कि उच्च पदों, पुरस्कारों, पुस्तकों और बड़े मंचों के जरिए प्रसिद्धि पाए नामों या टेलीविजन चैनलों पर अराजक भाषा शैली से लोकप्रियता हासिल करने वाले पात्रों की कमी है। मगर उनमें न साहित्य है, न समाजशास्त्र। हां, हंसाने-रुलाने, तालियां बटोरने और जानकारियों को ‘भानुमति का कुनबा’ बनाकर परोसने की कला में वे जरूर निपुण हैं। जब-जब बौद्धिकता का प्रतिनिधित्व ऐसे लोगों द्वारा किया जाता है, समाज दिशाहीन महसूस करता है और मस्तिष्क अपनी बौद्धिक भूख मिटाने के लिए विकल्प तलाशता है। आज वही हो रहा है। भौतिकता और तकनीक सबसे नजदीक के मानसिक पड़ोसी बनते जा रहे हैं।
ऐसा उस देश में हो रहा है, जहां सिद्धांतों और दर्शनों की सूची कभी पूर्ण रूप से तैयार नहीं की जा सकती है। पतंजलि, गौतम बुद्ध, बाणभट्ट और कालिदास समेत अनगिनत रचनाकार हैं। मगर पिछले पांच-छह दशकों से नेहरू और गोलवलकर के बीच स्वघोषित पैरोकार बनकर बौद्धिक वर्ग प्रतिस्पर्धा करता रहा है। ऐसा करने से न तो नेहरू का नुकसान हुआ और न ही गोलवलकर का। हां, बौद्धिकता का ह्रास जरूर हुआ। यह प्रवृत्ति नेहरूवादियों और वामपंथियों ने शुरू की। जी भरकर गोलवलकर पर कीचड़ उछाला गया। स्वाभाविक है, प्रत्युत्तर के लायक नेहरू ही थे।
इसने विश्वविद्यालय परिसरों एवं राजनीतिक गलियारों के बीच भाषा, भाव-भंगिमा और तर्क सहित सभी स्तरों पर अंतर समाप्त कर दिया। इसका एक और दुष्परिणाम हुआ- बुद्धिजीवियों में राजनीति के प्रति आकर्षण जरूरत से ज्यादा बढ़ गया। पहले भी थोड़ा-बहुत था, पर जब बौद्धिकता से समझौते का प्रश्न उठा, तब बौद्धिकों ने राजनीति को त्याग दिया। माखन लाल चतुर्वेदी इसके उदाहरण हैं।
स्वतंत्रता संग्राम में दर्जनों बार उनके घर पर साम्राज्यवादियों ने छापा डाला था। उन्होंने जेल से ‘पुष्प की अभिलाषा’ कविता लिखी। स्वतंत्रता के बाद वे मध्य प्रदेश में कांग्रेस में सक्रिय हुए। मगर उन्हें अपमान का सामना करना पड़ा। आदर्श और यथार्थ के बीच के अंतर का प्रत्यक्ष अनुभव लेकर उन्होंने राजनीति को अलविदा कह दिया।
आंचलिक पत्रकारिता के जनक फणीश्वरनाथ रेणु ने भी यही किया। हमारे समाज में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। देश की राजनीति में एक अवसर आया, जब इसने श्रेष्ठता को गले लगाया। संविधान सभा महान विभूतियों की जुटान थी, चाहे गांधीवादी हों, समाजवादी हों या दक्षिणपंथी, सभी ज्ञान और अनुभवों का संगम थे। इसलिए विमर्श, संवाद, वाद-विवाद और पात्रता पर जब सवाल उठता है, तो सभी लोग संविधान सभा को ही याद करते हैं। यह राजनीति और बौद्धिकता का सुखद, मगर संक्षिप्त मांगलिक काल था।
पूरी दुनिया की सभ्यता इस बात की साक्षी है कि बौद्धिकता का ह्रास उसे संकीर्णताओं, हिंसात्मक प्रवृत्तियों, अराजक जीवन शैलियों और तर्कहीनता की ओर ले जाता है। साहित्य और समाजशास्त्र ही उसे इस सब से बचाता है। इसका कितना महत्त्व है, इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है- राजा पेएसी (प्रदेशी) अधर्म का प्रचारक था। उसके विवेक और आचरण में धर्म का स्थान नहीं था।
जैन धर्म के संस्थापक पार्श्वनाथ की परंपरा में केशी कुमार श्रमण ने राजा से संवाद किया। वे आध्यात्मिक ज्ञान और चिंतन आधारित स्वाध्याय से लबालब थे। पेएसी आत्मा के अस्तित्व को नकारता था और भौतिकवाद को अंतिम सत्य मानता था। उसने आत्मा के अस्तित्व को जानने के लिए वह प्रयोग कर रखा था, जो आज के समय में डंकन मैकडॉगल ने किया है। उदाहरण के तौर पर प्राणदंड से पूर्व और बाद में चोर का वजन लिया और उसमें कोई अंतर नहीं था। एक चोर को लोहकुंभी में बंद कर शीशे से ढक दिया। मृत्यु के बाद उसमें कोई छेद नहीं दिखा, जहां से आत्मा के बाहर निकलने की पुष्टि हो सके। मगर कुमार श्रमण उस राजा को धर्म की राह पर लाने में सफल रहे।
साधारणतया यह अपेक्षा की जाती है कि अगली पीढ़ी अपने पहले की पीढ़ी से अधिक बौद्धिकता-संपन्न होगी। मगर परिस्थितियां इसके विपरीत हैं। विचार में परिवर्तन के लिए सैकड़ों पुस्तकों, विविध प्रकार के संवादों और रचनात्मक विमर्शों की आवश्यकता होती है। भौतिकता की आहट बीसवीं सदी के मध्य में सुनाई पड़ने लगी थी।
तब भारत के बुद्धिजीवी पीढ़ियों के लिए बौद्धिक ऊर्जा लगाने लगे। 1924 में दक्षिणा रंजन शास्त्री की ‘भारतीय भौतिकवाद पर चार्वाक दृष्टि’ 1940 में गायकवाड़ ओरिएंटल शृंखला में जयराशि भट्ट ने तत्वोप्लवसिंह नामक दार्शनिक ग्रंथ की रचना की, जो नास्तिकवाद के एकपक्षीय दर्शन पर था। देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने ‘लोकायत दर्शन’ (1956) लिखा।
जब नवउदारवाद असामाजिकता, धन पशुता, कामाचार और अराजक जीवन शैली की ओर दुनिया को ले जा रहा है, तब भी बौद्धिक वर्ग ‘नेहरू-गोलवलकर’ के बीच ही शतरंज खेलने में लगा है। समुदाय और परिवार पर घोर भौतिकवाद तथा व्यक्तिवादी संस्कृति के ग्रहण का असर दिखने लगा है। मगर पूरी दुनिया का बौद्धिक समाज अघोषित रूप से ‘नीतिमूलक संप्रदाय’ का हिस्सा बना हुआ है। यह संप्रदाय किसी सिद्धांत को प्रतिष्ठित नहीं होने देता है। सिर्फ चलती-फिरती भाषा में एक-दूसरे पर प्रहार करता है।
न्याय दर्शन में संवाद के तीन प्रकार हैं- वाद, जल्प और वितंडा। सबसे हीन स्तर का वितंडावाद है। इसमें अपना कोई सिद्धांत नहीं होता है। दूसरे पर दोषारोपण कर केवल दोष ढूंढ़ा जाता है। ऐसे बौद्धिक साये में मानसिक क्रांति लाने की कल्पना करना भी जुर्म है। तब स्वेच्छाचार, कामाचार और अराजक जीवन का पनपना स्वाभाविक है। सवाल है कि हम सिर्फ अपनी बौद्धिक विरासत पर कितना और कब तक इठलाते रहेंगे?-राकेश सिन्हा



















