ऐसे पल आते हैं जब किसी देश को खुद को दुनिया की नजर से देखने का मौका मिलता है। नई दिल्ली में हुआ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसा ही एक पल था। दो दिनों के लिए दिल्ली वैश्विक कूटनीति का केंद्र बन गई। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पहुंचे, अंतर्राष्ट्रीय मीडिया राजधानी में जमा हुआ और दुनिया के कुछ सबसे शक्तिशाली देश एक ही मेज पर बैठे। लेकिन कूटनीति, भाषणों और हाथ मिलाने से परे, दिल्ली की सड़कों पर कुछ और ही हो रहा था।
भारत खुद को दुनिया के सामने पेश कर रहा था। और इस बार, भारतीयों के पास गर्व महसूस करने की हर वजह थी। इस पैमाने का अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करना कोई छोटा काम नहीं है। अकेले सुरक्षा इंतजाम ही विशाल थे। दिल्ली पुलिस और अन्य सुरक्षा एजैंसियों को आने वाले नेताओं की आवाजाही से समन्वय बिठाना था, होटलों और स्थानों को सुरक्षित करना था, यातायात के डायवर्जन को संभालना था और यह सुनिश्चित करना था कि दुनिया के सबसे जटिल शहरों में से एक चलता रहे, जब दुनिया का ध्यान उस पर केंद्रित था।
महत्वपूर्ण बात यह है कि आम दिल्ली वासी मोटे तौर पर समझ गए कि यह उनके शहर में आयोजित होने वाला एक अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम था। असुविधाएं तो हुईं, जाहिर है। सड़कें बंद करनी पड़ीं। सफर लंबे हो गए। जाने-पहचाने रास्तों पर अचानक अनजान मोड़ आ गए। लेकिन भारतीयों ने सहयोग किया। उन्होंने पुलिस और प्रशासन द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन किया। उन्होंने प्रतिबंधों को स्वीकार किया, अपने शैड्यूल में बदलाव किया और सुरक्षा तंत्र को वह करने दिया जो उसे करना था। किसी सम्मेलन में दुनिया की सबसे बेहतरीन तकनीक और सबसे आधुनिक सुरक्षा प्रणाली हो सकती है लेकिन अगर आम नागरिक सहयोग करने से इंकार कर दे, तो सारा काम मुश्किल हो जाता है। दुनिया ने जो देखा वह एक काफी बदला हुआ भारत था। सुविधाएं प्रभावशाली थीं।
आयोजन स्थल आधुनिक थे। भारत मंडपम ने प्रमुख विश्व नेताओं के जमावड़े के लिए एक उपयुक्त माहौल प्रदान किया। इन व्यवस्थाओं ने बड़े, जटिल अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों की मेजबानी करने की देश की बढ़ती क्षमता को साबित किया। अपने देश को अंतर्राष्ट्रीय नजरिए से देखने में कुछ अलग ही बात होती है। लेकिन कभी-कभी, देश हमें एक पल के लिए शिकायत करना बंद करने और सीधे यह कहने की वजह देता है-शाबाश। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन उन्हीं पलों में से एक था। और इस सब के केंद्र में थे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। किसी की राजनीतिक पसंद चाहे जो भी हो, भारत के प्रधानमंत्री को चीन के शी जिनपिंग और रूस के व्लादिमीर पुतिन जैसे नेताओं के सामने मेज पर बैठे देखना अपने आप में एक स्पष्ट और बड़ा महत्व रखता था।
मोदी केवल दरवाजे पर खड़े होकर मेहमानों का स्वागत करने वाले मेजबान भर नहीं थे। भारत वैश्विक शासन के भविष्य, आर्थिक सहयोग, प्रौद्योगिकी, विकास और ग्लोबल साऊथ की ङ्क्षचताओं के बारे में बातचीत में एक सक्रिय भागीदार था। यह बात मायने रखती है। ब्रिक्स की मेज पर बैठे देश हर बात पर सहमत नहीं होते। उनके आपस के रिश्ते जटिल हो सकते हैं। उनके आर्थिक और रणनीतिक हित कभी-कभी बिल्कुल अलग दिशाओं में खींच सकते हैं। फिर भी भारत उन्हें दिल्ली में एक साथ लाने में सफल रहा। यह अपने आप में कूटनीति की एक बड़ी उपलब्धि है। हम तेजी से उस बातचीत का हिस्सा बन रहे हैं। और शायद यही वजह है कि आम भारतीयों द्वारा महसूस किया गया गर्व इतना स्पष्ट और गहरा था। यह केवल मोदी के बारे में नहीं था। यह केवल सरकार के बारे में नहीं था। यह केवल ब्रिक्स के बारे में नहीं था। यह एक ऐसे भारत को देखने के बारे में था जो दुनिया की मेजबानी करने की अपनी क्षमता में आश्वस्त दिख रहा था। पृथ्वी के सबसे सुरक्षित नेताओं में से कुछ का स्वागत करने के लिए दिल्ली को तैयार होते देखने पर गर्व था और उस आम नागरिक पर गर्व था, जिसे कहा गया, ‘इसकी जगह यह रास्ता लीजिए’ और उसने ठीक वैसा ही किया।
हम कभी-कभी भूल जाते हैं कि किसी देश की छवि केवल उसके नेताओं से नहीं बनती। यह आम नागरिकों के लाखों छोटे-छोटे कार्यों से बनती है। एक दुकानदार का अपनी दुकान खोलना। एक ड्राइवर का डायवर्जन का पालन करना। एक यात्री का देरी को स्वीकार करना। एक पुलिस कांस्टेबल का सड़क पर घंटों खड़े रहना। एक सुरक्षा अधिकारी का रात भर काम करना। एक अधिकारी का यह सुनिश्चित करना कि कोई छोटी सी बात बड़ी समस्या न बन जाए। इसी तरह एक विशाल अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम वास्तव में सफल होता है। बेशक, किसी भी सम्मेलन का मूल्यांकन केवल उसकी तस्वीरों, सजावट या ट्रैफिक प्रबंधन से नहीं किया जाना चाहिए। असली पैमाना बाद में आएगा, मजबूत हुए कूटनीतिक संबंधों, बढ़ाए गए आॢथक और तकनीकी सहयोग और इस बात से कि क्या की गई प्रतिबद्धताएं ठोस परिणामों में बदलती हैं? लेकिन ऐसे लोग हमेशा रहेंगे जिन्हें शिकायत करने के लिए कुछ न कुछ मिल ही जाएगा। यह व्यावहारिक रूप से एक राष्ट्रीय खेल है। ट्रैफिक असुविधाजनक था। प्रतिबंध निराशाजनक थे। सुरक्षा कुछ लोगों के लिए दखल देने वाली थी। लेकिन शायद, कभी-कभार, हम असुविधा से परे देख सकते हैं और बड़ी तस्वीर को समझ सकते हैं।
एक भारत, जिसके बारे में कभी मुख्य रूप से एक विकासशील देश के रूप में बात की जाती थी, वह एक तेजी से प्रभावशाली वैश्विक खिलाड़ी के रूप में बुनियादी ढांचे, संगठनात्मक क्षमता और कूटनीतिक पहुंच का प्रदर्शन कर रहा था। और करोड़ों भारतीयों ने ऐसा होते देखा। कंधे थोड़े और सीधे हो गए। आवाज में थोड़ा और गर्व आ गया। शायद सीना भी थोड़ा और चौड़ा हो गया। और शायद ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की असली कहानी यही है। दुनिया दिल्ली आई। दिल्ली इस अवसर पर खरी उतरी। हमारी पुलिस, हमारे नेताओं और दिन-रात काम करके सुरक्षा, भोजन, व्यवस्था और समयसीमा सब कुछ सही रखने वाले लोगों को सलाम। सबसे बढ़कर प्रधानमंत्री को सलाम।-देवी एम. चेरियन



















