करीब 98 वर्षीय लालकृष्ण आडवाणी देश के उपप्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री रहे हैं। वह नई दिल्ली से लोकसभा सांसद भी चुने गए थे। उन्हें, बेटी प्रतिभा और बहू को मतदाता सूची में शामिल करने पर सवाल हैं, लिहाजा उन्हें चुनाव आयोग ने नोटिस भेजा है। देश के मौजूदा विदेश मंत्री एस. जयशंकर, उनकी जापानी पत्नी और विदेश सचिव विक्रम मिसरी को भी नोटिस भेजे गए हैं। दिल्ली की मौजूदा मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और 10 साल तक मुख्यमंत्री रहे अरविंद केजरीवाल के मतदाता होने पर भी चुनाव आयोग को संदेह है। बहरहाल मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का मामला किसी तरह निपटा लिया गया है, लेकिन केजरीवाल, उनके 85 वर्षीय माता-पिता, उनकी आईआरएस रहीं और सरकारी पेंशनधारी पत्नी और बेटे के दिल्ली में मतदाता होने पर आयोग के सवाल हैं, लिहाजा उन्हें नोटिस के जवाब देने ही पड़ेंगे। देश के कानून मंत्री रहे, चांदनी चौक के पूर्व सांसद, मौजूदा राज्यसभा सांसद एवं सर्वोच्च अदालत के प्रख्यात अधिवक्ता कपिल सिब्बल के मतदाता होने पर आयोग को क्या आपत्तियां हैं, कमोबेश हमारी समझ के बाहर है। यहां तक कि मौजूदा चुनाव आयुक्त एसएस संधू, जो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता के समकक्ष ही हैं, को भी नोटिस भेजा गया है कि उनके नाम की स्पेलिंग (वर्तनी) 2002 के रिकॉर्ड से मेल नहीं खाती, लिहाजा वह स्पष्ट करें। बेहद हास्यास्पद है कि सीबीआई निदेशक प्रवीण सूद, थलसेना प्रमुख रहे जनरल उपेन्द्र द्विवेदी, सर्वोच्च अदालत की न्यायाधीश रहीं जस्टिस रंजना देसाई, सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडे और केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला आदि अति विशिष्ट चेहरों को भी चुनाव आयोग ने नोटिस भेजे हैं, तो आम मतदाता की कराहें, चीखें, गुहार कौन सुनेगा? कैग प्रमुख के. संजय मूर्ति के माता-पिता के नाम भी नहीं हैं। बेशक चुनाव आयोग द्वारा नोटिस भेजना एक सामान्य प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन हमारा पक्का यकीन है कि अंतत: इन सभी नामों को दिल्ली की मतदाता-सूची में जोड़ा जाएगा। क्या चुनाव आयोग अपनी नालायकी पर माफी मांगेगा?
दरअसल हमारा बुनियादी और गंभीर सवाल ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) के प्रारूप पर है। यह अभियान चलाने वाले अधिकारियों की मेधा, सामान्य बुद्धि, पर भी तरस आता है। ज्ञानेश कुमार भी सामूहिक तौर पर ‘खलनायक’ हैं। क्या संविधान के अनुच्छेद 324 और 325 में चुनाव आयोग को यही विशेष शक्तियां दी गई हैं कि मतदाता वही होगा, जिसे चुनाव आयोग चाहेगा? लेकिन अनुच्छेद 326 में यह प्रावधान भी है कि देश का प्रत्येक 18 वर्षीय वयस्क नागरिक ‘अधिकृत मतदाता’ होगा। यह मताधिकार क्यों छीना जा रहा है? एसआईआर के तहत करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम अभी तक काटे जा चुके हैं। उनके अलग-अलग कारण हो सकते हैं। लोग ‘दिवंगत’ भी हुए होंगे, तो नए मतदाता भी जुड़े होंगे! मताधिकार गंवाने वालों की यह कोई सामान्य संख्या नहीं है और एसआईआर अभी जारी है। यह सवाल लगातार अनुत्तरित क्यों है कि आयोग काटे गए नामों का खुलासा, वर्गीकरण समेत, सर्वोच्च अदालत को दे और वहां से देश को अवगत कराया जाए। ज्ञानेश कुमार गुप्ता संविधान के भी ‘सुप्रीम’ नहीं हैं। संविधान के तहत ही उन्हें इस पद का दायित्व और विशेषाधिकार दिए गए हैं। दरअसल हमने जिन अति विशिष्ट चेहरों का उल्लेख किया है, उन्हें निर्वाचित भी घोषित किया जा चुका है और यह काम आयोग ने ही किया और ये लोग दशकों से मतदाता भी रहे हैं।
आडवाणी और केजरीवाल के माता-पिता की जो उम्र है, उसके मुताबिक वे 60-70 साल से मतदान कर रहे होंगे, अचानक उस पर सवाल किए जा रहे हैं! क्या अब मतदाता की परिभाषा बदल गई है और वे 2002 की मतदाता-सूची के आधार पर ही तय किए जाएंगे? यह कोई ‘ब्रह्म-ग्रंथ’ है क्या? यह पुनरीक्षण उसी आधार पर किया जाना चाहिए, जो मतदाता ने फॉर्म भरा है। मतदाता ही अपने बारे में ब्यौरा देने को स्वतंत्र और अधिकृत है। 2002 में कोई गलती रह गई होगी, तो उसके आधार पर आप किसी का मताधिकार छीन लेंगे? माता-पिता का नाम देने की स्वतंत्रता भी मतदाता की होनी चाहिए और उनका मिलान करना ही गलत है। यह अधिकार भी मतदाता का होना चाहिए। कोई मतदाता किसी काम से या व्यवसाय के कारण अथवा पारिवारिक कारणों से स्थानांतरित हो गया है, तो उसे फोन कर पुष्टि करनी चाहिए और फिर आयोग कोई अंतिम निर्णय ले। अराजकता खत्म होनी चाहिए। आयोग की इस प्रक्रिया के कारण आम आदमी ही नहीं, बल्कि खास लोगों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। आयोग का कत्र्तव्य नागरिकों को सुविधाएं उपलब्ध करवाना है, न कि उन्हें परेशान करना।



















