यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि हाल ही के महीनों में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए-नए आर्थिक और व्यापारिक संरक्षणवादी कदमों से भारत के लिए आर्थिक-व्यापारिक चिंताएं बढ़ गई हैं। यह स्थिति मुख्य रूप से अमरीका के व्यापार, कृषि, बौद्धिक संपदा और श्रम बाजार से जुड़े नीतिगत बदलावों के कारण उत्पन्न हुई है…
हाल ही में 18 सितंबर को अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूसी तेल खरीदने वाले भारत-चीन समेत पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने वाले बिल ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ पर हस्ताक्षर करके इसे कानून बना दिया है। यह कानून हस्ताक्षर किए जाने के 30 दिनों के भीतर प्रभावी होगा। यह कानून स्वचालित रूप से तुरंत टैरिफ लागू नहीं करता है। किस देश पर कितना टैरिफ लगाना है या राष्ट्रीय हित में किसे छूट देनी है, इसका अंतिम निर्णय अमरीकी राष्ट्रपति के पास ही रहेगा। राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने इस विशेष अधिकार का उपयोग करते हुए 24 सितंबर को अमरीका की यात्रा कर गए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को नायाब तोहफा देते हुए कहा कि 10 जनवरी 2027 तक चीन पर 100 प्रतिशत या अन्य कोई नया टैरिफ लागू नहीं होगा। लेकिन भारत पर टैरिफ लागू होने की चुनौती बनी हुई है। उल्लेखनीय है कि अमरीका के इस नए टैरिफ कानून का प्राथमिक उद्देश्य रूस और ईरान के ऊर्जा स्रोतों से होने वाली राजस्व आय पर रोक लगाना है। इस कानून से भारत सहित दुनिया के कई देश प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो सकते हैं। रूस और ईरान से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदने वाले देशों में भारत और चीन सबसे प्रमुख हैं।
निसंदेह भारत के लिए यह स्थिति आर्थिक और रणनीतिक दोनों दृष्टिकोणों से बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकती है। एक तरफ जहां रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता है, वहीं दूसरी ओर अमरीका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। यदि अमरीका भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू करता है, तो इससे भारतीय निर्यात को भारी झटका लग सकता है। ऐसे में अमरीकी संसद द्वारा रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून पारित किए जाने और 100 प्रतिशत तक टैरिफ के प्रावधान पर भारत ने दो टूक शब्दों में कहा कि 140 करोड़ से अधिक देशवासियों की ऊर्जा सुरक्षा और हित सर्वोपरि हैं, जिनसे कोई समझौता नहीं होगा। इसमें कोई दो मत नहीं है कि वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच भी भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है और ऐसे में भारत किसी भी बाहरी दबाव में आए बिना, बाजार की परिस्थितियों के अनुसार अपने आर्थिक और व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक निर्णय लेगा। यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि हाल ही के महीनों में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए-नए आर्थिक और व्यापारिक संरक्षणवादी कदमों से भारत के लिए आर्थिक-व्यापारिक चिंताएं बढ़ गई हैं। यह स्थिति मुख्य रूप से अमरीका के व्यापार, कृषि, बौद्धिक संपदा और श्रम बाजार से जुड़े नीतिगत बदलावों के कारण उत्पन्न हुई है। उल्लेखनीय है कि हाल ही में एक आदेश के माध्यम से ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी वीजा पर लगाए गए 1 लाख डॉलर के अतिरिक्त शुल्क को एक साल के लिए बढ़ा दिया है और वीजा नियमों की जांच को पहले से अधिक सख्त कर दिया है। इस फैसले के तहत अमरीका के विदेश, श्रम और गृह सुरक्षा मंत्रालय को निर्देश दिए गए हैं कि वे वीजा आवेदनों को मंजूरी देने से पहले यह सुनिश्चित करें कि नियोक्ता ने हाल में अमरीकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाला न हो या भविष्य में छंटनी की योजना न बनाई हो। हालांकि, इस भारी भरकम शुल्क से उन विदेशी नागरिकों को राहत दी गई है जो पहले से अमरीका में छात्र वीजा एफ-1 पर रह रहे हैं या अपने मौजूदा वीजा का नवीनीकरण करा रहे हैं। इसके अतिरिक्त, श्रम मंत्री को 30 दिनों के भीतर श्रम स्थिति आवेदनों की समीक्षा करने के आदेश दिए गए हैं। इस फैसले का सबसे गहरा असर भारतीय पेशेवरों और आईटी कंपनियों पर पड़ेगा, क्योंकि कुल मंजूर एच-1बी वीजा में भारतीय मूल के लोगों की हिस्सेदारी करीब 71 प्रतिशत है। 2025 में इस शुल्क के लागू होने के बाद से ही बड़ी आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियों के पंजीकरण में करीब 92 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की जा चुकी है। यह नीति न केवल तकनीकी और वित्तीय क्षेत्र बल्कि ग्रामीण अमरीका में स्वास्थ्य सेवाएं देने वाले भारतीय डाक्टरों को भी प्रभावित करेगी।
इसी तरह गत 11 सितंबर को ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी और अन्य गैर-आप्रवासी वीजा धारकों की नौकरी छूटने के बाद मिलने वाली 60 दिन की मोहलत को खत्म करने का प्रस्ताव दिया है। वर्तमान में लागू नियम के अनुसार, नौकरी जाने पर विदेशी कर्मचारियों को अमरीका में रहकर दूसरी नौकरी खोजने, वीजा स्थिति बदलने या देश छोडऩे के लिए 60 दिन का समय मिलता है। यदि नया प्रस्ताव लागू होता है, तो नौकरी समाप्त होते ही कर्मचारी का वैध गैर-आप्रवासी दर्जा भी तुरंत खत्म हो जाएगा। ऐसी स्थिति में नई नौकरी मिलने पर भी कर्मचारी को अमरीका से बाहर जाकर दूतावास के जरिए पुन: आवेदन करना पड़ सकता है। इस कदम का सबसे बड़ा असर अमरीका में काम कर रहे भारतीय आईटी पेशेवरों पर पड़ेगा, जो बड़ी संख्या में एच-1बी वीजा पर निर्भर हैं। यह प्रस्ताव केवल एच-1बी तक सीमित नहीं है, बल्कि एल-1, ओ-1 और टीएन जैसी अन्य वीजा श्रेणियों पर भी लागू होगा। अमरीकी गृह सुरक्षा विभाग का तर्क है कि इससे कर्मचारी के रहने की वैधता और उसकी नौकरी के बीच सीधा संबंध बनेगा तथा प्रशासनिक बोझ कम होगा। फिलहाल यह केवल एक प्रस्ताव है, अंतिम नियम नहीं। इस पर दो महीने तक सार्वजनिक प्रतिक्रिया ली जाएगी, जिसके बाद ही कोई अंतिम फैसला होगा। तब तक पुरानी 60 दिन की व्यवस्था लागू रहेगी। इसी प्रकार व्हाइट हाउस के ‘ऑफिस ऑफ ट्रेड एंड मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी’ की ‘द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम’ रिपोर्ट में भारत समेत 40 से अधिक देशों पर चीन द्वारा अमरीकी टैरिफ से बचने के लिए अवैध री-रूटिंग नेटवर्क का हिस्सा होने का आरोप लगाया गया है।
भारत सरकार ने अमरीका की इस रिपोर्ट के तहत लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भारत में सख्त कस्टम्स रूल्स और मजबूत कानून लागू हैं। इसके अतिरिक्त अमरीकी प्रशासन द्वारा आयातित जेनेरिक औषधियों पर चरणबद्ध तरीके से 1 अगस्त 2026 से नई शुल्क नीति लागू कर दी गई है। इसके तहत 1 अगस्त 2026 से 31 जुलाई 2028 तक (शुरुआती दो वर्षों के लिए) आयातित दवाओं को शुल्क से मुक्त रखा गया है, ताकि अमरीकी बाजार में दवा आपूर्ति बाधित न हो। इसके पश्चात, 1 अगस्त 2028 से 31 जुलाई 2029 तक दवाओं के मूल्य पर 100 प्रतिशत सीमा शुल्क लागू किया जाएगा। अंतत: 1 अगस्त 2029 के बाद इस शुल्क को बढ़ाकर 200 प्रतिशत के सर्वोच्च स्तर पर पहुंचा दिया जाएगा। इस तरह अमरीका की ओर से भारत के लिए बढ़ती आर्थिक और व्यापारिक चुनौतियों के बीच भारत को अमरीका के साथ तेजी से आगे बढ़ रहे द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) के तहत अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के प्रति अत्यंत सतर्क रहना होगा। एक संतुलित और औपचारिक व्यापार समझौता भारत के प्रमुख निर्यात उत्पादों जैसे औषधियां, रत्न एवं आभूषण, वस्त्र, मसाले और हस्तशिल्प पर अमरीकी शुल्क दरों को शून्य या न्यूनतम स्तर पर ला सकता है। लेकिन इस समय अमरीकी संरक्षणवादी नीतियों के प्रभाव को कम करने के लिए भारत को रणनीतिक रूप से आगे बढऩा होगा। अमरीका पर अत्यधिक निर्भरता घटाने के लिए लैटिन अमरीका, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य पूर्व के गैर-पारंपरिक बाजारों में निर्यात का विस्तार करना आवश्यक है। साथ ही, यूरोपीय संघ और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ मुक्त व्यापार समझौतों को शीघ्र लागू करते हुए व्यापारिक विविधता सुनिश्चित करनी होगी। उम्मीद करें कि सरकार ट्रंप के टैरिफ और संरक्षणवादी चुनौतियों के बीच नई व्यापार साझेदारियों, निर्यात बाजारों के विविधीकरण और आर्थिक-वित्तीय नीतियों के जरिए देश के आर्थिक हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रणनीतिक रूप से आगे बढ़ेगी।-डा. जयंती लाल भंडारी



















