चुनाव आयोग के अंतर्विरोध और आपत्तियों की खबर छपने के 48 घंटे में ही एहसास हो गया कि आयोग में कुछ गलत हो रहा है, जिसका निराकरण देशहित और लोकतंत्र-हित में होगा, लिहाजा मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की बैठक हुई। तीनों की साझा उपस्थिति का चित्र भी जारी किया गया। बैठक की पहल किसने की और साझा संवाद की स्थिति कैसे बनी, यह जानना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि बैठक के जरिए जो पश्चाताप किया गया और देश के मतदाताओं के पक्ष और हित में जो निर्णय लिए गए, वे बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। देश को चुनाव आयोग की बैठक और पश्चाताप का स्वागत करना चाहिए। चुनाव आयोग की छवि निष्पक्ष, स्वतंत्र, निर्भीक संवैधानिक संस्था की है, लिहाजा उस पर दाग नहीं आना चाहिए। अंतिम लक्ष्य लोकतंत्र और संविधान होना चाहिए, बेशक आपसी मतभेद और वैचारिक टकराव कितने भी हों! चुनाव आयोग की संपूर्ण बैठक में तय किया गया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में जिन मतदाताओं के नाम कट गए हैं अथवा किसी भी तरह की गलती, लापरवाही, अनदेखी, पूर्वाग्रह के कारण जिनके नाम मतदाता-सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं, वे अब ‘अपडेशन’ प्रक्रिया में आवेदन कर सकते हैं। जो पहली बार मतदाता बनने का दावा पेश करना चाहते हैं, वे भी आवेदन कर सकते हैं। खुद ईआरओ (इलेक्ट्रोल रजिस्टे्रशन ऑफिसर) या बीएलओ आपके घर पर आकर दस्तावेज लेंगे। जिन मतदाताओं को नोटिस मिले हैं, वे भी ईआरओ और सहायक ईआरओ के कार्यालयों में न जाएं। खुद बीएलओ उनके घर आकर संबंधित दस्तावेज लेंगे और उन्हें ईसीआईनेट पर अपलोड करेंगे। उसके बाद किसी को भी अंतिम तौर पर मतदाता बनाने का काम पूरा हो सकेगा। नेट सॉफ्टवेयर पर जो गंभीर आरोप सामने आए थे कि मतदाता-सूची का ‘केंद्रीकरण’ किया जा रहा है, उसकी जांच वरिष्ठ चुनाव उपायुक्त और एक स्वतंत्र विशेषज्ञ करेंगे।
‘अपडेशन’ पर हमारा सवाल है कि पश्चिम बंगाल में जिन 27 लाख से अधिक मतदाताओं को मौलिक अधिकार से वंचित कर दिया गया था, क्या चुनाव आयोग उन पर भी पुनर्विचार करेगा? ट्रिब्यूनल जिस गति से न्यायिक समीक्षा कर रहे हैं, उसमें ‘सांगोपांग न्याय’ में 12-14 साल का समय लग सकता है। क्या तब तक ‘तार्किक विसंगति’ वाले लोगों के ‘मताधिकार’ छिने रहेंगे? ट्रिब्यूनल के फैसलों में अभी तक करीब 93 फीसदी मतदाताओं के नाम ‘सही’ पाए गए हैं। यह चुनाव आयोग के एसआईआर पर करारा तमाचा है। राजधानी दिल्ली में भी करीब 31-31 लाख मतदाताओं को नोटिस दिए गए हैं, क्या वे सभी 30 अक्तूबर (बढ़ाई समय-सीमा) तक अपने दावे और अपनी आपत्तियां दर्ज करा सकेंगे? क्या बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) और ईआरओ आदि नए सिरे से घर-घर जाकर कागज़ात इक_ा करने और उन्हें अपलोड करने में सफल होंगे? यदि तय अवधि में यह काम नहीं हो पाता है, तो छूटे हुए मतदाताओं का क्या होगा? देश की बुनियादी चिंता मताधिकार की है, जो संवैधानिक अधिकार है। यदि वही छिन जाएगा या नजरअंदाज किया जाता रहेगा, तो फिर लोकतंत्र के मायने क्या हैं? अब चुनाव आयोग ने फैसला लिया है कि मजदूरों और बेघरों के मताधिकार के लिए ‘हेल्प डेस्क’ और विशेष शिविर लगाए जाएंगे। यह एहसास भी आयोग को हुआ है, अलबत्ता माता-पिता ही नहीं, दादा-दादी का ब्यौरा भी मांगा जा रहा है कि वे पहले वाली मतदाता-सूची में थे अथवा नहीं। जो 18 वर्षीय नवयुवा पहली बार मतदाता बनने जा रहा है, उसे क्या पता होगा कि मतदाता-सूची में किन परिजनों के नाम शामिल थे? यह संदर्भ 2002 का पूछा जा रहा है। कइयों का जन्म बाद में हुआ है और ऐसे प्रशासनिक सवालों से वे अनभिज्ञ रहे हैं, लिहाजा फॉर्म 6 के साथ जोड़ा गया ‘घोषणा-पत्र’ भी अनावश्यक और अवैध है। उसे सर्वोच्च अदालत ने कब स्वीकृति दी है, आयोग उसे भी स्पष्ट करे। बहरहाल चुनाव आयोग की संपूर्ण बैठक हुई है, यही सुखद खबर है। विपक्ष बेहद आक्रामक है, लामबंद हो रहा है, उससे सरकार और आयोग को कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि जनता चुनावों और एसआईआर के ‘बहिष्कार’ की घोषणा करती, तो चिंतन करना लाजिमी होता, क्योंकि वही लोकतंत्र की आवाज है। यदि चुनाव आयोग दो आयुक्तों की आपत्तियों पर भी साझा स्पष्टीकरण दे, तो तस्वीर पूरी तरह पारदर्शी हो जाएगी। चुनाव आयोग में आया यह अभूतपूर्व मोड देश की लोकतांत्रिक पक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही स्थापित करने की दिशा में एक अहम पड़ाव है। गौरतलब है कि विपक्ष ने चुनाव आयोग को लेकर अब तक के सबसे तीखे प्रहार किए हंै।



















